बिजनेस स्टैंडर्ड - भारत में ई-कॉमर्स की परिस्थितियां
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भारत में ई-कॉमर्स की परिस्थितियां

अजित बालकृष्णन /  February 12, 2020

ई-कॉमर्स की कार्य पद्घति और पारंपरिक कारोबार पर उसके प्रभाव को स्पष्ट करते हुए देश में ई-कॉमर्स की गतिविधियों को लेकर विस्तार से जानकारी प्रदान कर रहे हैं अजित बालकृष्णन

 
यदि आप निरंतर आ रही इन खबरों को लेकर भ्रमित हैं कि एक ओर ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइटों को भारी नुकसान हो रहा है तो वहीं दूसरी ओर निजी इक्विटी निवेशक बहुत बड़े पैमाने पर उनका बाजार पूंजीकरण भी कर रहे हैं, तो आप निश्चिंत हो जाइए क्योंकि इससे केवल आप ही भ्रमित नहीं हैं। इंटरनेट आधारित कारोबार जिस तरह चलते हैं, खासतौर पर उपभोक्ता ई-कॉमर्स से जुड़े कारोबार, उन्हें चलाने का तरीका पारंपरिक कारोबारों के संचालन के तरीके से अलग होता है। इन नई प्रक्रियाओं के सामने आने के बीच देश में उपभोक्ता ई-कॉमर्स के इर्दगिर्द छिड़े विवादों को लेकर तार्किक नीतिगत रुख अपनाने में अभी काफी वक्त लगेगा।
 
इंटरनेट आधारित किसी भी कारोबारी मॉडल के मूल में सबसे अहम बात होती है उत्पादक या आयातक तथा उपभोक्ता या ग्राहक के बीच थोक विक्रेताओं और डीलरों की कई परतों को खत्म करना। यदि मोबाइल फोन हेडफोन की बात करें तो चीन के शेनझेन प्रांत में मौजूदा निर्माता उसे शेनझेन की किसी कंपनी को बेचता है, जिसके भारत के साथ कारोबारी संपर्क होते हैं, वह उन हेडफोन को दिल्ली में किसी कारोबारी को बेचती है जो उनका आयातक कहलाता है। इसके बाद आयातक उन हेडफोन को मुंबई (महाराष्ट्र का थोक विक्रेता) में बेच देता है। यह थोक विक्रेता अब हेडफोन को पुणे में किसी वितरक को बेचता है। उक्त वितरक हेडफोन को पुणे के विमान नगर इलाके में किसी खुदरा दुकानदार को बेचता है। इसके बाद वह ग्राहक तक पहुंचता है।
 
इस पूरी कड़ी को जोड़ें तो विनिर्माता से लेकर पुणे में अंतिम उपभोक्ता के बीच पांच और कडिय़ां होती हैं। जब चीनी निर्माता और पुणे का उपभोक्ता इंटरनेट को अपना लेते हैं और इसके इस्तेमाल में दक्ष हो जाते हैं तो पुणे का उपभोक्ता उस हेडफोन को सीधे शेनझेन के विनिर्माता की वेबसाइट से ऑर्डर कर सकता है। इस प्रकार दोनों के बीच की पांच कडिय़ां गैर जरूरी हो जाती हैं। उनके लिए कोई काम ही नहीं बचा। उन्हें अपना कारोबार बंद करके सारे कर्मचारियों को निष्कासित करना होगा। जाहिर सी बात है बीच के पांच कारोबारियों के बाहर हो जाने से चीन के निर्माता द्वारा बने हेडफोन पुणे के उपभोक्ता के लिए नाटकीय रूप से सस्ते हो जाते हैं और निर्माता का मुनाफा भी काफी बढ़ जाता है। तार्किक सोच रखने वाले इसे स्वीकार करेंगे कि किफायत का अर्थ भी यही है और यह कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था के लिए भी बेहतर है।
 
परंतु इसका छोर कहां है? एक बात तो यह कि इस शृंखला को समाप्त करने के लिए बड़ी तादाद में ई-कॉमर्स कंपनियां सामने आ गई हैं। ये निर्माताओं और अंतिम उपभोक्ता दोनों को सब्सिडी की सुविधा देकर इसे बढ़ावा देते हैं। उन्हें आशा है कि इससे उपभोक्ता खुदरा दुकान से खरीदारी करना बंद कर देंगे और उनकी साइट को प्राथमिकता देंगे। इस सब्सिडी से नुकसान होता है लेकिन निजी पूंजी और वेंचर कैपिटल तब तक उनको नकदी मुहैया कराएंगे जब तक कि उपरोक्त शृंखला के पांचों बिचौलिया तत्त्व पूरी तरह खत्म नहीं हो जाते।
 
