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कर्जदारों के लिए बेहतर बेंचमार्क दर

जयदीप घोष और बिंदिशा सारंग /  February 09, 2020

अगर आपने आवास ऋण लिया है या आप सूक्ष्म, छोटे या मझोले आकार का कोई उद्यम चलाने के लिए कर्ज ले चुके हैं तो आपके पास अब एक नया विकल्प आ गया है। यह विकल्प है बाहरी बेंचमार्क से जुड़े कर्ज का। भारतीय रिजर्व बैंक ने अक्टूबर में कहा था कि फ्लोटिंग दर वाले सभी ऋणों को बाहरी बेंचमार्क से जोडऩा ही पड़ेगा। कर्ज मांगने वालों को अब इसी तरह की दरें मिलेंगी।

भारतीय स्टेट बैंक ने 1 जनवरी से अपनी बाहरी बेंचमार्क दर में 25 आधार अंक की कटौती कर दी। सोमवार से रिजर्र्व बैंक की मौद्रिक नीति समीक्षा के बाद उसने दर में 5 आधार अंक की कमी और कर दी है। इसलिए जिन लोगों का कर्ज इस दर से जुड़ा है, उन्हें फौरन इसका फायदा होने लगेगा। जो लोग बैंक से पहले ही कर्ज ले चुके हैं और जिनकी ब्याज दर बाहरी बेंचमार्क से नहीं जुड़ी है, वे इसे बेंचमार्क से जोडऩे के विकल्प पर अब विचार कर सकते हैं। यह अच्छा विकल्प इसलिए भी होगा कि पहले से चली आ रही बेंचमार्क मसलन कोष की सीमांत लागत पर आधारित उधारी (एमसीएलआर) या उससे भी पुरानी आधार दर अथवा बेंचमार्क प्राइम उधारी दर (बीपीएलआर) के मुकाबले बाहरी बेंचमार्क अधिक पारदर्शी है।

आरबीआई ने बाहरी बेंचमार्क से ब्याज दर जोडऩे का दबाव डालकर बहुत अच्छा किया क्योंकि एमसीएलआर की समीक्षा के लिए रिजर्व बैंक द्वारा 2017 में गठित जनक राज समिति ने पाया था कि चार शीर्ष बैंकों के 30 फीसदी से भी अधिक ग्राहक एमसीएलआर से नहीं जुड़े हैं, जबकि उसे लागू हुए 18 महीने गुजर चुके थे। खराब बात यह थी कि कई ग्राहक उस वक्त भी आधार दर या बीपीएलआर से ही जुड़े हुए थे। इससे साफ हो गया कि लंबी अवधि के लिए कर्ज लेने के बाद ग्राहक नए घटनाक्रम या बदलावों की खबर लेना बंद कर देते हैं या अक्सर आलस की वजह से कोई बदलाव नहीं करते।

प्लान अहेड वेल्थ एडवाइजर्स के संस्थापक तथा मुख्य कार्य अधिकारी विशाल धवन कहते हैं, 'हमारी सलाह यही है कि बाहरी बेंचमार्क दर से अपना कर्ज जोड़ लिया जाए। भारत में दरों में कटौती से जुड़ी एक बड़ी चुनौती हमेशा रही है, जो बैंकों की ओर से आती है। बैंक पहले ही कर्ज ले चुके ग्राहकों को दर कटौती का फायदा बहुत देर में या बहुत कम देते हैं। रिजर्व बैंक ने यही देखकर बाहरी बेंचमार्क दर से कर्ज जोडऩे का दबाव डाला। हमें लगता है कि अब भी आधार दर या एमसीएलआर उधारी प्रणाली से ही जुड़े हुए ग्राहकों को बाहरी बेंचमार्क का रास्ता चुनना चाहिए।'

विवेकतरु के संस्थापक स्वप्निल केंधे की सलाह भी कमोबेश ऐसी ही है। वह कहते हैं, 'जैसे ही बेहतर दर का मौका मिले, उसे दोनों हाथों से लपक लें। चाहें तो उसके लिए दूसरी ऋणदाता संस्था के पास जाएं या मौजूदा ऋणदाता से ही मोलभाव करें।'

फिलहाल ज्यादातर बैंकों ने रीपो दर का बाहरी बेंचमार्क के तौर पर चुना है। कर्ज लेने वालों को रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीतियों से नियमित रूप से रीपो दर का पता चलता रहता है, इसलिए इसमें काफी पारदर्शिता होती है। कई दूसरे फायदे भी हैं। मिसाल के लिए बैंक किसी भी कर्ज का स्प्रेड तय करने के लिए स्वतंत्र होता है, लेकिन वह क्रेडिट-रिस्क प्रीमियम तभी बदल सकता है, जब उधार लेने वाले के क्रेडिट में बहुत अधिक बदलाव होता है। लागत से जुड़े दूसरे घटक जैसे परिचालन लागत या खर्च भी तीन साल में केवल एक बार ही बदलते हैं। चूंकि दरों में बदलाव तीन महीने में एक ही बार होता है, इसलिए मासिक किस्तों में भी बहुत अधिक उतार-चढ़ाव की आशंका नहीं होती।

बाहरी बेंचमार्क से जुडऩे की प्रक्रिया भी मुश्किल नहीं है। जो भी मौजूदा कर्जदार पहले ही भुगतान कर सकते हैं, उन्हें कुछ भी खर्च किए बगैर ही बेंचमार्क से जुड़ी दर अपनाने का मौका मिल जाएगा। रिजर्व बैंक के मुताबिक उन्हें केवल वाजिब प्रशासनिक और कानूनी खर्च चुकाने होंगे। धवन बताते हैं, 'खर्च हो सकते हैं और नहीं भी हो सकते हैं। यह इस पर निर्भर करता है कि ग्राहक अपनी पुरानी ऋणदाता कंपनी के साथ रहकर ही नई दर प्रणाली चुन रहा है या नहीं। इसमें अतिरिक्त खर्च भी होता है। बेहतर है कि आप बाजार में उतरें और दूसरे विकल्प भी तलाशें।'

मगर यह भी ध्यान रखें कि अगर आपका कर्ज अगले दो साल में पूरी चुक जाने वाला है तो बाहरी बेंचमार्क को अपनान फिजूल ही होगा। हां, अगर आपको कर्ज लिए हुए अभी दो-तीन साल ही हुए हैं तो इसे आजमाया जा सकता है।

Keyword: debt, lender, msme, benchmark, sbi, RBI, Monetary policy,
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