बिजनेस स्टैंडर्ड - बजट की विशेषताओं पर कुछ विचार
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बजट की विशेषताओं पर कुछ विचार

शंकर आचार्य /  February 14, 2020

केंद्रीय बजट में चार उल्लेखनीय बातें शामिल रहीं। पहला संदर्भ, दूसरा पारदर्शिता, तीसरा विस्तारवाद और चौथा संरक्षणवाद। इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अपनी राय रख रहे हैं शंकर आचार्य

 
बजट प्रस्तुत हुए 15 दिन हो चुके हैं। इसके बारे में मीडिया में लगभग सबकुछ कहा जा चुका है। यही कारण है कि यहां मैं केवल चार विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत करूंगा। 
 
बजट भाषण और उसका संदर्भ
 
तमाम बजट भाषण एक खास आर्थिक संदर्भ में तैयार किए जाते हैं। उनका प्रभाव और उनकी सफलता केवल बजट घोषणाओं की विषयवस्तु पर निर्भर नहीं करती है। बल्कि इस पर भी निर्भर करती है कि वित्त मंत्री उसे कितने विश्वसनीय तरीके से प्रस्तुत करते हैं और सरकार की उन आर्थिक और वित्तीय नीतियों को किस प्रकार रेखांकित करते हैं जो आने वाले वर्षों में आर्थिक विकास को कितने बढिय़ा तरीके से आगे बढ़ाते हैं। मौजूदा बजट के आर्थिक संदर्भों में बीते दो वर्ष की तीव्र आर्थिक मंदी, 50 वर्ष में सबसे खराब बेरोजगारी, निर्यात में सात वर्ष से ठहराव, निवेश दर में गिरावट, वित्तीय तंत्र में तनाव और विभिन्न क्षेत्रों में व्याप्त संकट आदि शामिल थे। दूसरे शब्दों में कहें तो आर्थिक हालात संकटपूर्ण हैं। बजट भाषण में निराश करने वाली बात यह थी कि शुरुआती पन्नों में इनमें से किसी का उल्लेख देखने को नहीं मिला। शायद मंत्री चाहती थीं कि नकारात्मकता न फैले। परंतु परिणाम क्या हुआ? ऐसा लगा जैसे सरकार इसे नकार रही है। इससे भाषण का प्रभाव कम हुआ। बेहतर तरीका कुछ यूं होता: सबसे पहले, आर्थिक चुनौतियों की गंभीरता को चिह्नित किया जाता, उसके बाद सितंबर और अक्टूबर में बजट के पहले इस दिशा में उठाए गए कदमों का जिक्र होता जिसमें कॉर्पोरेट कर दरों में कमी जैसे कदम शामिल हैं, इसके बाद बताया जाता कि कैसे वित्त मंत्री के बजट प्रस्ताव पूरे रुझान में सुधार करेंगे, इसके बाद उन उपायों और प्रस्तावों का जिक्र किया जाता जो निवेश, वृद्धि, रोजगार और निर्यात में सुधार सुनिश्चित करेंगे।
 
बजट आंकड़े: पारदर्शिता और हकीकत
 
किसी भी बजट का बुनियादी उद्देश्य है बीते वर्ष का ईमानदार लेखाजोखा और आने वाले वर्ष के बारे में हकीकत के करीब अनुमान पेश करना। खेद की बात है कि देश में बजट प्रस्तुतीकरण में आंकड़ों की बाजीगरी आम हो चली है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को यह श्रेय देना होगा कि इस बजट में उन्होंने पारदर्शिता बढ़ाने के लिए अहम उपाय किए और बजट से इतर व्यय/उधारी का वक्तव्य प्रस्तुत किया। इससे पता चलता है कि सन 2019-20 में जीडीपी का करीब 0.85 फीसदी हिस्सा ऐसे व्यय और उधारी पर खर्च हुआ या अगले वर्ष होगा। इसमें सरकारी बैंकों के पुनर्पूंजीकरण पर व्यय होने वाली राशि शामिल नहीं है। इसमें बड़ा हिस्सा एफसीआई के जरिये दी जाने वाली खाद्य सब्सिडी का है। यदि इसे दर्शाए गए राजकोषीय घाटे में शामिल किया जाए तो इन वर्षों का राजकोषीय घाटा क्रमश: 4.6 और 4.4 प्रतिशत हो जाएगा।
 
