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गैरजरूरी कदम

संपादकीय /  February 10, 2020

जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्रियों महबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला के खिलाफ सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) डॉजियर दुनिया के सर्वाधिक अधिनायकवादी शासन व्यवस्था से आया प्रतीत होता है। 42 वर्ष पुराना यह अधिनियम किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने की इजाजत देता है ताकि वह इस तरह काम न कर सके जो राज्य की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के खिलाफ हो। यह गिरफ्तारी दो वर्ष तक के लिए हो सकती है। मुफ्ती और अब्दुल्ला ने नजरबंदी के छह महीने पूरे किए हैं। उनके खिलाफ यह डॉजियर विचित्र है। बिना ठोस प्रमाण के दोनों नेताओं के खिलाफ लगे आरोप एक जीवंत लोकतंत्र में नेताओं की सामान्य गतिविधियों पर लगे आरोप हैं। मसलन, मुफ्ती को बिना किसी स्पष्टीकरण के 'पिता की प्यारी पुत्री' (क्या पिता का करीबी होना सुरक्षा के लिए खतरा है?) कहा गया है जो खतरनाक और कुचक्र में माहिर और हड़पने वाली प्रकृति की हैं। इसके सबूत के रूप में उन वक्तव्यों को पेश किया गया है जो उन्होंने केंद्र सरकार के अनुच्छेद 370 और 35 ए समाप्त करने पर दिए थे। संविधान के ये अनुच्छेद जम्मू कश्मीर नामक पूर्व राज्य को विशेष दर्जा देते थे। मुफ्ती ने केंद्र के कदम की तुलना बारूद के ढेर में आग लगाने से की थी और तीन तलाक को आपराधिक बनाए जाने के खिलाफ ट्वीट किए थे। ऐसी बातें तो तमाम टिप्पणीकारों ने की थी। क्या इस बात से वह सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा बन गईं?

 
डॉजियर में कुछ गोपनीय रिपोर्टों के हवाले से यह भी कहा गया है कि वह अलगाववादियों से मिलीभगत रखती हैं। गोपनीय रिपोर्ट का हवाला तभी दिया जाता है जब कोई ठोस प्रमाण नहीं होता। शायद उनकी इस मांग को देश के खिलाफ माना गया हो कि मौत के बाद आतंकियों के शव के साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाना चाहिए। एक असहज करने वाला तथ्य यह है कि भारतीय जनता पार्टी ने 2016 से 2018 तक इन्हीं महबूबा मुफ्ती की पार्टी से गठबंधन किया था। अब्दुल्ला के खिलाफ सबूत के रूप में भी अनुच्छेद 370 और 35 ए के समर्थन में उनके भाषणों और उनके इस वक्तव्य को पेश किया कि अनुच्छेदों को खत्म करने से जम्मू कश्मीर के संवैधानिक दर्जे पर बहस फिर शुरू हो जाएगी। यह कहा गया है कि उन्हें इसलिए बंदी बनाया गया है क्योंकि उनमें लोगों को किसी भी काम के लिए प्रभावित करने की क्षमता है। इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया गया है कि वह आतंकी गतिविधियों और चुनाव के बहिष्कार के चरम दिनों में भी लोगों को वोट देने के लिए घर से बाहर निकलने के लिए प्रेरित कर लेते थे। यह अत्यंत विसंगतिपूर्ण बात है। 
 
कहा जा सकता है कि दोनों नेता अपने ही हथियार के शिकार हो गए। क्योंकि राज्य सरकार सन 1978 में पारित होने के बाद से आए दिन इस कानून का प्रयोग करती रहती थी। परंतु केंद्र ने जिन सबूतों पर कार्रवाई की है वे यही बताते हैं कि यह जम्मू कश्मीर का दर्जा बदलने के निर्णय की आलोचना के प्रतिक्रिया में किया गया। यह भी ध्यान देने लायक बात है कि उसने पीएसए अधिनियम में 2018 में किए गए संशोधन का पूरा इस्तेमाल किया। इसके तहत लोगों को राज्य के बाहर भी बंदी बनाया जा सकता है। यह सब सन 1919 के रॉलेट ऐक्ट की मुखालफत करने वालों के प्रति ब्रिटिशों की प्रतिक्रिया जैसा है। अंतर केवल यह है कि वह दमन एक औपनिवेशिक शक्ति ने किया था। केवल भाजपा ही नहीं देश की तमाम सरकारें ऐसे कदम उठाती रही हैं। सन 1971 में पारित विवादास्पद आंतरिक सुरक्षा रखरखाव अधिनियम (मीसा) को याद कीजिए। दुखद है कि यह परंपरा जारी है। यदि सरकार की आलोचना का नागरिक अधिकार कानून व्यवस्था की चुनौती बन जाए तो लोकतांत्रिक गणराज्य का भविष्य दांव पर लग जाता है। 
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