बिजनेस स्टैंडर्ड - घरेलू समस्याओं का हो रहा वैश्विक प्रभाव
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घरेलू समस्याओं का हो रहा वैश्विक प्रभाव

अनीता इंदर सिंह /  February 11, 2020

अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर और सामाजिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में देश जिन हालात से गुजर रहा है उनका असर मित्र राष्ट्रों तथा शेष विश्व के साथ रिश्तों पर पड़ सकता है। बता रही हैं अनीता इंदर सिंह

 
भारत यदि सन 2020 में अपनी क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिति को मजबूत करना चाहता है तो उसे आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से अपने आपको बेहतर बनाना होगा। दो घरेलू घटनाओं, भारत के आर्थिक पराभव और नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) ने न केवल एशिया बल्कि विश्व भर में उसके कदम को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है। इन घटनाओं ने अमेरिका, जापान, आसियान देशों, बांग्लादेश, ईरान और सऊदी अरब जैसे मित्र देशों तथा यूरोपीय संसद के साथ हमारे रिश्तों को सवालों के घेरों में ला दिया है। 
 
भारत और अमेरिका के सामने चीन के रूप में एक साझा चुनौती है। इसके साथ ही साथ भारत को अपने नागरिकों की जीवन गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए प्रगति की बेहद आवश्यकता है। सीएए ने भारतीय नागरिकता के लिए धर्म को भी एक आवश्यक परीक्षा बना दिया है। ऐसा कानून तकनीकी रूप से उन्नत विश्व से मुकाबला करने में भारत की मदद नहीं करने वाला, भारत इससे सशक्त नहीं होगा। यह कानून केवल यही बात रेखांकित करता है कि किस तरह भारत 21वीं सदी में एक हिंदू बहुसंख्यकवादी राज्य बनाने की बनाने की दिशा में आगे बढ़ रह रहा है। हकीकत में यह यात्रा पीछे धकेलने वाली है। वर्ष 2004 के बाद कुछ वर्षों तक भारत दुनिया के तीन या चार सबसे तेज विकसित होते देशों में शामिल था। आज यह शीर्ष 40 में भी शामिल नहीं है। इतना ही नहीं भारत अपने सशस्त्र बलों का आधुनिकीकरण करने में भी नाकाम रहा और हिंद महासागर क्षेत्र में भी वह बिना अमेरिकी मदद के अपनी स्थिति बरकरार रखने में सक्षम नहीं है। 
 
21वीं सदी में समुद्री शक्ति बड़ी ताकत बनने के लिए आवश्यक है। चीन की आर्थिक और सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण पहल बेल्ट ऐंड रोड दिखाती है कि हिंद महासागर के अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में उसकी नौसैनिक पहुंच कितनी मजबूत हो चुकी है। उसे रूस और ईरान से समर्थन भी मिला है। ये वे मुल्क हैं जो भारत के मित्र हुआ करते हैं। परंतु भारत की तुलना में चीन के साथ उनके कारोबारी और निवेश संबंधी रिश्ते अधिक मजबूत हैं। किसी भी देश की विदेश नीति कई जटिल कारकों पर निर्भर करती है। चीन और रूस के बीच की सामरिक साझेदारी के पीछे अमेरिका के वैश्विक रसूख को चुनौती देने की समझ नजर आती है। यही कारण है कि वे हिंद महासागर में अपनी पहुंच बढ़ा रहे हैं। नवंबर 2019 में रूस ने चीन और दक्षिण अफ्रीका के साथ आशा अंतरीप में नौसैनिक अभ्यास किया। उसने 27 दिसंबर को चीन और ईरान के साथ होरमुज जलडमरूमध्य में अभ्यास किया। दुनिया के कुल तेल परिवहन का पांचवां हिस्सा यहां से गुजरता है। प्रतिबंधों से प्रभावित ईरान अब यह दावा कर सकता है कि हिंद महासागर में उसके पास दो ताकतवर मित्र हैं। रूस पश्चिम एशिया में अहम भूमिका निभा सकता है जबकि चीन अपनी नौसैनिक शक्ति प्रदर्शित कर रहा है। इस बीच भारत ने कई वर्ष की बातचीत के बाद अंतिम क्षणों में क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसेप) से बाहर रहने का निर्णय लिया। यह दक्षिण पूर्व और पूर्वी एशिया में उसकी छवि के लिए बहुत अच्छी बात नहीं है। एशिया के बहुपक्षीय व्यापार समझौतों से बाहर रहकर भारत इस क्षेत्र के आर्थिक भविष्य में क्या योगदान दे पाएगा? देश की अर्थव्यवस्था डूब रही है। वह आसियान देशों, जापान और दक्षिण कोरिया से पीछे है, ऐसे में चीन का मुकाबला करने की बात मुश्किल ही है। 
 
