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बीमारियों पर काबू पाने में मददगार होगी कृत्रिम मेधा

तकनीकी तंत्र
देवांग्शु दत्ता /  February 12, 2020

चीन के वुहान से निकलकर दुनिया भर में फैल चुका नोवेल कोरोनावायरस संक्रामक बीमारियों के खिलाफ लड़ाई में कृत्रिम मेधा (एआई) के प्रभावी एवं व्यापक इस्तेमाल के लिए एक प्रायोगिक मामला होगा। इस नई बीमारी के बारे में आगाह करने वाले शुरुआती लोगों के साथ एआई भी शामिल था। इस बीमारी के संभावित वाहकों एवं पीडि़तों की शिनाख्त एवं अलगाव और उसके अनुमानित असर से संबंधित आंकड़ों से जानकारी जुटाने में भी एआई का इस्तेमाल किया जा रहा है। एआई के जरिये इसकी वैक्सीन तैयार करने और मौजूदा दवाओं की पहचान की कोशिशें भी की जा रही हैं।

 
उपलब्ध खबरों एवं आंकड़ों का एआई से विश्लेषण करने वाली कनाडा की कंपनी ब्लूडॉट ने कोरोनावायरस को लेकर शुरुआती चेतावनियां जारी की थीं। कई देशों के कारोबारी एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारी इसके ग्राहक हैं। ब्लूडॉट ने गत 31 दिसंबर को जारी एक परामर्श में कहा था कि यात्रियों को वुहान शहर जाने से परहेज करना चाहिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने भी गत 9 जनवरी को ऐसा ही एक सार्वजनिक नोटिस जारी किया था जबकि अमेरिका के रोग नियंत्रण केंद्र ने अपनी पहली चेतावनी 6 जनवरी को जारी की थी। ब्लूडॉट एआई ने एयरलाइंस के वैश्विक टिकट आंकड़ों का इस्तेमाल करते हुए इस वायरस के बैंकॉक, सोल, ताइपे और टोक्यो तक पहुंच जाने के बारे में एकदम सटीक अनुमान लगाए। इसके पहले ब्लूडॉट ने फ्लोरिडा में जिका वायरस के फैलने के बारे में भी ऐसा ही सटीक अनुमान लगाया था। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल द्वारा संचालित एक अंतरराष्ट्रीय टीम मशीन लर्निंग का इस्तेमाल कर सोशल मीडिया पोस्ट, समाचार रिपोर्ट, सरकारी स्वास्थ्य माध्यमों से मिले आंकड़े और डॉक्टरों से मिली सूचनाओं का विश्लेषण करती है ताकि वायरस के प्रसार से जुड़े लक्षण पता लगाए जा सकें।
 
संभावित संक्रमण के फुटप्रिंट पर कुछ एआई-आधारित अनुमान बेहद डरावने हैं लेकिन उनके गलत होने की ही संभावना अधिक है। वित्तीय तकनीक कंपनी हेजचैटर ने एक तटस्थ नेटवर्क बनाया है जो संक्रमित लोगों की संख्या, भौगोलिक विस्तार और मौतों के आंकड़े का दैनिक आधार पर पूर्वानुमान लगा सके। फरवरी की शुरुआत तक यह मॉडल वास्तविक संख्या से महज तीन फीसदी ही फर्क रहा। यह बताता है कि अगले 45 दिनों में दुनिया की कुल सात अरब आबादी में से करीब 2.5 अरब लोग इस वायरस से संक्रमित हो सकते हैं और मरने वालों की संख्या 5.2 करोड़ के भयानक स्तर तक जा सकती है। हालांकि ऐसा तभी हो सकता है जब इस बीमारी के प्रसार से संबंधित हालात और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिक्रिया बदलती नहीं है। खतरे की घंटी बज जाने के बाद पूरी संभावना है कि संक्रमित एवं मृतकों की संख्या काफी कम रहेगी क्योंकि हालात में तेजी से बदलाव आया है। 
 