पारदर्शिता में इस सुधार का स्वागत है। परंतु प्रश्न यह है कि एनएचएआई और नाबार्ड के ऐसे ही लेनदेन को इसमें शामिल क्यों नहीं किया गया? यदि सरकारी कर्ज में जुडऩे वाली चीजों के लिए सही मानक का प्रयोग किया जाए तो एफडी प्रवाह को भी शामिल किया जाना चाहिए। सरकारी बैंकों के पुनर्पूंजीकरण की राशि इससे बाहर क्यों है? इन्हें शामिल करने पर वर्ष 2015 के बाद के सभी वर्षों में एफडी अनुपात 5 फीसदी से ऊपर निकल जाएगा। अधिक बुनियादी बात करें तो चूंकि ये बढ़े हुए आंकड़े वास्तविक राजकोषीय घाटे के करीब हैं तो फिर 3.8 और 3.3 फीसदी के घटे हुए आंकड़े की जगह वास्तविक आंकड़े क्यों नहीं पेश किए गए? यह सुखद है कि 15वें वित्त आयोग की ताजा रिपोर्ट बजट से इतर उधारी और व्यय की सहायता लेने की स्पष्ट आलोचना और इन्हें समयबद्ध तरीके से बाहर करने की बात करती है। यह ऐसे विधिक ढांचे की भी बात करती है कि जहां हर सरकारी स्तर पर बजटिंग, अकाउंटिंग, आंतरिक नियंत्रण और अंकेक्षण मानकों का पालन किया जाए। यह भी जरूरी कदम है।
 
बजट: विस्तारवादी या संकुचनवादी
 
बजट में राजकोषीय प्रोत्साहन की अपर्याप्तता को लेकर काफी कुछ कहा जा चुका है। कुछ लोग इसे संकुचनवादी बता रहे हैं। यह बात मेरी समझ से परे है। केंद्र सरकार का बजट जिसमें जीडीपी के 5 फीसदी या उससे अधिक के एफडी की बात कही जा रही है वह संकुचनवादी कैसे हो सकता है? राज्यों में इसके तीन फीसदी हिस्से को शमिल करें तो कुल एफडी जीडीपी के 8 फीसदी के बराबर होगा। जबकि सार्वजनिक  क्षेत्र की ऋण आवश्यकता जीडीपी के 9-10 फीसदी तक होगी। यदि विनिवेश प्राप्तियों को कमतर वर्गीकृत किया जाए तो बदलाव की दिशा विस्तारवादी अवश्य हो जाएगी क्योंकि आंकड़ा बढ़कर तीन गुना हो जाएगा। यानी वित्त मंत्री की सराहना की जानी चाहिए कि उन्होंने प्रोत्साहन चाहने वालों को प्रसन्न करने के लिए उच्च एफडी योजना पेश नहीं की। ऐसा करना राजकोषीय घाटे, सरकारी ऋण और जीडीपी के 70 फीसदी के अनुपात और जीडीपी की कमजोर वृद्धि के मौजूदा दौर में सही नहीं होता।
 
संरक्षणवादी सीमा शुल्क और प्रक्रियाएं
 
इस बजट की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि यह लगातार संरक्षणवाद की ओर झुकता नजर आया। अरुण जेटली के फरवरी 2018 के बजट और पीयूष गोयल फरवरी 2019 के अंतरिम बजट सहित यह लगातार चौथा बजट है जहां तमाम वस्तुओं पर सीमा शुल्क बढ़ाया गया है। इस वर्ष विभिन्न घरेलू वस्तुओं और उपकरणों, इलेक्ट्रिकल उपकरणों, जूते-चप्पल, फर्नीचर, खिलौने, मशीनरी, चिकित्सा उपकरणों, मोबाइल फोन घटकों, ई-वाहनों और बादाम आदि पर शुल्क बढ़ाया गया। ऐंटी डंपिंग शुल्क और सेफ-गार्ड शुल्क दरों को भी बढ़ाया जा रहा है। कुल मिलाकर आयात की राह और मुश्किल हो रही है।
 
सन 1991 के बाद से 25 वर्ष की अवधि में विभिन्न भारतीय सरकारों ने व्यापार नीतियों में सुधार किया और विश्व व्यापार के साथ संबद्धता बढ़ाई और खुलापन लाया। सीमा शुल्क में कमी की गई और इसकी बाधाओं को कम किया गया। परिणामस्वरूप, हमारा विदेशी व्यापार बढ़ा। इससे हमारी आर्थिक वृद्धि और रोजगार दोनों बेहतर हुए। वर्ष 2017 के बाद से हमने नीति को पलटना शुरू कर दिया और विश्व व्यापार से अपने संबंध कम किए। हमारे मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी यह मानने को तैयार नहीं दिखते कि उच्च शुल्क और आयात प्रतिबंध हमारी निर्यात क्षमता को प्रभावित कर रहे हैं। किसी बड़े गैर तेल निर्यातक देश ने आयात को बाधित करके निर्यात वृद्धि हासिल नहीं की है। न ही ऐसा कोई देश बिना उच्च निर्यात वृद्धि के सकल आर्थिक वृद्धि हासिल कर पाया है। सन 1992 से 1997 और 2003 से 2012 के बीच जब हमारा निर्यात मजबूत था तब हमारी अर्थव्यवस्था भी तेजी से विकसित हुई। यदि हम अपने ही आर्थिक इतिहास से सबक नहीं लेंगे तो देश की धीमी आर्थिक प्रगति के लिए किसी और को दोष नहीं दे सकते। 
(लेखक इक्रियर में मानद प्रोफेसर और भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।) 
Keyword: nirmala sitaraman, economy, budget,,
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