भारत जैसे देशों की बात करें तो यहां यह चार स्तरीय शृंखला यानी भारतीय आयातक-राज्य स्तरीय वितरक, शहर स्तर का वितरक और दुकान, ही वह क्षेत्र है जहां आर्थिक शक्ति निहित है। इन वितरण कारोबार पर काबिज लोग ही चैंबर्स ऑफ कॉमर्स, रोटरी क्लब और लॉयंस क्लब आदि का नेतृत्व करते हैं और स्थानीय सहकारी बैंकों तथा शैक्षणिक संस्थानों के बोर्ड में होते हैं। दूसरे शब्दों मे कहें तो यही लोग देश के कारोबारी जगत के भद्र जन हैं। दूसरे दृष्टिकोण से देखें तो यह चार स्तरीय शृंखला ही जीडीपी के 30 से 40 फीसदी और देश के रोजगार में 55 फीसदी के लिए उत्तरदायी है। इस शृंखला को पूरी तरह समाप्त करने से देश में आधे रोजगार समाप्त हो जाएंगे।
 
उपभोक्ता व्यवहार के वे कौन से रुझान हैं जो दुनिया भर में उपभोक्ता उत्पाद ई-कॉमर्स कंपनियों के व्यवहार को आकार दे रहे हैं? शुरुआती सवाल यह है कि सन 1990 के दशक में अपनी शुरुआत के बाद से ऑनलाइन शॉपिंग का आकार कितना बढ़ा है? इसके विश्वसनीय आंकड़े केवल अमेरिका के लिए उपलब्ध हैं: अमेरिकी सरकार के आंकड़ों के अनुसार सन 2019 की अंतिम तिमाही में वहां खुदरा ई-कॉमर्स बिक्री कुल खुदरा बिक्री के 10.5 फीसदी के बराबर थी। परंतु यह समग्र आंकड़ा कई गतिविधियों को छिपा लेता है। उदाहरण के लिए कई पारंपरिक ऑफलाइन डिपार्टमेंट स्टोर मसलन वॉलमार्ट आदि ऑनलाइन बिक्री बढ़ा रहे हैं। वहीं पारंपरिक रूप से ऑनलाइन रहे एमेजॉन जैसे बाजारों ने उत्पादों पर अपना लेबल लगाना शुरू कर दिया है। ऑनलाइन ई-कॉमर्स कुछ श्रेणियों मसलन किताबों, फैशन, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स आदि में फलफूल रहा है लेकिन अन्य क्षेत्रों में उसे अभी प्रभाव बनाना है।
 
परंतु लगातार बढ़ते ऑनलाइन उपभोक्ता आपूर्ति के लिए वसूले जाने वाले शुल्क से नाराज हैं और वे एक या दो दिन के भीतर आपूर्ति चाहते हैं। इसे हासिल करने के ऑनलाइन कंपनियां गोदामों में निवेश कर रही हैं और उद्योग पर दबदबा बरकरार रखने के लिए उन्हें आपूर्ति शुल्क और उत्पाद मूल्य पर सब्सिडी भी देनी पड़ रही है। सब्सिडी का ऐसा इस्तेमाल इसलिए हो रहा है क्योंकि अमेरिकी वित्तीय समुदाय में यह विश्वास है कि जो विजेता होगा, सबकुछ उसका ही होगा। यानी बाजार की शीर्ष कंपनी को सबसे अधिक मुनाफा होगा। 
 
सन 2020 में भारत की दुविधा 19वीं सदी के आखिरी दौर में हमारे समक्ष मौजूदा दुविधा से अलग नहीं है। उस वक्त कपड़ा बनाने और बुनाई मशीनों के आगमन के बाद देश के हथकरघा बुनकरों की आजीविका खतरे में पड़ गई थी। ऐसी मशीनों के इस्तेमाल ने लोगों को बड़े पैमाने पर बेरोजगार किया था लेकिन इससे सूती कपड़ा सस्ता और जनसुलभ भी हुआ था। वह केवल जमींदारों और अमीरों के लिए सस्ता नहीं हुआ था। उपभोक्ता ई-कॉमर्स से जुड़े विवादों से अपनी आंखें मूंद लेने का परिणाम यह हो सकता है कि यदि ई-कॉमर्स की प्रगति प्रभावित हुई तो देश की अर्थव्यवस्था कम प्रतिस्पर्धी रह जाएगी। चुनिंदा कंपनियों खासकर विदेशी कंपनियों का दबदबा होने का अर्थ राष्ट्रीय स्तर पर आत्मघाती होगा। देश के प्रतिस्पर्धा कानून में सुधार के लिए काफी प्रयास करने होंगे। इसके अलावा यदि हमें ई-कॉमर्स की पूरी क्षमताओं का लाभ लेना है तो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से संबंधित कानून और वेंचर फंडिंग से जुड़े कराधान कानून में भी सुधार करना होगा। 
Keyword: e commerce, online, india,,
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