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दूर की सोचकर ही करें कर बचाने को निवेश

संजय कुमार सिंह /  February 09, 2020

अगर आप किसी कंपनी में काम करते हैं तो आपके दफ्तर के अकाउंट विभाग से आपके पास मेल आ गया होगा, जिसमें आपसे चालू वित्त वर्ष के दौरान कर बचाने के लिए किए गए निवेश के सबूत मांगे गए होंगे। वास्तव में आपको कर बचाने के लिए निवेश का काम चालू वित्त वर्ष के आरंभ यानी पिछले साल अप्रैल से ही शुरू कर देना चाहिए था। लेकिन अगर आप ऐसा करने से चूक गए तो भी बहुत देर नहीं हुई है। हां, कर बचाने वाली योजनाएं चुनते समय अब आपको दिमागी मशक्कत जमकर करनी होगी या वित्तीय सलाहकार की मदद लेनी होगी।

बीमा एजेंट और बैंक रिलेशनशिप मैनेजर भी आखिरी के तीन महीनों यानी जनवरी से मार्च के बीच बिक्री बढ़ाने के लिए पूरी ताकत झोंक देते हैं। यही वजह है कि इन महीनों में आपके पास बैंक और बीमा कंपनियों से एक के बाद एक फोन आते रहते हैं। यहां भी आपको झांसे में फंसने से बचना होगा। हो सकता है कि वे आपको जो योजना बेच रहे हैं, उसमें उन्हें तो तगड़ा कमीशन मिल रहा है मगर योजना आपके लिए अच्छी नहीं है।

इसीलिए निवेश का फैसला करते समय सावधान रहें। विशेषज्ञों के मुताबिक निवेश का मूल मंत्र यही है कि कर बचाने के लिए किया जा रहा निवेश व्यक्ति के वित्तीय लक्ष्य के मुताबिक ही हो। क्लियरटैक्स के संस्थापक एवं मुख्य कार्य अधिकारी अर्चित गुप्ता कहते हैं, 'सबसे पहले व्यक्ति को अपने दीर्घकालिक और अल्पकालिक वित्तीय लक्ष्य तय करने चाहिए। लक्ष्य तय हो जाएं तो अपनी जोखिम लेने की क्षमता को ध्यान में रखते हुए कर बचाने के मकसद से निवेश करना चाहिए।' 

बीमा की जरूरत टटोलें

सबसे पहले यह ध्यान रखना जरूरी है कि परिवार के कमाऊ सदस्य की मृत्यु होने पर भी परिवार के वित्तीय लक्ष्यों या जीवनशैली पर कोई फर्क नहीं पड़े। इसके लिए पर्याप्त मात्रा में जीवन बीमा खरीदना जरूरी है। जिस पर भी परिवार के लोग मसलन माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी या बच्चे आश्रित हैं या जिस पर आवास ऋण, वाहन ऋण जैसी देनदारियां हैं, उसे अपने परिवार को महफूज रखने के लिए अपना टर्म बीमा जरूर करा लेना चाहिए।

इसके लिए ह्यïूमन लाइफ वैल्यू कैलकुलेटर इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। उनका इस्तेमाल कीजिए और पता कीजिए कि आपको कितनी राशि का जीवन बीमा चाहिए। आप इसके लिए वित्तीय सलाहकार की मदद भी ले सकते हैं। बीमा प्रीमियम पर आयकर अधिनियम की धारा 80सी के तहत छूट मिलती है। लेकिन बीमा की जरूरत पूरी करने के लिए इंश्योरेंस-कम-इन्वेस्टमेंट प्लान कभी मत खरीदिए क्योंकि उनमें आपको काफी कम बीमा कवरेज मिलता है। इसके बाद देखिए कि आपके पास इतना स्वास्थ्य बीमा है या नहीं कि आपके परिजनों के अस्पताल में भर्ती होने पर आपके ऊपर बोझ नहीं आए। महानगरों में एकल परिवार के लिए कम से कम 10 लाख रुपये का फैमिली फ्लोटर बीमा जरूरी है। छोटे शहरों में 5 लाख रुपये के बीमा से भी काम चल सकता है।

सेबी में पंजीकृत वित्तीय सलाहकार पर्सनलफाइनैंसप्लान डॉट इन के संस्थापक दीपेश राघव समझाते हैं, 'जो वरिष्ठï नागरिक की श्रेणी में नहीं आते हैं, उन्हें स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम पर धारा 80डी के तहत 25,000 रुपये तक की छूट मिल जाती है। यदि आप अपने माता-पिता के स्वास्थ्य बीमा का प्रीमियम अदा कर रहे हैं तो आप कुल 75,000 रुपये तक की छूट का दावा कर सकते हैं।'

इंश्योरेंस-कम-इन्वेस्टमेंट कभी नहीं

कई करदाता आयकर बचाने के लिहाज से निवेश करने के लिए आखिरी मौके तक का इंतजार करते हैं। जब आफत सिर पर आ जाती है तो वे किसी भी बीमा एजेंट के पास पहुंच जाते हैं। उस सूरत में अक्सर उनके हाथ में पारंपरिक बीमा योजना पकड़ा दी जाती है जैसे मनीबैक, आजीवन बीमा या एनडाउमेंट प्लान।

