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क्या फिर जरूरत पड़ेगी लचीले प्रावधान की ?

ए के भट्टाचार्य /  February 17, 2020

उन परिस्थितियों को समझना उपयोगी होगा जिनके तहत वित्त मंत्री ने एफआरबीएम कानून के तहत 'एस्केप क्लॉज' के प्रावधानों का इस्तेमाल किया। बता रहे हैं ए के भट्टाचार्य

 
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी को अपना दूसरा आम बजट पेश करते हुए राजकोषीय घाटे में 0.5 फीसदी बढ़ोतरी को इस आधार पर सही ठहराया कि यह राजकोषीय दायित्व एवं बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) कानून के 'एस्केप क्लॉज' यानी लचीले प्रावधान के अनुरूप है। वित्त वर्ष 2019-20 में राजकोषीय घाटे के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3.3 फीसदी रहने का अनुमान जताया था। लेकिन सीतारमण ने इस पर टिके रहने के बजाय इसके 3.8 फीसदी रहने का संशोधित अनुमान पेश किया। इसी तरह 2020-21 में राजकोषीय घाटे के जीडीपी का 3 फीसदी रहने का अनुमान जताया गया था लेकिन सीतारमण ने 3.5 फीसदी का प्रस्ताव रखा। 
 
उन परिस्थितियों को समझना भी उपयोगी होगा जिनके तहत वित्त मंत्री ने एफआरबीएम कानून के तहत 'एस्केप क्लॉज' के प्रावधानों का इस्तेमाल किया। साथ ही यह आकलन भी जरूरी है कि सरकार की राजकोषीय समेकन योजना के लिए इस प्रावधान का क्या मतलब हो सकता है। सरकारी वित्त व्यवस्था में राजकोषीय अनुशासन सुनिश्चित करने के लिए 2003 में एफआरबीएम कानून बनाया गया था। इसने सरकार को राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3 फीसदी तक कम करने के लिए राजकोषीय समेकन की योजना का पालन करने के लिए बाध्य किया। बेतहाशा खर्च पर लगाम लगाने के लिए यह कानून लाया गया था। एफआरबीएम कानून लाए जाने से पहले छह साल तक हर वर्ष राजकोषीय घाटा जीडीपी के 5 फीसदी से अधिक था और एक साल तो यह 6 फीसदी से भी ऊपर चला गया था। 
 
नए कानून से स्थिति में सुधार आया लेकिन यह पहले कुछ वर्षों तक ही सीमित रहा। सरकार के राजकोषीय घाटे में धीरे-धीरे कमी आई। वर्ष 2003-04 में यह 4.3 फीसदी था जो 2007-08 में 2.5 फीसदी रह गया। लेकिन इसके बाद स्थिति फिर से बेकाबू हो गई और राजकोषीय घाटा 2008-09 से 2013-14 के बीच 4.5 से 6.5 फीसदी के बीच रहा। इसके बाद राजकोषीय अनुशासन के प्रयासों के कारण इसमें कमी आई। 2014-15 में यह 4.1 फीसदी और 2017-18 में 3.5 फीसदी रहा। फरवरी 2018 में सरकार ने एक विशेषज्ञ समिति की कुछ सिफारिशों के आधार पर एफआरबीएम कानून में संशोधन करके इसके प्रावधानों को सख्त बनाया और 'एस्केप क्लॉज' का प्रावधान जोड़ा गया। न केवल राजकोषीय घाटे को बल्कि सरकार के कर्ज को भी संशोधित कानून के दायरे में लाया गया। इसके मुताबिक सरकार का कर्ज (केंद्र और राज्यों सहित) जीडीपी के 60 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए और केंद्र का कर्ज 2024-25 तक जीडीपी के 40 फीसदी से कम होना चाहिए।
 
संशोधित एफआरबीएम कानून के तहत केंद्र 2020-21 तक राजकोषीय घाटा जीडीपी का 3 फीसदी तक लाने के लिए कदम उठाने के लिए बाध्य है। 'एस्केप क्लॉज' के तहत राजकोषीय घाटे में आधा फीसदी तक बढ़ोतरी की जा सकती है लेकिन इसके लिए कुछ आधार होना चाहिए। इनमें राष्ट्रीय सुरक्षा, युद्ध, राष्ट्रीय आपदा, कृषि उत्पादन और आय का बुरी तरह प्रभावित होना, अर्थव्यवस्था में व्यापक ढांचागत सुधार और किसी तिमाही में वास्तविक उत्पादन वृद्धि में पिछली चार तिमाहियों के औसत से कम से कम तीन फीसदी की गिरावट शामिल है। 
 
