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दिल्ली की क्षेत्रीय पार्टी का हो पाएगा राष्ट्रीय विस्तार!

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  February 17, 2020

दिल्ली विधानसभा चुनावों के नतीजे विस्मयकारी हैं। आम आदमी पार्टी (आप) ने पांच साल पहले कुल 70 में से 67 सीटें जीतकर किसी की भी कल्पना से परे असाधारण प्रदर्शन किया था लेकिन उस प्रदर्शन को पांच साल बाद लगभग दोहरा देना विलक्षण माना जाएगा। कुछ लोग यह दलील दे सकते हैं कि भारतीय मतदाता अब बाध्यकारी तौर पर सत्ता-विरोधी नहीं रह गए हैं जबकि लंबे समय तक सत्ता में वापसी में लगे चुनाव अभियानों के अंतिम नतीजे को लेकर यही धारणा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2019 में बढ़े हुए जनमत के साथ फिर से सत्ता में वापसी उनके इस तर्क को मजबूती भी दे सकती है। 

 
लेकिन सच यह है कि दिल्ली के मतदाताओं का विधानसभा चुनाव में कभी भी सत्ता-विरोधी रुझान में यकीन नहीं रहा है। याद रखें कि इसी राज्य में कांग्रेस लगातार 15 वर्षों तक सत्ता पर काबिज रही थी। शीला दीक्षित को फिर से चुनाव जीतने में अधिक परेशानी नहीं हुई थी, जब तक कि 2010 के बाद उभरे भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलनों ने उन्हें बेदखल नहीं कर दिया। दिल्लीवासियों को जब तक यह लगता रहा कि सरकार एक हद तक जनता के हितों को लेकर प्रतिबद्ध है और असरदार काम कर रही है तब तक उन्हें उस सरकार को दोबारा चुनने में कोई दिक्कत नहीं हुई। ऐसा लगता है कि दिल्ली ने आप सरकार के कामकाज पर भी ऐसा ही फैसला सुनाया है। 
 
इस पर लोगों की राय जुदा हो सकती है लेकिन मुझे यही लगता है कि यह नतीजा किसी चेहरे या शख्सियत को दिया गया समर्थन नहीं है। निश्चित रूप से, आप पार्टी अरविंद केजरीवाल का ही सृजन है लेकिन इस बार दिल्ली का मतदाता पार्टी की सरकार और उसके कामकाज को वोट कर रहा था, किसी व्यक्ति को नहीं। दरअसल पिछले पांच वर्षों में आप ने अपने संस्थापक से इतर अपनी एक अलग पहचान बनाने की कोशिश की है। खुद केजरीवाल भी पार्टी के लिए एक बोझ बनते दिखने लगे थे जब आम धारणा यह बनती जा रही थी कि वह हद से ज्यादा विरोध करते हैं और दिल्ली की सत्ता पर बिठाए जाने के बाद अपनी जिम्मेदारियों को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। 
 
आज दिल्ली के मुख्यमंत्री पहले की तरह न तो मुखर और न ही टकराव-पसंद रह गए हैं। यह उस वजह का एक बड़ा पहलू है जो इस चुनाव में आप के शानदार प्रदर्शन का सबब बना है। अब यह पार्टी केवल केजरीवाल की छवि या उनके बयानों तक सीमित नहीं है क्योंकि ये दोनों ही बातें शायद दिल्ली सरकार के प्रदर्शन जितनी स्वीकार्य या लोकप्रिय नहीं हैं। यह कुछ हद तक कई दूसरे क्षेत्रीय दलों से अलग है। अधिकांश क्षेत्रीय दल कुछ नेताओं या परिवारों पर बुरी तरह आश्रित हैं। इसमें शायद ही संदेह हो कि कम-से-कम दिल्ली में आप केजरीवाल के बगैर भी आगे बढ़ सकती है। लेकिन ममता बनर्जी के बगैर तृणमूल कांग्रेस या मुलायम सिंह यादव के परिवार के बगैर समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन पूरी तरह अनिश्चित होगा।
 
