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वोडाफोन आइडिया के ग्राहक न घबराएं

सुरजीत दास गुप्ता / नई दिल्ली February 14, 2020

वोडाफोन आइडिया अगर दिवालिया प्रक्रिया में जाने के लिए अर्जी लगाती है तब भी उसके ग्राहकों को परेशान होने की जरूरत नहीं है। इसकी वजह यह है कि ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) के तहत राष्टï्रीय कंपनी विधि पंचाट (एनसीएलटी) में जाने के बाद भी कंपनी अपनी सेवाओं का परिचालन जारी रख सकती है।  आईबीसी नियमों के अनुसार ऋणदाताओं की समिति (सीओसी) समाधान पेशेवर की नियुक्ति करते हैं जो खरीदार तलाशने के साथ ही कंपनी के कामकाज को संभालते हैं। इस दौरान कंपनी के निदेशक मंडल के अधिकार निलंबित रहते हैं। इसका सीधा मतलब है कि वोडाफोन के करीब 30 करोड़ ग्राहकों की सेवाएं तत्काल बंद नहीं होगी और न ही उन्हें तुरंत किसी अन्य कंपनी में अपना नंबर पोर्ट करना होगा।
 
विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा तीनों ऑपरेटरों के पास इतनी बड़ी संख्या में ग्राहकों को सेवाएं देने के लिए नेटवर्क क्षमता नहीं है। ऐसा करने के लिए उन्हें काफी पैसा लगाना होगा और अपनी क्षमता दोगुनी करनी होगी। दूरसंचार कंपनियों का कहना है कि वे करीब 10 करोड़ अतिरिक्त ग्राहकों को ही चरणबद्घ तरीके से अपने नेटवर्क में शामिल कर सकती हैं। लेकिन अभी तक यह रुख रहा है कि किसी कंपनी के बिक्री के लिए रखे जाने की खबर आते ही ग्राहकों का बड़ा हिस्सा सेवाओं की गुणवत्ता खराब होने की आशंका के चलते उससे अलग हो जाते हैं। यह उस समय खास तौर पर होता है जब प्रबंधन का जोर बाजार में प्रतिस्पद्र्धा करने के बजाय कंपनी की बिक्री पर लग जाता है।
 
ऐसी स्थिति में अगर आईबीसी प्रावधानों के तहत परिसंपत्ति बिक्री की प्रक्रिया में देर होत ीहै तो उसके मूल्यांकन में अच्छी-खासी गिरावट आ जाती है। अतीत में एयरसेल के साथ ऐसा हो चुका है। एयरसेल की बिक्री में कर्जदाताओं को 99 फीसदी नुकसान उठाना पड़ा था और ग्राहक दूसरी दूरसंचार कंपनियों की सेवाएं लेने लगे थे। कर्ज समाधान प्रक्रिया से गुजर चुकी दूरसंचार कंपनियों का कहना है कि केवल कामकाज समेटने की स्थिति में ही उन्हें ग्राहकों को 90 दिन का नोटिस देना होता है और दूसरे नेटवर्क पर नंबर पोर्ट कराने में मदद भी करनी होती है। लेकिन ऐसा तभी होता है जब दिवालिया कंपनी से गुजर रही कंपनी को कोई खरीदार न मिले। अपना कामकाज बंद कर चुकी रिलायंस कम्युनिकेशंस के मामले में उसके करीब 8.5 करोड़ ग्राहकों ने दूसरे कंपनियों के पास अपने नंबर पोर्ट कराए थे। 
 
सवाल यह उठता है कि क्या वोडाफोन आइडिया को कोई खरीदार मिल पाएगा? विश्लेषकों का कहना है कि प्रतिस्पद्र्धा प्रावधान लागू किए जाने पर रिलायंस जियो या भारती एयरटेल जैसी बड़ी दूरसंचार कंपनियों के लिए इसे खरीद पाना असंभव हो जाएगा। इसकी वजह यह है कि प्रतिस्पद्र्धा कानून के मुताबिक किसी भी एक कंपनी के पास 50 फीसदी से अधिक बाजार हिस्सेदारी नहीं हो सकती है। और वोडा आइडिया जैसी बड़ी कंपनी को खरीदने पर जिया या एयरटेल दोनों ही इस सीमा को पार कर जाएंगे।
 
ऐसी स्थिति में एक नई कंपनी का इस खरीद में जुडऩे की संभावना बन सकती है। विश्लेषकों के मुताबिक नई दूरसंचार कंपनी को कई तरह की छूट सुविधाएं मिलेंगी। पहली बात यह है कि उस कंपनी को वोडा आइडिया के दिवालिया प्रक्रिया में चले जाने पर उस पर बकाया 50,000 करोड़ रुपये का समायोजित राजस्व (एजीआर) नहीं देना होगा। वैसे दूरसंचार विभाग एक असुरक्षित कर्जदाता के तौर पर इस राशि की मांग कर सकता है। आरकॉम के मामले में भी यही तरीका अपनाया गया था। दूसरी बात यह है कि सरकारी नियमों के मुताबिक संभावित खरीदार को दो साल तक विलंबित स्पेक्ट्रम शुल्क नहीं देना होगा।
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