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संपादकीय /  February 18, 2020

ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) का क्रियान्वयन हाल के वर्षों के सबसे बड़े सुधारों में से एक रहा है। इसने कारोबारी माहौल सुधारने में भी मदद की है। ताजा आकलन के मुताबिक विश्व बैंक की कारोबारी सुगमता रैंकिंग के ऋणशोधन हल करने संबंधी मानकों पर भारत की स्थिति में 56 स्थानों का सुधार हुआ है। इसने देश की कुल रैंकिंग में भी 14 स्थानों का सुधार करने में  मदद की और वह 190 देशों के बीच 63वें स्थान पर आ गया। विश्व बैंक के मुताबिक देश का ऋणशोधन निस्तारण ढांचा अब दक्षिण एशिया की कई अन्य अर्थव्यवस्थाओं से बेहतर है और यहां कम समय में रिकवरी बेहतर है।

 
बहरहाल, भारत को अभी भी अपने ऋणशोधन ढांचे को विकसित देशों के मानकों के अनुरूप बनाने के लिए लंबी दूरी तय करनी है। यह बात भारतीय ऋणशोधन एवं दिवालिया बोर्ड की ताजा तिमाही रिपोर्ट में भी नजर आई। आंकड़े बताते हैं कि दिसंबर तिमाही में चल रहे मामलों की तादाद पिछले साल की समान तिमाही की तुलना में दोगुनी हो गई। नकदीकरण के मामलों में भी उल्लेखनीय वृद्घि हुई है। दिसंबर 2016 में संहिता के अस्तित्व में आने के बाद से अब तक कुल 3,312 मामले दाखिल हुए हैं। करीब 190 मामलों में निस्तारण योजना स्वीकृत हुई जबकि 780 मामलों में नकदीकरण हुआ। हालांकि पहली नजर में नकदीकरण के मामलों की तादाद चौंकाने वाली लगती है लेकिन इसे संबंधित परिदृश्य में ही देखा जाना चाहिए। उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि इन कंपनियों में से 70 फीसदी या तो औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड के साथ थीं या निष्क्रिय। दूसरी तरह से देखें तो ये वे मामले थे जहां ऋणशोधन ढांचे के अधीन आने के पहले ही मूल्य काफी हद तक समाप्त हो चुका था।
 
ऐसे में संभव है कि एक बार पुराने मामले हल होने के बाद नकदीकृत होने वाली कंपनियों की तादाद कम हो जाए। चाहे जो भी मौजूदा मामलों पर नीतिगत ध्यान देने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए प्रक्रिया के अधीन 1961 मामलों में से 30 फीसदी 270 दिन की अवधि पार कर चुके हैं। हालांकि सामान्य परिस्थितियों में यह प्रक्रिया 330 दिन में पूरी कर ली जानी चाहिए लेकिन जल्दी निस्तारण से व्यवस्था में मजबूती आएगी। ऐसे में दिवालिया निस्तारण व्यवस्था में क्षमता निर्माण करना जरूरी है। ऐसा करके ही मामलों को सहजता से हल किया जा सकता है। इसके लिए नियमित आकलन और राष्ट्रीय कंपनी लॉ पंचाट के पास पर्याप्त संसाधन आवंटित करने की आवश्यकता होगी।
 
निश्चित तौर पर सरकार ने आईबीसी को लेकर तीव्र गति से काम किया है। उदाहरण के लिए जब यह पता चला कि पिछले प्रबंधन की गड़बडिय़ां सफल बोलीकर्ता के हित को प्रभावित कर सकती हैं तो उसने नए मालिकों के संरक्षण के लिए नियमों में संशोधन किया। इसी तरह उसने एक विपरीत निर्णय के बाद सुरक्षित ऋणदाताओं की प्रमुखता स्थापित करके कानून को मजबूती दी। ऋणशोधन निस्तारण प्रक्रिया की क्षमता में सुधार करने से देश की अर्थव्यवस्था को कई तरह से मदद करेंगे। यह ऋणदाताओं का जोखिम कम करने में मदद करेगा। इसके परिणामस्वरूप गैर निष्पादित परिसंपत्तियों के शेयर कम करने और ऋण प्रवाह बढ़ाने में मदद मिलेगी। बड़े मामलों में रिकवरी नकदीकरण से अधिक रही है। उदाहरण के लिए एस्सार स्टील इंडिया के मामले में रिकवरी नकदीकरण मूल्य से 260 प्रतिशत ज्यादा थी। इसके अलावा सहज निस्तारण से अर्थव्यवस्था की ऋण संस्कृति में सुधार होगा। अब प्रवर्तकों के लिए निरंतर डिफॉल्ट के मामलों के बावजूद अपनी कंपनी पर काबिज रहना आसान नहीं होगा। व्यापक स्तर पर देखें तो इससे ऋण आवंटन किफायती होगा और वृद्घि को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी। 
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