चीन के अधिकारियों ने भी आंकड़ों को खंगालने के लिए एआई का इस्तेमाल किया है। इसके बाद एक पूरे प्रांत में रहने वाले करीब 4.5 करोड़ लोगों की घेराबंदी कर दी गई है। अधिकारियों ने प्रभावित इलाकों की यात्रा करने वाले लोगों को भी निषिद्ध कर दिया है। प्रशासन ने ऐसे मोबाइल ऐप जारी किए हैं जिनकी मदद से लोग यह पता कर सकते हैं कि किसी बस, ट्रेन या विमान में यात्रा के दौरान कोई पुष्ट संक्रमित व्यक्ति तो उसमें नहीं सवार है। निश्चित रूप से यह सब चीन की साम्यवादी व्यवस्था के सख्त निगरानी इंतजामों के कारण ही संभव हो पाया है जिसमें किसी नागरिक की निजता के उल्लंघन को लेकर कोई फिक्र नहीं होती है। 
 
गूगल की तरह चीन में लोकप्रिय सर्च इंजन बायडू ने एक प्रणाली लागू की है जो इन्फ्रारेड और चेहरा पहचान तकनीक का इस्तेमाल कर यह पता लगाती है कि किसी व्यक्ति के शरीर का तापमान सामान्य से अधिक तो नहीं है। उसने एक मिनट में 200 से अधिक लोगों की पड़ताल करने का दावा किया है जो हवाईअड्डों पर लगे थर्मल स्कैनरों से काफी तेज है। मेडिकल शोध के मोर्चे पर चीन ने इस बीमारी की जीनोम-संरचना जारी कर दी है। इस जीनोम के कई संस्करणों का भी पता चला है और चीन के बाहर भी उनकी मौजूदगी मिली है। एआई से यह पता लगाने की कोशिश भी की जा रही है कि पहले से उपलब्ध दवाएं इस बीमारी के इलाज में कितनी कारगर हो सकती हैं? ब्रिटिश स्टार्टअप बेनेवलेंट एआई और कोरियाई दवा कंपनी डियरजेन दोनों ने इस वायरस पर असर करने वाली दवाओं की शिनाख्त करने की कोशिश की है। अमेरिकी दवा कंपनी गिलीयड भी ऐसी कोशिश कर रही है।
 
ऐसे मामलों में एआई ने मेडिकल आंकड़ों और वैज्ञानिक शोधपत्रों को खंगालकर असरकारक दवाएं पता करने की कोशिश की। कई दूसरी कंपनियों ने भी यही तरीका अपनाया है और अब तक ऐसी 10 दवाओं की सूची बनाई जा चुकी है जिनका परीक्षण जल्द ही शुरू होने जा रहा है। अमेरिका-आधारित जैव-प्रौद्योगिकी कंपनी इंसिलिको नए अणुओं की पहचान एवं सृजन के लिए एआई का इस्तेमाल कर रही है जिनका इस्तेमाल संभावित इलाज में किया जा सके। इसका मकसद ऐसे करीब 100 नए अणुओं का संश्लेषण एवं परीक्षण करना है। इंसिलिको के एआई को मेडिकल संभावनाओं वाले नए अणुओं की पहचान करने में महज चार दिन ही लगे। इंसिलिको ने इन सभी नए अणु संरचनाओं को प्रकाशित करने की बात कही है। 
 
एआई के चलते उस जरूरी समय सीमा को घटाकर महज कुछ दिनों का कर दिया है जबकि पहले ऐसी गंभीर बीमारियों के इलाज खोजने में कई महीने और साल लग जाते थे। किसी महामारी के समय तो यह और भी जरूरी हो जाता है। आज का बेहद तेज संपर्क वाला दौर बीमारियों को भी बहुत तेजी से फैला सकता है और एआई प्रणाली इस खतरे को दूर करने का एक तरीका हो सकता है। 
Keyword: Corona virus, china, india, AI,,
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