दिलचस्प है कि संशोधित एफआरबीएम कानून में यह प्रावधान भी किया गया है कि अगर किसी तिमाही में जीडीपी विकास दर पिछली चार तिमाहियों के औसत से तीन फीसदी अधिक बढ़ती है तो राजकोषीय घाटे के लक्ष्य में 0.25 फीसदी की कमी की जानी चाहिए। राजकोषीय घाटे के लक्ष्य में बढ़ोतरी या कमी के लिए सरकार को संसद के दोनों सदनों में एक बयान देकर इसकी वजह और वार्षिक लक्ष्यों पर लौटने की कार्ययोजना के बारे में बताना होगा। सीतारमण ने एफआरबीएम में 'एस्केप क्लॉज' का रास्ता अख्तियार करने के लिए क्या किया? उन्होंने कहा कि कानून में प्रावधान है कि अर्थव्यवस्था में व्यापक ढांचागत सुधारों की स्थिति में राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को बढ़ाया जा सकता है। वित्त मंत्री किस ढांचागत सुधार की बात कर रही थीं? अपने भाषण में राजकोषीय घाटे के लक्ष्य में बढ़ोतरी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि सरकार ने निवेश बढ़ाने के लिए करों में सुधार किए हैं और इसके अपेक्षित नतीजे आने में समय लगेगा। 
 
इस बात की प्रबल संभावना है कि उनका इशारा कॉरपोरेट कर की दरों में भारी कटौती की तरफ था। सरकार ने सितंबर 2019 में कॉरपोरेट कर में कटौती की कमी की घोषणा की थी और इससे सरकारी खजाने पर वित्त वर्ष 2019-20 में करीब 1.45 लाख करोड़ रुपये का बोझ पडऩे का अनुमान है। लेकिन यह अनुमान बढ़ाचढ़ाकर पेश किया गया था। राजकोषीय नीति के बारे में संसद में दी गई जानकारी में कॉरपोरेट कर की दर में कटौती से राजस्व पर पडऩे वाले असर की कुछ और ही तस्वीर बयां की गई है। इसमें कहा गया है कि कॉरपोरेट कर की दरों में कमी से 1 लाख करोड़ रुपये (जीडीपी का 0.5 फीसदी) का प्रोत्साहन पैकेज दिया गया है। 
 
बयान में अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कई कदमों की जानकारी दी गई है। इनमें कॉरपोरेट कर की दर में कमी, फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी, कपड़ा और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए नीतिगत पहल, स्टार्टअप कंपनियों के लिए प्रोत्साहन, सस्ते मकानों के लिए बाहरी वाणिज्यिक उधारी के नियमों में छूट, दस सरकारी बैंकों का विलय और श्रम कानूनों को दुरस्त करना शामिल है। लेकिन इनमें से किसी को भी ढांचागत सुधार नहीं बताया गया है। हालांकि यह संकेत देता है कि इनमें से कुछ उपायों के राजकोषीय प्रभाव होंगे जो अगले वित्त वर्ष में भी देखने को मिलेगा। 
 
अगर सरकार उन ढांचागत सुधारों का स्पष्ट जिक्र करती जो राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को आधा फीसदी आगे बढ़ाने के लिए जिम्मेदार थे, तो बेहतर होता। यह जरूरी था क्योंकि 'एस्केप क्लॉज' में साफ कहा गया है कि अप्रत्याशित राजकोषीय प्रभाव वाले ढांचागत सुधार के कारण राजकोषीय घाटे के लक्ष्य में बढ़ोतरी की अनुमति होगी। वित्त मंत्री के भाषण या राजकोषीय नीति बयान से यह स्पष्ट नहीं है कि कॉरपोरेट कर की दर में कटौती या किसी अन्य उपायों का राजकोषीय नीति पर असर अप्रत्याशित क्यों है। 
 
वित्त मंत्री के बजट भाषण में एफआरबीएम कानून के तहत केंद्र के कर्ज को कम करने के लक्ष्य के बारे में स्थिति स्पष्ट नहीं है। केंद्र के कर्ज का जिक्र करते हुए सीतारमण ने कहा कि केंद्र सरकार का कर्ज हमारी अर्थव्यवस्था के लिए एक अभिशाप रहा है। मार्च 2019 में यह घटकर जीडीपी का 48.7 फीसदी रह गया जो मार्च 2014 में 52.2 फीसदी था। अलबत्ता, राजकोषीय नीति के वक्तव्य के मुताबिक केंद्र सरकार का कुल कर्ज 2018-19 में जीडीपी का 48.7 फीसदी था जो 2019-20 में बढ़कर 50.3 फीसदी हो गया है। 2020-21 में इसके जीडीपी का 50.1 फीसदी रहने का अनुमान है। सरकार को उम्मीद है कि राजस्व संग्रह बढऩे से उधारी में कमी आएगी और सरकार का कर्ज 2021-22 में जीडीपी का 48 फीसदी और 2022-23 में 45.5 फीसदी रह जाएगा। याद करिए कि 2024-25 में इसे 40 फीसदी तक लाने का लक्ष्य है, बशर्ते कानून में फिर बदलाव करके एक और 'एस्केप क्लॉज' नहीं जोड़ा जाता। 
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