इन योजनाओं में कई दिक्कतें होती हैं। पहली दिक्कत तो यही है कि उनमें बीमा शामिल होता है। राघव कहते हैं, 'यदि आपके पास पहले से ही पर्याप्त बीमा है या आपको बीमा की जरूरत ही नहीं है तो आप बेवजह ही इन योजनाओं पर मॉर्टेलिटी शुल्क चुकाते रहेंगे। जिनकी उम्र ज्यादा होती है, उनके लिए मॉर्टेलिटी शुल्क भी ज्यादा ही होता है।' आप जो भी प्रीमियम अदा करते हैं, उसका एक हिस्सा मॉर्टेलिटी शुल्कों में चला जाता है और इन योजनाओं से प्रतिफल कम हो जाता है। इतना ही नहीं इस तरह की योजनाएं ज्यादातार बॉन्ड में निवेश करती हैं। इन्हीं वजहों से उन पर 4-5 फीसदी से ज्यादा प्रतिफल नहीं मिल पाता।

माहेश्वरी कहते हैं, 'यदि आप दीर्घकालिक नजरिये से, मान लीजिए 25-30 साल के लिए निवेश कर रहे हैं तो आपको ऐसी इक्विटी योजना में रकम लगानी चाहिए, जो आपको दो अंकों में प्रतिफल दे सके। इंश्यारेंस-कम-इन्वेस्टमेंट योजनाओं में प्रतिफल कम रहता है। आपके निवेश से ही तय होगा कि सेवानिवृत्ति के समय आप भरे-पूरे रहेंगे या तंगहाल रहेंगे।' लेकिन ऐसी योजनाओं से बाहर निकलना महंगा हो सकता है। 

जोखिम के हिसाब से करें निवेश

यदि आपके भीतर निवेश के मामले में ज्यादा उतारचढ़ाव झेलने की कुव्वत नहीं है तो आपको डेट या हाइब्रिड योजनाओं में ही रकम लगानी चाहिए। राष्ट्रीय पेंशन योजना (एनपीएस) आपके लिए मुफीद हो सकती है क्योंकि वह निवेशकों को इक्विटी और डेट के विभिन्न स्तर चुनने की आजादी देती है। गुप्ता कहते हैं, 'जो सेवानिवृत्ति के लिहाज से निवेश करना चाहते हैं और इक्विटी में रकम लगाना चाहते हैं, वे एनपीएस चुन सकते हैं।' माहेश्वरी भी एनपीएस में ही निवेश करने की सलाह देते हैं क्योंकि इसमें आयकर अधिनियम की धारा 80 सीसीडी (1बी) के तहत 50,000 रुपये तक की अतिरिक्त कर छूट मिल जाती है। 

संपत्ति आवंटन से तय हो निवेश 

अपने मौजूदा निवेश पोर्टफोलियो में संपत्ति आवंटन पर नजर दौड़ाइए और देखिए कि कुछ कमी तो नहीं है। सेबी में पंजीकृत निवेश सलाहकार और फिनस्कॉलर्ज वेल्थ मैनेजर की सह-संस्थापक एवं प्रिंसिपल एडवाइजर रेणु माहेश्वरी कहती हैं, 'यदि आपके पोर्टफोलियो में इक्विटी का अनुपात कम रह गया है तो इक्विटी लिंक्ड सेविंग्स स्कीम (ईएलएसएस) जैसी योजना पर विचार कीजिए।' लेकिन यदि आपके पोर्टफोलियो में डेट का अनुपात कम रह गया है तो आप स्वैच्छिक भविष्य निधि (वीपीएफ) का दामन थाम सकते हैं।

आप अपना समूचा मूल वेतन और महंगाई भत्ता इसमें डाल सकते हैं। इसमें जमा रकम पर वही ब्याज मिलता है, जो कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) पर मिलता है। चालू वित्त वर्ष के लिए ब्याज की दर 8.65 फीसदी तय की गई है। डेट के मामले में सार्वजनिक भविष्य निधि (पीपीएफ) भी अच्छा विकल्प है, जिसमें फिलहाल 7.9 फीसदी की दर से ब्याज मिलता है। वरिष्ठï नागरिक सरकारी गारंटी वाली वरिष्ठï नागरिक बचत योजना में निवेश कर सकते हैं, जिस पर 8.6 फीसदी ब्याज मिल रहा है। 

निवेश और नकदी की जरूरत खंगालें

कर बचाने के फेर में निवेश करते समय ध्यान रखें कि यह निवेश की आपकी पूरी योजना के अनुरूप हो। यदि आपके पास सात साल या अधिक समय है तो आप ईएलएसएस जैसी पूरी तरह इक्विटी योजना में रकम लगा सकते हैं। निवेश की अवधि बड़ी हो तो कुछ समय का उतारचढ़ाव झेलने और अच्छा प्रतिफल हासिल करने में मदद मिल सकती है। साथ ही यह भी ध्यान रखें कि इन योजनाओं में लगाई जा रही रकम की आपको जरूरत कब होगी।

मिसाल के तौर पर यदि आपको कुछ अरसे बाद ही रकम की जरूरत है तो यूनिट लिंक्ड इन्वेस्टमेंट प्लान (यूलिप) में निवेश करना समझदारी नहीं होगी। यूलिप में आपकी रकम कम से कम पांच साल के लिए फंस जाती है यानी आप उसमें से पांच साल बाद ही रकम निकाल सकते हैं। ईपीएफ या वीपीएफ और पीपीएफ भी लंबे समय की निवेश योजनाएं हैं और उनमें तरलता की कमी होती है यानी उनमें से आसानी से रकम निकाली नहीं जा सकती इसलिए यदि आपको बीच में रकम की जरूरत पड़ती है तो इनसे बहुत कम धन निकाल पाएंगे। ईपीएफ और वीपीएफ में कुछ खास स्थितियों में ही - गंभीर बीमारी में या बच्चों की शिक्षा या शादी आदि के लिए - धन निकाला जा सकता है। ईएलएसएस में सबसे कम केवल तीन साल की लॉक-इन अवधि है।

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