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टिड्डियों से निपटने के लिए हवाई छिड़काव और निगरानी जरूरी

खेती-बाड़ी
सुरिंदर सूद /  February 13, 2020

मरुस्थली टिड्डे सभी तरह के कीटों में सबसे विध्वंसक होते हैं। वे बहुत तेजी से अपनी संख्या बढ़ाते हैं और पेटू होते हैं। वे अपने रास्ते में आने वाली किसी भी फसल को मिनटों में चौपट कर देते है। इतना ही नहीं, वे उडऩे में माहिर होते हैं और हवा के अनुकूल होने पर एक दिन में 150 किलोमीटर सफर कर सकते हैं। इस तरह वे कुछ ही समय में लंबा समय तय कर लेते हैं। इसलिए आश्चर्य की बात नहीं है कि टिड्डियों का जो हमला सबसे पहले मार्च 2019 में पूर्वी अफ्रीका में देखा गया था, वह बाद में लाल सागर और दक्षिणपश्चिम एशिया के आसपास फैल गया। इनमें ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत शामिल हैं। पाकिस्तान से लगे सीमावर्ती राज्यों गुजरात, राजस्थान और पंजाब में टिड्डियों ने पहले ही हजारों एकड़ फसल बरबाद कर दी है। बाद में यह हरियाणा के सिरसा इलाके में भी फैल गया। हालांकि केंद्र और राज्य सरकारों ने समय रहते कार्रवाई करके स्थिति को बेकाबू होने से बचा लिया। सतर्क किसानों ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई। हालांकि अभी यह खतरा टला नहीं है और आगे स्थिति और भयावह हो सकती है। 

 
संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के मुताबिक ईरान के दक्षिणी तट पर हाल में हुई भारी बारिश ने टिड्डियों को अतिरिक्त प्रजनन चक्र के लिए अनुकूल परिस्थिति दे दी है। वहां टिड्डियों का दल पहले ही अंडे दे चुका है। इससे आने वाले महीनों में उनकी संख्या में बेतहाशा बढ़ोतरी हो सकती है। इनमें से कुछ के भारत-पाकिस्तान क्षेत्र में आने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। इसके अलावा भारत-पाकिस्तान सीमा पर मौजूदा कुछ टिड्डियों को इन सर्दियों में हुई बारिश के कारण प्रजनन के लिए अनुकूल स्थिति मिल गई है। यह खेती के लिए अच्छी खबर नहीं है। पाकिस्तान ने सिंध, दक्षिण पंजाब और खैबर पख्तूनख्वा में टिड्डियों के हमले को देखते हुए पहले ही राष्ट्रीय आपात स्थिति घोषित कर दी है।
 
भारत में पिछले साल जून से ही टिड्डियों के झुंड देखे जा रहे हैं। राजस्थान और गुजरात में उन्होंने फसलों को काफी नुकसान पहुंचाया है। अब पंजाब और हरियाणा में भी इसका असर दिख रहा है। राजस्थान सरकार ने टिड्डियों के हमले को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने के लिए केंद्र से औपचारिक अनुरोध किया है। कृषि मंत्रालय इस खतरे से निपटने के लिए प्रभावित राज्यों से सहयोग कर रहा है। मंत्रालय टिड्डियों के खिलाफ व्यापक कार्ययोजना बनाने के लिए उनके प्रभावित 30 देशों को आमंत्रित करने की योजना बना रहा है। 
 
एफएओ विभिन्न देशों में टिड्डियों के हमले पर नजर रख रहा है। अभी उसका जोर अफ्रीका पर है जहां इसने विकराल रूप ले लिया है। कुछ अफ्रीकी देशों में टिड्डियों का प्रकोप इतना बढ़ गया है कि आसमान नजर नहीं आ रहा है। इस समस्या से निपटने के लिए एफएओ ने लोगों से दिल खोलकर चंदा देने का आग्रह किया है। इसमें कोई दोराय नहीं है कि टिड्डियों को काबू में करना आसान नहीं है क्योंकि उनका झुंड बहुत बड़ा होता है और उनके प्रसार का तरीका अनोखा होता है। मादा टिड्डी जमीन में गड्डे खोदकर बड़ी संख्या में अंडे देती है और फिर इसे मिट्टी से ढक देती है। इससे अंडों को खत्म करना मुश्किल हो जाता है। इसके बाद टिड्डियों के निम्फ और वयस्क बड़े इलाके में फैल जाते हैं जिन्हें काबू करने के लिए व्यापक उपायों की जरूरत पड़ती है। इस तरह का अभियान विशेषज्ञ संगठन और सरकारी संस्थाएं ही चला सकती हैं। प्रभावित इलाकों में इन्हें खत्म करने के लिए भारी मात्रा में कीटनाशकों के छिड़काव की जरूरत होती है। यह छिड़काव विशेष वाहनों या हवाई माध्यम से किया जाता है। इसमें इंसानों, पशुओं और दूसरे जानवरों को बचाने के लिए विशेष एहतियात चाहिए।
 
नीम का अर्क और कवक तथा जीवाणु जैसे कुछ जैव कीटनाशक भी टिड्डियों के खिलाफ कारगर रहे हैं। लेकिन उनमें परिणाम आने में दस दिन का लंबा समय लग सकता है। आमतौर पर तब तक नुकसान हो चुका होता है। टिड्डियों को काबू करने वाले कुछ तत्त्व और ततैया, पक्षी और सरीसृप जैसे उनके प्राकृतिक दुश्मन भी ज्यादा कारगर नहीं हैं। किसानों के हाथ भी बंधे हुए हैं और वे ड्रम और थाली बजाकर तथा आग जलाकर टिड्डियों को अपने खेतों से भगाने के अलावा कुछ नहीं कर सकते हैं। लेकिन इससे वे केवल पास के खेत में चले जाते हैं। टिड्डियों के प्रकोप के बारे में सही समय पर चेतावनी के लिए प्रभावी निगरानी और उन्हें काबू करने के लिए हवाई छिड़काव के जरिये व्यापक अच्छे परिणामों के लिए जरूरी लगता है।
Keyword: agri, farmer, crop,,
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