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चांदी की मांग और आयात कम, लेकिन दामों में दम

राजेश भयानी / मुंबई February 20, 2020

अगर औद्योगिक मंदी और चीन का कोरोनावायरस और फैलता है, तो सोने से उलट कम दाम वाली मूल्यवान धातु चांदी के संबंध में वर्ष 2020 के दौरान निवेशकों को प्रतिकूल स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। अलबत्ता वर्ष 2020 में इसकी कीमतों में तेजी आने की उम्मीद है। इसका मतलब यह है कि भारत इस सफेद धातु का आयात कम करेगा। हालांकि सोने की तरह ही भारत इसका कम ही आयात कर रहा है, लेकिन घरेलू मांग में भी गिरावट आ रही है और बाजार में चांदी का पुराना स्टॉक बेचा जा रहा है।
 
अगर चीन का वायरस फैलने से हालात और ज्यादा बिगड़ते हैं तथा वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्थाओं को नुकसान पहुंचता है, तो इसके परिणामस्वरूप औद्योगिक धातुओं पर नकारात्मक प्रभाव पडऩे की आशंका है जिसका असर चांदी पर भी पड़ेगा। इसकी वजह यह है कि चांदी की ज्यादा मांग औद्योगिक उपयोगकर्ताओं की ओर से होती है जो मंदी और चीन के वायरस से दबाव में हैं, जबकि भारत जैसा बड़ा उपभोक्ता देश चांदी की खरीद भी कम कर रहा है। दूसरी ओर सोने के दामों में तेजी देखी गई है जो प्रति औंस करीब 1,600 डॉलर के स्तर पर चल रहा है और इसमें तेजी जारी रहने की संभावना है। इससे चांदी को फायदा पहुंचेगा। खास तौर पर पिछले साल जुलाई में आयात शुल्क बढ़ाकर 12.5 प्रतिशत करने और दामोंं के बढऩे से भारत की मांग नरम रही है। इसके परिणामस्वरूप दिसंबर तिमाही के दौरान भारत में इस सफेद धातु का कुल तिमाही आयात केवल 500 टन ही रहा। पिछले कई सालों से आयात का इतना कम स्तर नहीं देखा गया था। 
 
जीएफएमएस के सराफा विश्लेषक देवजित शाह ने कहा कि दिसंबर 2019 में आयात सालाना आधार पर 79 प्रतिशत की भारी-भरकम गिरावट के साथ 503 टन रहा, जबकि कुल मांग में केवल नौ प्रतिशत तक की ही गिरावट आई। बढ़ते दामों ने निवेशकों को अपने उस स्टॉक में कुछ कमी करने का मौका उपलब्ध कराया जिसे उन्होंने पहले से खरीद रखा था। उस समय दाम 40,000 रुपये के स्तर पर थे। इससे विदेशों से इस धातु की नई खरीद में कमी आई। वर्ष 2018 में चांदी का आयात 6,958 टन था जो कम होकर करीब 5,700 टन रहने का अनुमान है। देवजित ने कहा कि हमें उम्मीद है कि इस साल आयात में वर्ष 2019 के स्तर की तुलना में कम से कम 15 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है। जहां तक मांग पक्ष की बात है, तो हमें उम्मीद है कि कुल मांग में कम से कम पांच प्रतिशत तक की कमी आएगी।
 
देवजित को लगता है कि मांग में सुधार केवल तभी हो सकता है जब भारत में मौजूदा दाम 46,000 से 47,000 रुपये प्रति किलोग्राम से गिरकर 42,000 रुपये के स्तर पर आ जाएं। लेकिन ऐसा होने की संभावना नहीं है क्योंकि चांदी के दाम ज्यादा रहने का अनुमान है। वाशिंगटन स्थित उद्योग के हितधारकों के संगठन सिल्वर इंस्टीट्यूट ने अपने पूर्वानुमान में कहा है कि वर्ष 2019 में चांदी के दाम चार प्रतिशत बढ़कर 16.21 डॉलर प्रति औंस थे। वर्ष 2020 में चांदी का परिदृश्य सकारात्मक बना हुआ है। इसके वार्षिक औसत दाम 13 प्रतिशत तक बढ़कर छह साल के शीर्ष स्तर 18.40 डॉलर पर पहुंचने का अनुमान है। संस्थान ने प्रतिकूल परिस्थितियों पर भी जोर देते हुए कहा है कि यह तेजी मुख्य रूप से सोने के सकारात्मक प्रभाव के आधार पर है क्योंकि इस पीली धातु को नाजुक अर्थव्यवस्थाओं में भू-राजनीतिक चिंताओं और व्यापक आर्थिक नीतियों से फायदा मिलना जारी रहेगा। वैश्विक अर्थव्यवस्था की चिंताओं का औद्योगिक धातुओं पर संभावित रूप से नकारात्मक असर पड़ेगा जो बढ़कर चांदी पर भी असर डालेगा। हालांकि अपेक्षाकृत छोटे बाजार के संस्थागत धन का दबाव सोने को पछाड़ते हुए चांदी के लिए पर्याप्त साबित होना चाहिए और इस कारण इस साल आगे चलकर सोने-चांदी का अनुपात कम होकर 70 के आस-पास जा सकता है।
 
सोने-चांदी का अनुपात यह बताता है कि एक औंस सोने से कितनी औंस चांदी खरीदी जा सकती है। यह अनुपात जितना अधिक होता है, सोने की तुलना में चांदी के दामों में उतनी ही कम मजबूती होती है। अब तक यह अनुपात करीब 90 के आस-पास चल रहा है, लेकिन संगठन इस अनुपात को 80 से नीचे रख रहा है जो इस बात का संकेत है कि चांदी में सोने से बेहतर प्रदर्शन करने की संभावना है। 
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