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राष्ट्रीय फलक पर उभर पाएंगे अरविंद केजरीवाल?

साई मनीष /  February 12, 2020

अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी (आप) ने लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की है। वर्ष 2013 में पहला कार्यकाल महज 49 दिनों का था और 2015 में शानदार जीत के बाद आप ने सफलतापूर्वक अपना कार्यकाल पूरा किया। भाजपा ने स्थानीय मुद्दों के बजाय राष्ट्रीय मुद्दों से जुड़ा आक्रामक नकारात्मक प्रचार किया जिससे दिल्ली के मतदाता प्रभावित नहीं हुए। झारखंड की हार के बाद भगवा पार्टी को एक बार फिर से दिल्ली में झटका लगा। भाजपा उन कई विधानसभा क्षेत्रों में हार गई जहां पिछले साल लोकसभा चुनावों के दौरान शानदार जीत मिली थी। भाजपा ने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिकता पंजी (एनआरसी) केंद्रित ध्रुवीकरण की राजनीति पर जोर दिया जिससे करीब एक महीने से अधिक वक्त तक दिल्ली में असमंजस की स्थिति बनी रही। आम लोगों को इंटरनेट प्रतिबंध, मेट्रो स्टेशन के बंद होने, सार्वजनिक परिवहनों के बाधित होने के साथ ही अस्थिर कानून व्यवस्था से जूझना पड़ा। 

 
भाजपा का विभाजनकारी प्रचार अभियान पार्टी के लिए ही घातक साबित हुआ और केजरीवाल के सक्षम प्रशासन का रिकॉर्ड, एक ईमानदार प्रशासन की रणनीतिक तरीके से गढ़ी हुई छवि और चुनाव पूर्व कुछ लोकलुभावन वादे ने पार्टी को शानदार जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई। केजरीवाल की मुफ्त सेवाओं वाली राजनीति आप के खाते में वोट जुटाने के लिहाज से अहम रही। उन्होंने पानी के मोर्चे पर भी अच्छी राजनीति करते हुए पानी को मुफ्त देने या ज्यादा सब्सिडी वाली दरों पर देने की बात की। वर्ष 2013 में जब पहली बार आप, कांग्रेस के समर्थन से सत्ता में आई तब केजरीवाल ने शहर के सभी घरों में 20,000 लीटर पानी मुफ्त देने की घोषणा की। पार्टी जब 2015 में दोबारा सत्ता में आई तब भी इस योजना का विस्तार किया गया। अगस्त 2019 में केजरीवाल ने पानी बिल में छूट की घोषणा की जिससे करीब 13 लाख लोगों को फायदा मिला। 
 
केजरीवाल ने चुनाव से कुछ महीने पहले समाज के हर तबके तक अपनी पहुंच बनाने के लिए सभी घरों में 200 यूनिट तक की बिजली मुफ्त करने, महिलाओं के लिए बसों में सवारी करने पर किराया न लेने, सड़क हादसे में पीडि़तों का मुफ्त इलाज करने, शहर के निवासियों को सभी सरकारी और पैनल वाले निजी अस्पतालों में मुफ्त सर्जरी कराने और कुछ चुनिंदा जगहों पर मुफ्त वायरलेस इंटरनेट देने की पहल की। मुख्यमंत्री ने महिलाओं को मेट्रो में मुफ्त सवारी करने का प्रस्ताव रखा जिससे हलचल मच गई और आखिरकार केंद्र सरकार के हस्तक्षेप से ऐसा संभव नहीं हुआ। पार्टी ने दिल्ली के सरकारी स्कूलों की तस्वीर बदलने की कोशिश के तहत अभिभावकों को शिक्षकों के साथ संपर्क करने का मौका दिया और उन्हें अपने मोबाइल फोन पर ही कक्षा में पढ़ाई कर रहे बच्चों की निगरानी करने की इजाजत दी। 2010 के राष्ट्रमंडल चुनावों के दौरान शहर के बुनियादी ढांचे में भारी बदलाव दिखा था लेकिन स्वास्थ्य और शिक्षा की स्थिति अच्छी नहीं थी। केजरीवाल ने इन दो क्षेत्रों को प्राथमिकता देते हुए काम किया जिससे दिल्ली के मतदाता प्रभावित हुए। कोई दूसरी पार्टी दिल्ली के लिए अपना कोई नजरिया पेश करती उससे पहले ही आप ने अपना आधिकारिक घोषणापत्र जारी करते हुए 10 गारंटी दी। दिलचस्प था कि गृहमंत्री अमित शाह दिल्ली में भाजपा के प्रचार अभियान की कमान संभाल ली थी और वह केजरीवाल के आमने-सामने आ खड़े हुए थे। 
 
वहीं चुनाव अभियान के दौरान भाजपा के नेता मनोज तिवारी भी काफी सुर्खियोंं में रहे। कांग्रेस नेता राहुल गांधी के लिए कोई आकर्षण नहीं दिखा और देश की सबसे पुरानी पार्टी, दिल्ली के लिए कोई नजरिया देने या भाजपा के प्रचार अभियान को प्रभावी तरीके से मात देने में नाकाम रही। हालांकि कई लोगों ने दिल्ली में आप की शानदार जीत का अनुमान लगाया था लेकिन केजरीवाल की राष्ट्रीय स्तर पर कोई भूमिका होगी इसको लेकर हमेशा संशय बना रहा। दिल्ली का चुनाव इस मायने में भी हमेशा अलग रहा है क्योंकि यहां पूरी तरह शहरी वोटबैंक है। हालांकि कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में जाति और धर्म भी मायने रखता है लेकिन इसे दिल्ली में उतनी प्राथमिकता नहीं दी जाती जैसा कि देश के कई राज्यों में होता है। देश की शहरी आबादी भविष्य में केजरीवाल की राष्ट्रीय महत्त्वाकांक्षा में संभावित रूप से मददगार साबित हो सकती है। 
 
हालांकि देश की शहरी आबादी में क्षेत्रीय और भाषायी पहचान वाली राजनीति का दबदबा है और जब तक केजरीवाल खुद को नए रूप में पेश नहीं करते हैं तब तक यह कारगर नहीं होगा जैसा कि नरेंद्र मोदी ने 2014 में किया था। बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्य के मुख्यमंत्री के बाद वह देश की मशहूर शख्सियत बनकर उभरे और उन्हें विभिन्न वर्गों ने स्वीकारा। संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक 2025 तक 10 भारतीयों में से 4 शहरी होंगे जब केजरीवाल फिर से दिल्ली के चुनावी मैदान में उतरेंगे। इस वक्त अनुमानों के मुताबिक देश की एक-तिहाई आबादी शहरी है और गैर-आधिकारिक अनुमानों के मुताबिक यह अनुपात ज्यादा हो सकता है। केजरीवाल ने भले ही दिल्ली की सत्ता फिर से पा ली हो लेकिन उन्हें नरेंद्र मोदी की तरह देश भर का नेता बनने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ेगा।
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