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फंडों के बेहतर संचालन के लिए सेबी का अहम कदम

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  February 18, 2020

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने म्युचुअल फंड उद्योग और वैकल्पिक निवेश फंडों के लिए स्टीवर्डशिप कोड बनाकर फंडों के कामकाज में सुधार की दिशा में एक अहम कदम उठाया है। यह संहिता कोई नियमों का पुलिंदा नहीं है बल्कि सिद्धांतों पर आधारित एक कानून है जो 1 अप्रैल से लागू होगा। यह ढांचा इस बात की पहली वैधानिक स्वीकारोक्ति है कि संस्थागत निवेशकों और कंपनी संचालन में शामिल लोगों के बीच बातचीत की गुंजाइश मौजूद है। यह ऐसी गुंजाइश है जो भेदिया कारोबार के आरोपों की आशंका के कारण सिकुड़ती जा रही है। यह सही नजरिया है और इस परंपरागत दिखावे से अलग है कि इस तरह की बातचीत के लिए कोई जगह नहीं है। स्टीवर्डशिप कोड के तहत इस गुंजाइश को स्वीकार किया गया है और यह संस्थागत निवेशकों को कंपनी बोर्ड के साथ बातचीत में सक्षम बनाएगा। साथ ही इसके लिए कंपनियों को बाहरी दुनिया के साथ अपने संवाद की अपनी शर्तों को कमजोर करने की जरूरत नहीं है।

 
सेबी द्वारा बनाए गए स्टीवर्डशिप कोड का एक सिद्धांत यह भी है कि संस्थागत निवेशकों को निवेश कंपनियों पर नजर रखनी चाहिए। सूचीबद्ध कंपनियों और उनके अंदरूनी सूत्रों को भेदिया कारोबार पर पाबंदी से जुड़े नियमों को मानना होगा। उन्हें संवाद और शेयरधारकों के लिए खुलासे की जानकारी के लिए नीतियां बनानी होंगी ताकि दुनिया को उनके बारे में जानकारी मिल सके। संस्थागत निवेशकों और कंपनी प्रशासन के नजरिये के बीच टकराव से तनाव बढ़ेगा जिससे कंपनियों के निदेशक अपने कामकाज के प्रति सचेत होंगे।
 
एक अन्य सिद्धांत के तहत संस्थागत निवेशकों के पास अपने हस्तक्षेप के बारे में एक नीति होनी चाहिए, वोटिंग नीति होनी चाहिए और उन्हें दूसरे संस्थागत निवेशकों के साथ सहयोग करना चाहिए। संस्थागत निवेशकों की वोटिंग नीति से संस्थागत निवेशकों के नजरिये के बारे में पारदर्शिता आएगी। म्युचुअल फंड के लिए बिल्कुल सही हो सकती है। उदाहरण के लिए यह नीति ऐसी हो सकती है कि अगर वे एक निवेश कंपनी के प्रस्ताव से खुश नहीं हैं तो उन्हें इसके पक्ष में या खिलाफ वोटिंग में समय बरबाद करने की जरूरत नहीं होगी। लेकिन वे निवेश की बिक्री पर विचार कर सकते हैं। इससे निवेश कंपनियों के कामकाज में शामिल लोगों को यह संदेश जाएगा कि उन्हें ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है जहां निवेशक अपने शेयर बेच सकता है या इसके खिलाफ वोटिंग कर सकता है। यानी निवेशक की हिस्सेदारी का आकार और इसके प्रति उसके आक्रामक रुख से कंपनी को यह संकेत मिल जाएगा कि निवेशक के हस्तक्षेप के जोखिम को किस तरह संभाला जाए। 
 
सही काम करने के लिए नियामकीय दिशानिर्देश अच्छा तरीका नहीं है लेकिन सुशासन हासिल करने के लिए भारत में नियम आधारित कानून की कमी को देखते हुए सिद्धांतों पर आधारित स्टीवर्डशिप कोड को एक मौका दिया जाना चाहिए। कंपनी कामकाज से जुड़े अधिकांश मुद्दों को हल्के में लिया जाता है। कंपनी के मालिकाना हक का भाव प्रवर्तकों और शेयरधारकों के बीच इतना गहरा है कि यह न्यायिक नजरिये में भी दिखता है। एक मजबूत व्यवस्था के अभाव में न्यायिक प्रक्रिया भी एक तरह से ठहर गई है। न्यायपालिका के पास संसाधनों की भारी कमी है और हर पार्टी की सरकार ने न्यायपालिका को कमजोर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। न्यायपालिका के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा, मानव संसाधन और व्यवस्थाएं मुहैया नहीं कराई गई। सरकारें चाहती हैं कि उसके कामकाज में न्यायपालिका का हस्तक्षेप कम से कम हो। इस स्थिति से कंपनी जगत का कार्यकारी हिस्सा भी प्रभावित हुआ है। आज भी अगर कोई किसी कंपनी में संस्थागत हस्तक्षेप की बात करता है तो वकील एलआईसी बनाम एस्कॉट्र्स वाद में उच्चतम न्यायालय के फैसले का जिक्र करने लगते हैं। यह फैसला 1980 के दशक में दिया गया था जो पूरी तरह अलग दौर था जब सूचीबद्ध कंपनियों में शेयरधारकों के हितों को लेकर इतना झमेला नहीं था। 
 
यह सही है कि स्टीवर्डशिप कोड सभी समस्याओं के लिए रामबाण नहीं है। आप देख सकते हैं कि कैसे इसे संस्थागत निवेशकों के खिलाफ लागू किया जाता है। जो सिद्धांतों का उल्लंघन करेगा, वह समस्याओं का सामना करेगा। सेबी अगर इस कोड को अपने हिसाब से चलने दे तो बेहतर होगा। इसे परंपरागत कानूनों की तरह लागू नहीं किया जाना चाहिए। ज्यादा चौकस रहने से इसके लक्ष्यों को पाने की बेहतर संभावना होगी। 
 
(लेखक वकील और स्वतंत्र सलाहकार हैं।) 
Keyword: SEBI, mutual fund, code,,
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