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बचाव तैयार करने का अहम अवसर

अजय शाह /  February 13, 2020

कोरोनावायरस हमें इस बात की याद दिलाता है कि जन स्वास्थ्य की बुनियाद मजबूत करने की कितनी अधिक आवश्यकता है। इस विषय पर विस्तार से नजर डाल रहे हैं अजय शाह 

 
एक नए चिह्नित वायरस, 2019-एनसीओवी ने दुनिया भर में 1,300 से अधिक लोगों की जान ले ली है। हमें यह भी पता नहीं कि आगे इसमें कमी आएगी या आगे चलकर स्थितियां और गंभीर होती जाएंगी। अगर भारत में इसका प्रसार होता है तो देश पर इसका बहुत प्रतिकूल प्रभाव होगा। यह देश की जन स्वास्थ्य प्रणाली की परीक्षा की घड़ी भी होगी। संचारी रोगों के मामले में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था बहुत अहम है। यह केवल सरकार ही मुहैया करा सकती है। जन नीति के एजेंडे में यह मुहैया कराना स्वास्थ्य सुविधाएं देने की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण है।
 
नया कोरोनावायरस सन 2002 में चीन से ही फैले सार्स-सीओवी जैसा ही है। सार्स ने भी विश्व अर्थव्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया था। उस समय 8,096 लोग प्रभावित हुए थे और 774 की मौत हो गई थी। यानी पीडि़तों में करीब 10 प्रतिशत। नया कोरोनावायरस जहां सार्स-सीओवी से कम घातक है, लेकिन इससे 1,000 से अधिक मौत हो चुकी हैं। कोरोनावायरस विश्व अर्थव्यवस्था के लिए सार्स-सीओवी से अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसकी दो वजह हैं: इससे होने वाली मौतों ने सार्स-सीओवी को पीछे छोड़ दिया है और सन 2020 में चीन की अर्थव्यवस्था सन 2002 की तुलना में दुनिया के लिए अधिक महत्त्व रखती है।
 
जन स्वास्थ्य की बात करें तो संचारी बीमारियों और महामारियों से निपटना प्राथमिक महत्त्व की बात है। सरकारें  मानव समाज के लिए वह काम करती हैं जो निजी क्षेत्र नहीं करते। संचारी रोगों  से लडऩा और महामारियों से निपटना साफ तौर पर ऐसा क्षेत्र है जहां निजी क्षेत्र की प्रतिक्रिया बहुत अधिक काम नहीं आती। यहां सरकार की आवश्यकता होती है। इक्कीसवीं सदी में संचारी रोगों से लडऩे के तौर तरीकों में कोई खास बदलाव नहीं आया है और वे कमोबेश वैसे ही हैं जैसे कि 19वीं सदी में थे। इस दौरान पूरे देश में बीमारी पर निगरानी करनी होती है और उसके प्रसार के बारे में पहले चेतावनी जुटानी पड़ती है। इस दौरान प्रशासनिक हस्तक्षेप की सहायता से महामारी का प्रसार रोकना होता है। हर नई समस्या को समझने के लिए बौद्धिक नेतृत्व की आवश्यकता होती है। इसके बारे में जन स्वास्थ्य उद्योग और संकटग्रस्त क्षेत्र के लोगों को जानकारी उपलब्ध कराने के लिए विस्तृत जानकारी की आवश्यकता होती है। इसके लिए हर रोज धीमी गति से काम करना होगा और हासिल होने वाली सूचना का विश्लेषण करना होगा। बहुत बड़ी तादाद में झूठी चेतावनियों को खारिज करना होगा। उसके बाद सूरत में सन 1994 में प्लेग फैलने जैसे यदाकदा संकट भी उत्पन्न होंगे जिन पर पूरी क्षमता से प्रतिक्रिया देनी होगी।
 
इस समस्या से निपटने के लिए संसाधन जुटाने और सफलता हासिल करने के लिए काफी राजनीतिक और संगठनात्मक क्षमता की आवश्यकता होगी। भारतीय माहौल में और कम शासकीय क्षमता के साथ हो सकता है हम इस काम में ज्यादा निवेश न कर पाएं और पूरी क्षमता विकसित नहीं कर पाएं। भारतीय राज्य ढांचे को व्यवस्थित करके रोजमर्रा के काम में उच्च गुणवत्ता हासिल कर पाना आसान नहीं है। उदाहरण के लिए भारत में आधिकारिक सांख्यिकी व्यवस्था का संचालन, आर्थिक और जनांकीय सांख्यिकी, स्वास्थ्य व्यवस्था की सांख्यिकी के संचालन से जुड़ी कठिनाइयों आदि का संचालन आसान नहीं जबकि ये जन स्वास्थ्य के अहम घटक हैं। परिणामस्वरूप जन स्वास्थ्य प्राधिकारियों को आबादी पर बीमारियों के बोझ के बारे में पूरी मालूमात ही नहीं हैं। यदि कोरोनावायरस से जनित महामारी या इबोला या लासा फीवर जैसी बीमारी भारत में फैलती है तो भारत के लिए ऐसी सांख्यिकीय व्यवस्था स्थापित करना मुश्किल होगा जहां हर मामला मानचित्र पर दर्शाया गया हो, जो एकदम अद्यतन और सही हो। 
 
