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प्रकृति के साथ हमारे कुत्सित संबंधों से विषाणु की समस्या

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  February 10, 2020

इसे कीड़े का प्रतिशोध कहें। नए कोरोनावायरस ने चीन की अर्थव्यवस्था को जो नुकसान पहुंचाया है, वह अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप भी नहीं कर सके। इस वायरस को 2019-एनसीओवी नाम दिया गया है। इसने दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को बुरी तरह झकझोर दिया है, उत्पादन ठहर गया है, शहरों की रफ्तार थम गई है और लोगों को अलग-थलग कर दिया गया है। इस संक्रमण के प्रसार को रोकने के लिए संभवत: अब तक के सबसे व्यापक प्रयास किए जा रहे हैं। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने इसे वायरस के खिलाफ जनता की लड़ाई बताया है। लेकिन चिंताजनक सवाल यह है कि करीब एक महीने में इससे 900 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और 40 हजार से अधिक लोग संक्रमित हैं। आखिर इसका खात्मा कब होगा? यह वायरस दो सप्ताह से अधिक समय तक निष्क्रिय रहता है। इस दौरान संक्रमित लोगों में कोई लक्षण नहीं दिखाई देते हैं। अच्छी बात यह है कि इसकी मृत्यु दर कम है। लेकिन इसके फैलने का खतरा बहुत अधिक है क्योंकि यह हवा के जरिये एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता है। इसके प्रसार को रोकने का यही तरीका है कि संभावित मरीज को अलग-थलग रखा जाए।

 
लेकिन आपस में जुड़ी दुनिया में इसके क्या मायने हैं? एक ऐसी दुनिया जिनमें सीमा के आरपार लोगों की आवाजाही और व्यापार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है। इस तथ्य पर गौर कीजिए। दुनिया में पहली बार 2003 में इस तरह का स्वास्थ्य संकट देखने को मिला था जब सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (सार्स) का कहर बरपा था तो दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में चीन की हिस्सेदारी केवल 4 फीसदी थी। आज यह 16 फीसदी है। इसी से दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए चीन की अहमियत को समझा जा सकता है। यह दुनिया में सस्ते सामान की आपूर्ति शृंखला है। इसलिए चीन में स्वास्थ्य संकट से पूरी दुनिया में कारोबार प्रभावित होगा। साथ ही अब दुनिया में बड़ी संख्या में लोग एक देश से दूसरे देश जाते हैं, इसलिए वायरस के तेजी के फैलने की आशंका भी ज्यादा है। इसमें कोई दोराय नहीं है कि इस संकट से निपटने के लिए सरकारें हरसंभव प्रयास कर रही हैं। लेकिन इससे हमारी साझा कमजोरी दिखती है कि कैसे एक आम सर्दी जुकाम दुनिया के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। 
 
यह 2003 के सार्स और 2012 में फैले मिडल ईस्ट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (मर्स) से ज्यादा गंभीर है। इन सभी मामलों में चमगादड़ में पाया जाने वाला वायरस जानवरों से इंसानों में आया है। सार्स के मामले में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने पाया कि वायरस सिवेट कैट, रैकून डॉग और बिज्जू के जरिये इंसानों में आया। 2019-एनसीओवी के मामले में अब तक यह साफ नहीं है कि यह इंसानों में कैसे आया। कहा जा रहा है कि कि जहां से इसकी शुरुआत हुई वहां के स्थानीय बाजार में चमगादड़ नहीं बेचा जाता है। वैज्ञानिक  अभी इस बारे में जांच कर रहे हैं लेकिन सच्चाई यह है कि इंसानों में जीवों से होने वाली बीमारियों की संख्या बढ़ती जा रही है। इनमें स्वाइन फ्लू से एवियन इनफ्लूएंजा शामिल हैं। ये ऐसी बीमारियां हैं जो जानवरों से इंसान में फैल रही हैं और महामारी का रूप ले रही हैं। 
 
सच्चाई यह है कि प्राकृतिक दुनिया के साथ हमारे कुत्सित संबंधों के कारण वायरस जानवरों से इंसानों में आ रहे हैं। एक तरफ हम हर तरह के रसायन और जहरीले पदार्थों को अपने खाद्य पदार्थों में मिला रहे हैं। इससे हम खाद्य पदार्थों को पोषण के बजाय बीमारी का स्रोत बना रहे हैं। जानवरों और यहां तक कि फसलों को ऐंटीबायोटिक की खुराक दी जा रही है। इसकी वजह बीमारी पर काबू पाना नहीं है बल्कि जानवरों का वजन बढ़ाना है ताकि ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाया जा सके। इससे इंसान की प्रतिरोधक क्षमता बुरी तरह प्रभावित हो रही है। दूसरी तरफ, हम अपने भोजन में उन तरीकों को बढ़ा रहे हैं जो रोग बढ़ाने के अनुकूल हैं। जानवरों का मांस बड़े-बड़े कारखानों में प्रसंस्कृत किया जा रहा है जो दुनिया में तेजी से संक्रमण का स्रोत बन रहा है। याद रखिए कि स्वाइन फ्लू की शुरुआत मैक्सिको में सूअर के मांस का प्रसंस्करण बनाने वाले कारखानों से हुई थी। इससे पानी प्रदूषित हुआ था। इंसान और जानवरों के पर्यावास के बीच सीमाओं के टूटने से इस तरह की बीमारियों की संख्या बढ़ेगी। आज की आपस में जुड़ी हुई दुनिया और वैश्वीकरण के दौर में इस तरह का संक्रमण तेजी से फैलेगा। 
 
दुनिया में जिस तरह से कारोबार होता है, वह भी सवालों के घेरे में है। सच्चाई यह है कि बीमारी से जलवायु परिवर्तन तक दुनिया की कमजोरी बढ़ेगी। पिछले तीन दशकों में दुनिया ने एक एकाकी व्यापार व्यवस्था के निर्माण में निवेश किया जिसमें स्थानीय या क्षेत्रीय नियंत्रण के लिए कोई जगह नहीं है। गरीबों की जोखिम प्रबंधन व्यवस्थाओं से हमें यह सीखना चाहिए कि विविधता अस्तित्व की कुंजी है। हमारे किसान हमेशा फसल और पशुपालन के जरिये कम से कम जोखिम उठाते हैं। वे तरह-तरह की फसलें उगाते थे। वैज्ञानिकों का कहना है कि हर इलाकों में 50 से अधिक फसलें उगाई जाती हैं। उन्होंने उन कारकों पर अपनी निर्भरता कम की जिन पर उनका वश नहीं था। इसके बजाय उन्होंने ज्यादा लचीली स्थानीय अर्थव्यवस्था बनाने पर जोर दिया। अब मैं जानती हूं कि हम वैश्वीकरण की प्रक्रिया को पीछे नहीं मोड़ सकते हैं और इस तरह इस विश्व व्यापार व्यवस्था से छुटकारा नहीं पा सकते हैं। यह मुनाफे वाली है और हर कोई विश्व आपूर्ति शृंखला के साथ जुडऩा चाहता है। लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि दुनिया में कुछ झटके हमारा इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में हमें वैश्वीकरण की अवधारणा पर पुनर्विचार करना चाहिए। आइए पहले स्थानीयकरण पर काम करके शुरुआत करें।
 
(लेखिका सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट से संबद्ध हैं।)
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