बिजनेस स्टैंडर्ड - ऑनलाइन कंटेंट कारोबार पर क्यों है सबकी नजर?
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Tuesday, February 25, 2020 06:22 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

ऑनलाइन कंटेंट कारोबार पर क्यों है सबकी नजर?

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  February 14, 2020

यह अजीब मौसम है। समाचार प्रस्तोता और राजनेता एक पूरे शहर को राष्ट्र विरोधी घोषित कर रहे हैं क्योंकि उन्होंने उनकी पसंद के एक खास दल को वोट नहीं दिया। उम्रदराज पुरुष और स्त्रियां नफरत की वकालत कर रहे हैं जबकि खुद उनके बच्चे उन्हें शांति और विविधता के फायदे समझा रहे हैं। देश के 1,67,400 करोड़ रुपये वाले मीडिया और मनोरंजन उद्योग का यही योगदान है। समाचार प्रकाशकों से लेकर मनोरंजन कंपनियों तक, फूड एग्रीगेटर से लेकर ई-कॉमर्स जगत की कंपनियों तक सभी 'कंटेंट फर्म' बनना चाहते हैं। यानी ऐसी फर्म जो दृश्य-श्रव्य माध्यम में सामग्री प्रस्तुत करे। इनमें सबसे नया नाम है 635 करोड़ रुपये मूल्य की एंटरटेनमेंट नेटवर्क इंडिया (ईएनआईएल)। यह 10,000 करोड़ रुपये मूल्य वाले टाइम्स समूह का हिस्सा है। ईएनआईएल देश के सबसे बड़े रेडियो नेटवर्क रेडियो मिर्ची का संचालन करती है और उसके राजस्व का 67 फीसदी रेडियो से आता है। जबकि आने वाले कुछ सप्ताह में कंपनी का रेडियो से संबंध नहीं रह जाएगा। कंपनी ने अन्य ब्रांडों के बीच अपने सहोदर मैक्स प्लेयर के लिए 25 घंटे की सामग्री तैयार की है। इस सामग्री में गुजराती और तमिल समेत विभिन्न भारतीय भाषाओं में 10-10 मिनट की सामग्री तैयार की गई है। सन 2024 तक मिर्ची अपने राजस्व का आधा हिस्सा गैर रेडियो कारोबार से हासिल करने की आशा कर रही है। इसमें 'कंटेंट' बेचना भी शामिल है।

 
10 वर्ष से अधिक समय से मैंने सुना है कि कैसे दुनिया भर की मीडिया फर्म 'कंटेंट फर्म' बनने की बात करती हैं। परंतु अब इसकी गति बहुत तेज हो गई है। ऐसा क्यों हो रहा है, यह समझने के लिए हमें अतीत की गलियों से गुजरना होगा। सन 1990 के दशक के आखिर से लेकर नई सहस्त्राब्दी के शुरुआती समय तक इंटरनेट ने पहले संगीत, फिर समाचार पत्रों, टेलीविजन और फिल्म कारोबार पर जो दबाव डाला, इसका अर्थ माध्यम को लेकर इन सभी के मन में संशय के रूप में उभरा। उदाहरण के लिए समाचार पत्र कंपनियां वर्षों तक खुद को 'कंटेंट फर्म' बताती रहीं। जबकि उनके मुनाफे का ज्यादातर हिस्सा सामान्य मुद्रित उत्पाद से आता रहा। 'कंटेंट' पर्याप्त शोध से हासिल होता है जिसे प्रकाशित करके श्रोताओं को प्रभावित किया जाता है और फिर तमाम माध्यमों से राजस्व जुटाया जाता है। खुद को 'कंटेंट फर्म' कहकर इनमें से अधिकांश स्वयं को मुद्रित माध्यम के इर्दगिर्द मौजूद नकारात्मक रुझान से बचा रही थीं। पश्चिमी दुनिया में मुद्रित माध्यम सिमट रहा है। यही कारण है कि टेलीविजन और फिल्म कंपनियों ने ऐसा किया। वृद्धि के पारंपरिक दायरे में लगभग सभी मीडिया कंपनियों ने तीन-चार अलग-अलग कारोबारी क्षेत्रों में प्रयास किया। समाचार पत्र रेडियो, स्थानीय टेलीविजन स्टेशनों और इंटरनेट की ओर बढ़े। टेलीविजन कंपनियों ने कंटेंट उत्पादन, डीटीएच या केबल का रुख किया। इसे विविधता कहा गया। ईएनआईएल या डिज्नी या सोनी यही कर रहे हैं। उदाहरण के लिए ईएनआईएल के पास देश के 63 शहरों में 1,100 कर्मचारी हैं और यह आपके यूट्यूब चैनल और कार्यक्रमों के लिए विज्ञापन बेचना, कंटेंट तैयार करना चाहती है।
 