यह चुनावों के परंपरागत विश्लेषण की सीमाएं भी उजागर करता है जो दावा करता है कि चुनावी जीत के लिए कोई भरोसेमंद 'चेहरा' होना जरूरी है। यह सच है कि इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने मुख्यमंत्री पद का अपना उम्मीदवार ही नहीं घोषित किया था। लेकिन उसकी हार की वजह यह नहीं है। विशुद्ध रूप से शख्सियत पर केंद्रित राजनीतिक विश्लेषण एक खास सीमा तक ही उपयोगी है। अंत में यह मायने रखता है कि कोई पार्टी मतदाताओं को कौन सी चीज परोसते हुए दिख रही है? 
 
इस चुनाव में आप मतदाताओं को क्या परोस रही थी? यह कहना काफी घिसा-पिटा होगा कि आप महज शासन की बात कर रही थी। भाजपा के बहुसंख्यक-परस्त बयानों को चुनौती देने में आप की आनाकानी और कई मायनों में उसके सामने समर्पण कर देने का भी यह मतलब नहीं है कि यह चुनाव पूरी तरह विचारधारा-मुक्त था। असल में, आप के पास एक सत्तासीन विचारधारा है। यह अतिवादी विकेंद्रीकरण की पार्टी है। यह इसके नजरिये का हमेशा से केंद्रीय तत्व रहा है और वास्तव में खुद केजरीवाल के करियर से यह निकलता है। केजरीवाल की किताब स्वराज में अर्थव्यवस्था को लेकर कुछ अटपटे विचार हैं लेकिन यह किताब मोटे तौर पर उस जवाबदेही का प्रशस्तिगान है जिसके बारे में केजरीवाल मानते हैं कि उसका जन्म अतिवादी हस्तांतरण और विकेंद्रीकरण के कार्यक्रम से होता है। यह विचारधारा मोहल्ला क्लिनिक या बच्चों के मां-बाप को स्कूलों के क्रियाकलापों से जोडऩे के दिल्ली सरकार के कदमों से भी परिलक्षित होती है।
 
असल में इसी बिंदु पर आम आदमी पार्टी खुद को भाजपा से अलग करती है जो केंद्रीकरण पर केंद्रित कहीं अधिक पारंपरिक पार्टी है। भाजपा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके संगठनों की राजनीतिक पार्टी है जिसका मौजूदा मिजाज 'नेता पर यकीन करो' वाला है। दूसरी तरफ आप उत्तर भारतीय मध्यवर्ग की पार्टी है जो निवासी कल्याण संघ (आरडब्ल्यूए) का विशुद्ध सांगठनिक रूप है। यही वजह है कि पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच बनाने में बहुत मुश्किलें पेश आ सकती है। लेकिन अगर उसने अपनी वैचारिक छवि के आधार पर दिल्ली को बदल पाने में कामयाबी हासिल कर ली तो उसे राज्य स्तर पर बेदखल कर पाना मुश्किल होगा। 
 
सवाल यह है कि बाकी कौन से राज्य एवं शहर इस शासन मॉडल को अपने यहां दोहरा सकते हैं। चुनावी सफलता के लिए इस विचारधारा को अधिक शहरी एवं विविधतापूर्ण शासन-व्यवस्था की जरूरत महसूस होती है जो फिलहाल केवल दिल्ली के ही पास है। जिन लोगों को यह लगता है कि आप का मतलब केजरीवाल और व्यावहारिक एवं विचारधारा-मुक्त शासन वाली पार्टी है तो वे आप की राष्ट्रीय भूमिका की चाह रख सकते हैं। लेकिन अगर आप की वास्तविक अपील को लेकर हमारी धारणा सही है तो आम आदमी पार्टी का दिल्ली के बाहर आसानी से फैल पाना मुश्किल लग रहा है। 
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