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टाटा टेलीसर्विसेज का एजीआर बकाया चुकाएगी टाटा संस

देव चटर्जी / मुंबई February 14, 2020

टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस पहले ही टाटा टेलीसर्विसेज लिमिटेड का 14,000 करोड़ रुपये का एजीआर बकाया चुकाने के लिए बैंकों से रकम का इंतजाम कर चुकी है। साथ ही टाटा टेलीसर्विसेज और उसकी सूचीबद्ध सहायक टाटा टेलीसर्विसेज (महाराष्ट्र) लिमिटेड सितंबर व दिसंबर 2019 की तिमाही में एजीआर बकाए के लिए पूरा प्रावधान कर चुकी है। बैंकिंग सूत्रों के मुताबिक, टाटा टेली के पास महज 200 करोड़ रुपये की नकदी है और उसे एजीआर बकाया चुकाने के लिए अपने प्रवर्तकों से मदद लेनी होगी। टाटा समूह पहले ही बैंक व सरकार का 60,000 करोड़ रुपये बकाए का भुगतान कर चुका है और अतिरिक्त भुगतान के साथ दूरसंचार में कुल 74,000 करोड़ रुपये का भुगतान हो जाएगा।
 
टाटा संस ने इस पर टिप्पणी करने से मना कर दिया, लेकिन आंतरिक सूत्रों ने कहा कि दूरसंचार क्षेत्र का हालिया संकट टाटा संस की वित्तीय स्थिति पर चोट करेगा क्योंकि उसे या तो टीसीएस के शेयर बेचने होंगे या फिर सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाली कंपनी से मार्च तक ज्यादा लाभांश मांगना होगा। दिलचस्प रूप से टाटा संस पिछले दो वित्त वर्ष से टाटा टेली में अपने निवेश को बट्टे खाते में डाल रही है और मार्च 2020 में समाप्त हो रहे मौजूदा वित्त वर्ष में भी उसे ऐसा करना होगा। टाटा संस ने वित्त वर्ष 2019 और वित्त वर्ष 2020 में टाटा टेलीसर्विसेज में 23,090 करोड़ रुपये लगाए, जिसके कारण उसका शुद्ध कर्ज 31 जुलाई 2019 के 27,840 करोड़ रुपये के मुकाबले बढ़कर 30,488 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। रकम लगाए जाने के बाद टाटा टेली अपना कर्ज 31 मार्च 2018 के 30,741 करोड़ रुपये के मुकाबले घटाकर 31 दिसंबर 2019 को 8,265 करोड़ रुपये पर लाने में कामयाब रही।
 
टाटा टेली के पास 31 दिसंबर 2019 को कम नकदी थी, ऐसे में टाटा संस को इस कमी की भरपाई के लिए आगे आना होगा। टाटा पर नजर रखने वालों ने कहा, टीसीएस को एक बार फिर टाटा संस को रकम देनी होगी ताकि वह सरकार को टाटा टेली का 14,000 करोड़ रुपये बकाया चुका सके। टाटा संस की तरफ से टीसीएस की 72.05 फीसदी हिस्से का एक भाग बेचकर या फिर कंपनी से ज्यादा लाभांश मांगकर यह काम हो सकता है। इसके अलावा कोई और विकल्प नहीं है। टीसीएस में टाटा संस की हिस्सेदारी की कीमत शुक्रवार के बंद भाव के हिसाब से 5.9 लाख करोड़ रुपये बैठती है।
 
टाटा समूह ने वायरलेस टेलीफोनी कारोबार की यात्रा बिड़ला, एटीऐंडटी के साथ उद्यम के जरिये शुरू की थी। एटीऐंडटी और बिड़ला जब टाटा से निकल गई तो जनवरी 2005 में वह राष्ट्रीय स्तर पर दूरसंचार ऑपरेटर बन गई। कंपनी के पास 19 सर्किल में यूनिफाइड लाइसेंस था और नैशनल लॉन्ग डिस्टेंस लाइसेंस भी। दूरसंचार क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढऩे के बाद टाटा टेली अपनी प्रतिस्पर्धी भारती एयरटेल, वोडाफोन व आइडिया सेल्युलर से मुकाबला नहीं कर पाई। रिलायंस जियो के आने के बाद उसकी समस्या काफी ज्यादा बढ़ गई और अंतत: उसने पिछले साल जुलाई में इस क्षेत्र को अलविदा कर दिया। भारती के साथ करार के मुताबिक, सभी ग्राहक, परिसंपत्तियां, स्पेक्ट्रम और टाटा टेली की कुछ देनदारी का भारती एयरटेल के साथ विलय हुआ है और टाटा टेली के पास कर्ज रह गया है। वायरलेस टेलिफोनी सेवा से बाहर निकलने के बाद टाटा टेली एंटरप्राइज बिजनेस, फिक्स्ड लाइन और ब्रॉडबैंड कारोबार में बनी हुई है।
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