उदाहरण के लिए भारत में डेंगू के सभी मामलों का कोई आंकड़ा नहीं है। जबकि डेंगू से होने वाली मौत के मामले 2019-एनसीओवी से अधिक हैं। देश में राष्ट्रीय बीमारी नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) नामक संस्थान इन सवालों को हल करने का काम करता है। विदेशों में इसके समकक्षों की बात करें तो अमेरिका में बीमारी नियंत्रण केंद्र (सीडीसी) और यूरोपीय संघ में यूरोपियन सेंटर फॉर डिजीज प्रिवेंशन ऑफ कंट्रोल जैसे संस्थान हैं। एनसीडीसी के निर्माण में काफी कुछ करना है। उदाहरण के लिए अमेरिकी सीडीसी में करीब 11,000 कर्मचारी हैं। इनमें से आधे उन्नत स्तर के हैं जबकि एनसीडीसी में करीब 400 कर्मचारी हैं। इस पर जोर दिया जाना चाहिए कि संचारी बीमारियों की समस्या एनसीडीसी जैसे एक संगठन के नियंत्रण से बाहर हैं। संचारी बीमारियों पर नियंत्रण के मामले में सार्वजनिक और निजी स्वास्थ्य के हर हिस्से की अहम भूमिका है। 
 
कुछ रोगाणु तेजी से बढ़ते हैं। इस मामले में जन स्वास्थ्य व्यवस्था उल्लेखनीय नतीजे देती है: यह उग्रता को नियंत्रित करता है। जब जन स्वास्थ्य व्यवस्था व्यक्ति से व्यक्ति के स्तर पर बीमारी के प्रसार की संभावना को सीमित कर देता है तो बचे पीडि़तों में लंबा जीवन जीने की संभावना रहती है। इसी प्रकार जब रोगाणु एक व्यक्ति से दूसरे में आसानी से फैलता है तो अधिक सफल नस्लें बीमारी की उग्रता बढ़ाने का काम करती हैं। उदाहरण के लिए कई दशक पहले जब पश्चिम बंगाल में पेयजल की गुणवत्ता में सुधार हुआ और हैजे की तीव्रता घटी तब पूर्वी बंगाल में ऐसा नहीं हुआ जहां उस वक्त पानी की गुणवत्ता खराब थी। 
 
अतीत में हम भाग्यशाली रहे और सार्स-सीओवी या इबोला जैसी बीमारियां हमारे यहां नहीं फैलीं। नए कोरोनावायरस के मामले में हर दिन की देरी हमारे पक्ष में है क्योंकि संभावना यही है कि यह विषाणु बढ़ते तापमान में कम फैलेगा। यदि फरवरी में कोई बड़ी दिक्कत नहीं आती तो हमारे पास बचने का अच्छा मौका होगा। लेकिन हम अच्छी किस्मत के भरोसे नहीं रह सकते। 133 करोड़ लोगों की आबादी में कम राज्य क्षमता नुकसानदेह साबित हो सकती है। फिलहाल देश की जन स्वास्थ्य नीति का मुख्य ध्यान स्वास्थ्य सुविधा देने पर है। जन स्वास्थ्य के क्षेत्र में बाजार की विफलता स्वास्थ्य सुविधा में उसकी विफलता से अलग है। संचारी रोग पर नियंत्रण की संस्थागत क्षमता जन स्वास्थ्य में अहम है। बचाव उपचार से बेहतर होता है और हम जन स्वास्थ्य पर ध्यान देकर बचाव में काफी कुछ कर सकते हैं। संसाधनों और प्राथमिकता को स्वास्थ्य सुविधा के बजाय जन स्वास्थ्य की ओर ले जाना समझदारी भरा कदम होगा। जब सरकार स्वास्थ्य सुविधाओं पर धन खर्च करने को तत्पर है तो बचाव में सुधार और सरकारी व्यय में कमी के बीच प्रत्यक्ष संबंधी स्थापित हो जाता है। 
 
(लेखक नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी, नई दिल्ली में प्रोफेसर हैं।) 
Keyword: Corona virus, china, india,,
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