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वैश्विक निवेशक जारी रखेंगे भारत में निवेश

बीएस बातचीत
पुनीत वाधवा /  February 09, 2020

वित्त वर्ष 2021 का बजट पेश हो चुका है और भारतीय रिजर्व बैंक मौद्रिक नीति की समीक्षा कर चुका है। जूलियस बेयर के मुख्य कार्याधिकारी आशिष गुमाश्ता ने पुनीत वाधवा को दिए साक्षात्कार में कहा कि बाजार का ध्यान फंडामेंटल (अर्थव्यवस्था व आय) के अलावा वैश्विक संकेतों खास तौर से कोरोनावायरस के डर और वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं पर इसके संभावित असर की ओर वापस लौटेगा। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश...

बजट प्रस्तावों को आप कैसे देखते हैं?

इस साल के बजट में अर्थव्यवस्था के सुधार के लिए बड़े सुधार और बढ़त को प्रोत्साहित करने वाले कुछ कदमों की उम्मीद की जा रही थी, जो वैश्विक वित्तीय संकट के बाद की सबसे खराब मंदी से दो-चार हो रहा है। हालांकि बजट इन उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया। कुल मिलाकर बजट में वित्तीय क्षेत्र, बुनियादी ढांचा, रियल एस्टेट और निर्यात को लेकर बड़ी घोषणाओं का अभाव रहा, जो बढ़त को बहाल करने और कारोबारी धारणा के लिहाज से अहम है। बाजार जिस तरह के प्रोत्साहन की उम्मीद कर रहा था, वह नहीं मिला। अब बजट पूरा हो चुका है, लिहाजा शेयर बाजार फंडामेंटल (अर्थव्यवस्था व आय) के अलावा वैश्विक संकेतों खास तौर से कोरोनावायरस के जखिम और वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं पर उसके संभावित असर की ओर वापस लौटेगा।

क्या अब आपको बाजार के एकीकृत होने की उम्मीद है?

हां। अल्पावधि में हमें इसके मौजूदा स्तर पर एकीकृत होने की उम्मीद है। हालांकि आर्थिक संकेतक अपना निचला स्तर छोड़ रहे हैं और यहां से धीरे-धीरे उनमें सुधार आएगा। अपने इक्विटी निवेश को लेकर निवेशक इस बीच होने वाली गिरावट पर नजर रखेंगे। 

वैश्विक निवेशकों केलिए मुख्य चिंता कौन की है?

मौजूदा मंदी के बावजूद वैश्विक निवेशक भारत में निवेश जारी रखेंगे और इस तरह से लंबी अवधि की बढ़त की क्षमता को ध्यान में रखेंगे। इसके अलावा वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं की रफ्तार में नरमी और अन्य एशियाई बाजारों की रफ्तार को लेकर संभावित जोखिम (कोरोनावायरस के प्रसार को देखते हुए) को देखते हुए भारत अपेक्षाकृत निवेश का आकर्षक गंतव्य बन सकता है। भारत को लेकर वैश्विक निवेशकों की मुख्य चिंता आर्थिक रप्तार में क्रमिक नरमी, आय में सुस्त सुधार और क्रेडिट का संकट है। उम्मीद है कि इन मोर्चों पर सुधार होगा, ऐसे में वैश्विक निवेशक इन चीजों पर नजर बनाए रखेंगे।

भारतीय बेंचमार्क सूचकांकों के मूल्यांकन को लेकर आप कितने सहज हैं?

बेंचमार्क सूचकांकों का मूल्यांकन मौजूदा स्तर पर (ऐतिहासिक मूल्यांकन के मुकाबले) उचित नजर आ सकता है। हालांकि यह व्यापक बाजारों का वास्तविक प्रतिनिधि नहीं हो सकता क्योंकि वहां सूचकांक में शामिल कुछ दिग्गजों के हक में ध्रुवीकरण हो रहा है। इसके अतिरिक्त आय के चक्र में सुधार पीछे चला गया है, जैसा कि पिछले कुछ वर्षों में 5-6 फीसदी की सुस्त रफ्तार के तौर पर प्रतिबिंबित हुआ है।

मिडकैप और स्मॉलकैप क्षेत्र में निवेशकों को कैसे उतरना चाहिए?

लार्जकैप के मामले में निवेशक अपना मौजूदा आवंटन बनाए रख सकते हैं, खास तौर से उच्च गुणवत्ता व बढ़त वाले शेयरों में। हालांकि निवेशक  मिडकैप में अपना आवंटन बढ़ाने पर विचार कर सकते हैं। पिछले दो साल में मिडकैप व स्मॉलकैप शेयरों का मूल्यांकन घटा है, लेकिन अब वे अपने समकक्ष लार्जकैप के मुकाबले छूट पर कारोबार कर रहे हैं। मेरा मानना है कि अगर वैश्विक रफ्तार जारी रही तो ये शेयर साल 2020 में सुधरेंगे। मिडकैप व स्मॉलकैप में हम निचले स्तर वाले शेयरों पर ध्यान देंगे, जहां कंपनी इस क्षेत्र की अग्रणी है या उनकी स्थिति उम्दा है और परिचालन के स्तर पर स्थिति अच्छी है। साथ ही वह शेयर कई साल के निचले स्तर या लंबी अवधि के औसत के मुकाबले काफी नीचे कारोबार कर रहा है।

अगले कुछ महीने में आर्थिक व भूराजनैतिक घटनाक्रम पर वैश्विक स्तर पर विभिन्न केंद्रीय बैंक किस तरह की प्रतिक्रिया जताएंगे? आरबीआई के बारे में आपका क्या कहना है?

वैश्विक स्तर पर कम बढ़ोतरी, कम महंगाई और केंद्रीय बैंकों के काफी उदार बने रहने की प्रवृत्ति 2020 में जारी रहने की संभावना है। अमेरिकी ट्रेजरी का प्रतिफल कोरोनावायरस के प्रसार के बाद घटा है और साल की दूसरी छमाही तक यह निचले स्तर पर बना रहेगा जब अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव पर ध्यान केंद्रित होगा और कोरोनावायरस का असर घट जाएगा। भारत में हम दरों के नरमी के चक्र की समाप्ति के करीब हैं, हालांकि नीतिगत रुख कुछ समय तक उदार बना रह सकता है।
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