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वोडा आइडिया का रास्ता बंद!

देव चटर्जी और कृष्ण कांत / मुंबई February 14, 2020

शुक्रवार को वोडाफोन आइडिया के मुंबई स्थित मुख्यालय में निराशाजनक माहौल नजर आया, जहां कंपनी के आला अधिकारी यह कहते नजर आए कि कंपनी 27,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय झटका नहीं सह पाएगी और कंपनी को आखिरकार दिवालिया अदालत का रुख करना पड़ेगा। वोडाफोन के एक अधिकारी ने कहा, इस फैसले के बाद कंपनी के लिए वित्तीय रूप से अपना अस्तित्व बचाना मुश्किल हो जाएगा। वोडाफोन की हैसियत दिसंबर 2019 की तिमाही में सालाना आधार पर 73 फीसदी घटकर 17,600 करोड़ रुपये रह गई जब कंपनी ने तिमाही के दौरान करीब 6,400 करोड़ रुपये का शुद्ध नुकसान दर्ज किया। संचयी तौर पर पिछली चार तिमाहियों में कंपनी की हैसियत में करीब 45,000 करोड़ रुपये की कमी आई है, जो तीन साल का निचला स्तर है।
 
विश्लेषकों का कहना है कि इतनी कम हैसियत और परिचालन में जारी नुकसान को देखते हुए कंपनी को एजीआर का बकाया चुकाने के लिए लेनदारोंं से नया कर्ज मिलने की संभावना खत्म हो गई है। एक विश्लेषक ने कहा, 'आखिर बैंक किस आधार पर इस कंपनी को नया कर्ज देंगे? कंपनी के पास इस उधारी को सहारा देने के लिए परिसंपत्तियां ही नहीं हैं।' तीसरी तिमाही के नतीजे के बाद वोडाफोन आइडिया का लंबी अवधि का कर्ज-इक्विटी अनुपात बढ़कर 5.7 गुना हो गया है, जो उसे देश में सबसे बड़ी कर्जदार कंपनी में से एक बनाता है। इसकी तुलना में उसका कर्ज अनुपात मार्च 2019 की तिमाही में 1.3 गुना था। अगर हम इसमें लंबी अवधि के कर्ज की मौजूदा परिपक्वता को जोड़ लें तो दिसंबर 2019 के आखिर में कंपनी का कर्ज अनुपात बढ़कर 6.6 गुना हो गया। कंपनी को वित्त वर्ष 2020 के आखिर तक लंबी अवधि का 14,800 करोड़ रुपये का कर्ज चुकाना है। यह जानकारी कंपनी की तीसरी तिमाही की फाइलिंग से मिली।
 
ऐसे में कई विश्लेषकों को उम्मीद है कि कंपनी अगली कुछ तिमाहियों में अपनी शुद्ध हैसियत के नकारात्मक हो जाने पर दिवालिया प्रक्रिया के लिए आवेदन कर सकती है। वोडाफोन आइडिया के कमजोर वित्तीय प्रदर्शन से पिछले एक साल में उसके बाजार पूंजीकरण में तेज गिरावट आई है, जो उसे भारती एयरटेल की तरह बाजार से नई इक्विटी पूंजी जुटाने में मुश्किल खड़ा कर रहा है। मौजूदा शेयर भाव पर वोडाफोन आइडिया का बाजार पूंजीकरण करीब 10,000 करोड़ रुपये है, जो साल 2007 में आइडिया सेल्युलर के तौर पर सूचीबद्ध होने के बाद का निचला स्तर है। कंपनी का बाजार पूंजीकरण मार्च 2007 में सूचीबद्धता के समय करीब 22,000 करोड़ रुपये था। विश्लेषकों ने कहा कि कंपनी को प्रवर्तकों आदित्य बिड़ला समूह व वोडाफोन पीएलसी से बड़ी इक्विटी की दरकार है ताकि उसकी मौजूदगी कायम रहे और वह एजीआर का भुगतान कर सके।
 
हालांकि प्रवर्तकों ने कंपनी में और रकम नहीं लगाने का फैसला लिया है क्योंकि पिछले साल कंपनी के 25,000 करोड़ रुपये के राइट्स इश्यू में अच्छी खासी रकम निवेश करने के बाद दोनों प्रवर्तक काफी रकम गंवा चुके हैं। वोडाफोन पीएलसी के पास वोडाफोन आइडिया की 44.39 फीसदी हिस्सेदारी है जबकि आदित्य बिड़ला समूह के पास 27.18 फीसदी हिस्सेदारी है। चूंकि आदित्य बिड़ला समूह ने 1.15 लाख करोड़ रुपये के कर्ज पर कॉरपोरेट गारंटी नहींं दी है, लिहाजा आदित्य बिड़ला समूह की कंपनियों पर इसका नकारात्मक असर नहीं होगा और उनका नुकसान कंपनी की इक्विटी हिस्सेदारी तक सीमित होगा। यह जानकारी एक विश्लेषक ने दी। वोडाफोन आइडिया ने सितंबर 2019 के आखिर तक विवादित एजीआर की देनदारी के मद में कुल 44,150 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। 30 सितंबर 2019 तक मौजूदा 15,390 करोड़ रुपये की नकदी 27,610 करोड़ रुपये के लाइसेंस शुल्क की देनदारी के भुगतान के लिए अपर्याप्त होगी।
 
पिछले साल नवंबर में वोडाफोन पीएलसी के सीईओ निक रीड ने चेतावनी दी थी कि 24 अक्टूबर के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद वोडाफोन आइडिया बंद होने की ओर बढ़ रही है। उस फैसले में दूरसंचार कंपनियों से तीन महीने के भीतर बकाया चुकाने को कहा गया था। इसकी समयसीमा इस साल जनवरी में ही खत्म हो गई। यह स्थिति वोडाफोन के भारत से निकलने की संभावना मेंं इजाफा करती है, अगर वोडाफोन आइडिया वित्तीय मुश्किलों के कारण अपना परिचालन निलंबित करने को बाध्य हो। विगत में वोडाफोन आइडिया करीब आठ बाजारों से बाहर निकल चुकी है। इन बाजारों से निकलने की मुख्य वजह वाणिज्यिक रही है औ्र कंपनी ने इस निकासी में से ज्यादातर में कमाई की। उदाहरण के लिए वोडाफोन पीएलसी जब अमेरिकी संयुक्त उद्यम वेरिजॉन वायरलेस से निकली तो उसे करीब 130 अरब डॉलर मिले, वहीं मिस्र के संयुक्त उद्यम की हिस्सेदारी करीब 2.4 अरब डॉलर में बेची।
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