सीएए भी मित्र राष्ट्रों के साथ भारत के रिश्तों में मुश्किल की वजह बना है। सीएए पारित होने के बाद दिसंबर में पूर्वोत्तर भारत में हिंसा भड़कने के पश्चात भारत के मित्र माने जाने वाले जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपनी वार्षिक बैठक रद्द कर दी थी। पड़ोसी देश बांग्लादेश भी सीएए से आहत है। भारत ने अपने यहां आए बांग्लादेशियों को दीमक कहकर पुकारा जिससे रिश्ते और खराब ही होने थे। पिछले दिनों बांग्लादेश के विदेश मंत्री और गृह मंत्री ने भारत की आधिकारिक यात्रा रद्द कर दी। विदेश मंत्री ए के अब्दुल मोमेन ने कहा कि सीएए भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को कमजोर करता है और इससे उत्पन्न अस्थिरता पड़ोसी देशों को प्रभावित कर सकती है। अन्य मित्रवत रहे मुस्लिम बहुल देश भी भारत का समर्थन नहीं कर रहे। गत सितंबर में भारत ने सऊदी अरब को एक मूल्यवान मित्र बताया था क्योंकि वह देश के ऊर्जा क्षेत्र में 100 अरब डॉलर का निवेश करना चाहता था। लेकिन अब खबर है कि सऊदी विदेश मंत्री की पाकिस्तान के विदेश मंत्री के साथ टेलीफोन पर बातचीत में कश्मीर मसले का भी जिक्र हुआ।  
 
अमेरिका भारत का सबसे बड़ा रणनीतिक साझेदार है। परंतु देश की अर्थव्यवस्था में आ रही गिरावट, भारत के सैन्य आधुनिकीकरण न कर पाने तथा उसके संरक्षणवादी रुख के कारण कारोबार में गिरावट के कारण यह रिश्ता भी प्रभावित हुआ है। एमेजॉन द्वारा भारत में निवेश की पेशकश पर भारत के आधिकारिक रुख से भी भारत की कारोबार के अनुकूल होने की प्रतिष्ठा बढ़ेगी नहीं। इसके अलावा कश्मीर और सीएए पर भारत के रुख ने भी अमेरिका और यूरोप के सांसदों के बीच आधुनिक लोकतांत्रिक देश होने की उसकी छवि को प्रभावित किया है। 
 
अमेरिकी कांग्रेस में भारत के लोकतंत्र को लेकर जो सवाल उठे उन्हें आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता। कांग्रेस के सदस्य चाहें तो भारत को हथियारों की बिक्री रुकवा सकते हैं या प्रतिबंध भी लागू कर सकते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि भारत एस-400 मिसाइल सिस्टम की रूस से खरीद करेगा। अंतरराष्ट्रीय इतिहास पर नजर डालें तो वह भी बताता है कि किसी देश की आर्थिक कमजोरी और सामाजिक-राजनीतिक तनाव का लाभ विदेशी मुल्क उठाते हैं। भारत के आर्थिक कद में आ रही कमजोरी और समाज में बढ़ता ध्रुवीकरण अमेरिका, जापान और आसियान देशों को यह मौका प्रदान कर रहे हैं कि वे उसकी बड़ी एशियाई शक्ति बनने की क्षमता पर सवाल उठा सकें। जबरदस्त राजनीतिक बहुमत वाली सरकार होने के बावजूद अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने और सामाजिक आर्थिक हालात को स्थिर करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं किया जा रहा है। इसके अलावा सीएए भी देश के लोकतांत्रिक मित्रों मसलन अमेरिका और जापान आदि को नाखुश कर रहा है। वहीं सऊदी अरब जैसे अधिनायकवादी देश भी इसका समर्थन नहीं कर रहे। आर्थिक क्षेत्र में ये सभी देश भारत के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। अमेरिका का महत्त्व सबसे अधिक है। यूरोपीय संसद ने सीएए की आलोचना की है। यह बात यूरोपीय संघ और भारत की बैठक पर असर डालेगी। क्या देश की आर्थिक गिरावट और सामाजिक राजनीतिक स्थिति देश के मित्रों के साथ उसके रिश्ते जोखिम में डाल रहे हैं? 
 
(लेखिका सेंटर फॉर पीस ऐंड कॉन्फ्लिक्ट रिजॉल्यूशन, नई दिल्ली की संस्थापक प्रोफेसर हैं)
Keyword: india, economy, GDP, asia, CAA,,
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