बहरहाल विविधता कोई फैशन में इस्तेमाल होने वाला शब्द नहीं है। प्रश्न यह है कि कोई कंपनी यह कैसे बताती है कि वह वृद्धि और भविष्योन्मुखी है। दरअसल तब हर चीज कंटेंट हो जाती है- एक टेलीविजन शो, एक फिल्म, संगीत का कोई हिस्सा, एक निबंध, एक किताब या आलेख, वीडियोज, हेयरस्टाइल टिप्स या रोटी बनाने की कला आदि कुछ भी। कंटेंट शब्द फिल्म देखने या संगीत सुनने के जादू को समाप्त कर देता है लेकिन इसका अर्थ एकदम स्पष्ट है। यह दर्शकों तथा श्रोताओं को जोड़े रखने का काम करता है।
 
इस बात से समझा जा सकता है कि मीडिया और मीडिया से बाहर की कंपनियां कंटेंट का रुख क्यों कर रही हैं। उनकी वजहों को समझकर ही उनमें भेद किया जा सकता है। जोमैटो या फ्लिपकार्ट जैसी कंपनियां चाहती हैं कि लोग उनकी सेवाओं पर अधिक से अधिक समय और पैसा खर्च करें। गूगल, डिज्नी, वायकॉम 18 या जी जो टेलीविजन पर करती हैं, वही वे एक अन्य माध्यम पर कर रही हैं। ईएनआईएल (तथा अनेक अन्य रेडियो फर्म) रेडियो की प्रासंगिकता की लड़ाई लड़ रही हैं, वह भी एक ऐसे बाजार में जहां ढेर सारे नए फोन में एफएम सुविधा नहीं है। 
 
अन्यान्य वजहों से दूरसंचार, टेक्नॉलजी, मीडिया और यहां तक कि खुदरा कारोबार कंपनियां तक सभी को दर्शकों की तलाश है। इस दौरान कई छंट जाएंगे। कोई सफल होगा या नहीं, इसकी पहचान करने के लिए यह जांचना होगा कि उनके कारोबार में उपभोक्ता से प्रत्यक्ष संपर्क का तत्त्व है या नहीं। टेलीविजन कंपनियां जहां अपने सिग्नल केबल और डीटीएच ऑपरेटरों को बेचती हैं और विज्ञापनदाताओं की मदद से आय अर्जित करती हैं, उनके उलट फिल्म स्टूडियो को सीधे दर्शक जुटाने होते हैं और उनसे ही पैसे खर्च कराने होते हैं। किस्से कहने की उनकी क्षमता बेहतर है। ध्यान दीजिए तो पाएंगे कि कई स्ट्रीमिंग सेवाओं का शुरुआती बेहतर कंटेंट फिल्म स्टूडियोज से आता है। बदलाव अभी शुरू हुआ है। अभी कुछ अरसे तक मौजूदा मूर्खतापूर्ण दौर चलता रहेगा।
Keyword: media, online, OTT,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या कोरोनावायरस के खतरे से जल्द निपट पाएगी दुनिया?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.