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सुधार की लंबी राह

संपादकीय /  February 13, 2020

वैश्विक रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड ऐंड पुअर्स ने भारत की संप्रभु रेटिंग बरकरार रखते हुए कहा है कि अगले दो-तीन वर्षों में आर्थिक वृद्धि दर में धीरे-धीरे सुधार आएगा। उसने यह भी कहा कि भारत संरचनात्मक के बजाय चक्रीय आर्थिक मंदी का सामना कर रहा है। इस आशावाद के बावजूद औद्योगिक उत्पादन और मुद्रास्फीति के ताजा आंकड़ों से यह बात एकदम स्पष्ट है कि अर्थव्यवस्था में सुधार की प्रतीक्षा उम्मीद से कहीं ज्यादा लंबी होने जा रही है। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक के मुताबिक दिसंबर 2019 में औद्योगिक उत्पादन सालाना आधार पर 0.3 फीसदी गिरा। 

 
अप्रैल-दिसंबर के दौरान इसमें 0.5 फीसदी की मामूली वृद्घि दर्ज की गई थी। दिसंबर में जहां खनन गतिविधियों में 5.4 फीसदी का इजाफा हुआ, वहीं विनिर्माण उत्पादन 1.2 फीसदी गिरा। बिजली के उत्पादन में भी गिरावट आई। इस बीच खुदरा महंगाई जनवरी में 7.59 फीसदी के साथ 68 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। खाद्य कीमतों में कुछ कमी के बावजूद शीर्ष मुद्रास्फीति में इजाफा यही बताता है कि मुद्रास्फीति अधिक व्यापक हो गई है। स्पष्ट है कि मुद्रास्फीति और औद्योगिक उत्पादन के आंकड़े अर्थव्यवस्था की कोई सुखद तस्वीर नहीं पेश करते। भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी ताजा नीतिगत समीक्षा में कहा है कि भविष्य में कदम उठाने की नीतिगत गुंजाइश है। बहरहाल, यदि मुद्रास्फीति और अधिक व्यापक हुई तो केंद्रीय बैंक के लिए निकट भविष्य में दरों में और कटौती करना मुश्किल होगा। कुछ सकारात्मक घटनाएं भी घटी हैं। 
 
उदाहरण के लिए विनिर्माण और सेवा दोनों क्षेत्रों के लिए परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स में जनवरी में उछाल दर्ज की गई। तीसरी तिमाही के नतीजे दर्शाते हैं कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की बैलेंस शीट में सुधार हुआ है, जिससे यह उम्मीद जगी है कि उत्पादक क्षेत्रों के लिए ऋण की आवक बढ़ेगी। परंतु इन सकारात्मक संकेतों को व्यापक सुधार के संकेत नहीं समझना चाहिए। वित्त मंत्री द्वारा हाल में रेखांकित बातें मसलन विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा किया जाने वाला निवेश, तेजी से बढ़ता शेयर बाजार और ऊंचा विदेशी मुद्रा भंडार, हमेशा अर्थव्यवस्था की सही तस्वीर पेश नहीं करते। शोध दर्शाते हैं कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेश काफी हद तक वैश्विक वित्तीय तंत्र में नकदी की उपलब्धता पर निर्भर करता है। चूंकि व्यवस्था में पर्याप्त नकदी है इसलिए आवक मजबूत बनी रहने की उम्मीद है। मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करके रुपये का अधिमूल्यन रोकने का प्रयास उच्च विदेशी मुद्रा भंडार के रूप में सामने आ रहा है। इसके अलावा मानक शेयर बाजार सूचकांक अर्थव्यवस्था की सही स्थिति नहीं दर्शाते। कॉर्पोरेट परिणामों का त्वरित विश्लेषण दर्शाता है कि केवल बैंकों और तेल रिफाइनरियों जैसे क्षेत्रों के मुनाफे में इजाफा हो रहा है। 
 
समस्त स्तरों पर शुद्घ बिक्री केवल 2 फीसदी बढ़ी। इससे भी यही संकेत मिलता है कि अर्थव्यवस्था कमजोर बनी हुई है। हो सकता है कमजोर आधार अलग-अलग क्षेत्रों में वृद्घि को गति दे लेकिन उन आंकड़ों को सावधानी से पढ़ा जाना चाहिए। इसके अलावा कोरोनावायरस के कारण व्याप्त वैश्विक अनिश्चितता भी निकट भविष्य में उत्पादन पर असर डाल सकती है। उदाहरण के लिए भारतीय औषधि उद्योग चीन से दवाओं के कई घटक मंगाता है। वैश्विक उत्पादन पर इसका प्रभाव स्पष्ट नहीं है लेकिन कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट बताती है कि यह काफी अधिक हो सकता है। सरकार को तेल कीमतों में गिरावट से मिले अवसर का लाभ लेकर वित्तीय स्थिति दुरुस्त करनी चाहिए। सरकार ने सरकारी व्यय में इजाफा करके  आर्थिक वृद्घि में सुधार लाने का प्रयास नहीं करके बेहतर किया है। क्योंकि वैसा करने से वृहद आर्थिक जोखिम बढ़ सकते थे। संरक्षणवाद का रुख करने के बजाय सरकार को कारोबारी सुगमता बढ़ाने और वृद्घि संभावनाओं को सुधारने पर काम करना चाहिए। संरक्षणवादी उपाय स्थायी सुधार के लिए अच्छे नहीं हैं। 
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