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कृत्रिम मेधा के नियमन में दिखाना होगा नयापन

कुमार अभिषेक /  February 09, 2020

गूगल की संचालक कंपनी अल्फाबेट के मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ) सुंदर पिचाई ने कृत्रिम मेधा (एआई) के नियमन की जरूरत पर बल देकर इस मामले में फिर से बहस छेड़ दी है। पिचाई के पहले टेस्ला के एलन मस्क भी पिछले कई साल से इसकी वकालत करते रहे हैं। फिर भी पिचाई के इस बयान का वक्त काफी अहम है। 

चेहरे की शिनाख्त जैसे एआई-आधारित अनुप्रयोगों का इस्तेमाल रोजमर्रा के जीवन में तेजी से बढ़ रहा है और उसी तेजी से उनका विकास भी हो रहा है। एआई तकनीक की हमेशा बदलती रहने वाली प्रकृति को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि इसके नियमन के नियम अनुप्रयोग पर आधारित होने चाहिए। कानूनी फर्म जे सागर एसोसिएट्स के पार्टनर संजय सिंह एआई के नियमन का सवाल आने पर दुनिया भर के नियामकों के समक्ष पैदा होने वाली दुविधा का जिक्र करते हैं। 

वह सवालिया अंदाज में कहते हैं, 'एआई नियमन पर हमारे पास क्या विकल्प हैं? क्या वह मशीन लर्निंग (एमएल) एवं एआई मॉडलों के परिचालन से संबंधित मुक्त, सार्वभौम एवं पारदर्शी मानकीकृत नियम हैं? या फिर सभी संबंधित पक्षों के बीच होने वाला कोई समझौता?' हालांकि वह कहते हैं कि एमएल या एआई को नियंत्रित किए बगैर इनका नियमन लगभग असंभव है। लेकिन नियंत्रण होते ही नियमन का मकसद धरा रह जाएगा।

टेकलीगिस के प्रबंध साझेदार सलमान वारिस इस राय से इत्तफाक रखते हुए कहते हैं कि एआई तकनीक पर क्षैतिज नियमन होने से नवाचार सीमित हो जाएगा जिससे कानून तकनीकी बदलावों के हिसाब से कानून को ढाल पाना मुश्किल होगा। वारिस कहते हैं, ' संबंधित उद्योग के हिसाब से एआई का नियमन करने पर अधिक लचीलापन, बेहतर क्रियान्वयन और एक लक्षित परिप्रेक्ष्य संभव हो सकेगा।'

विशेषज्ञ स्टार्टअप पारिस्थितिकी बनने से एआई उत्पाद पेश करने के मोर्चे पर भारत में एआई के इर्दगिर्द एक नियामकीय ढांचा खड़ा करने की जरूरत भी बताते हैं। लेकिन अधिकतर जानकार प्रस्तावित डेटा संरक्षण विधेयक के संदर्भ में कोई नया मानक लाने के खिलाफ हैं। उनका कहना है कि निजता एआई को प्रभावित करने वाला महज एक पहलू है। निशीथ देसाई एसोसिएट्स में विध्वंसक तकनीकी गतिविधि के प्रमुख हुजेफा तवावाला कहते हैं, 'डेटा संरक्षण विधेयक का व्यापक एवं वृहद ढांचा होना चाहिए। बाद में हम उद्योग-केंद्रित कानून भी बना सकते हैं, मसलन रोबोटिक्स से लेकर ड्रोन और स्वास्थ्य देखभाल तक।'

तवावाला जवाबदेही के मानक तय करने और एआई अधिकार तय करने की जरूरत पर भी बल देते हैं। वह कहते हैं, 'सऊदी अरब ने ह्यूमेनॉड रोबोट सोफिया को अपना नागरिक घोषित करने के साथ ही उसे अधिकार भी दिए हैं। लेकिन वह एक अलहदा मामला है। सवाल अब भी यही है कि एआई का स्वामित्व किसके पास है? अल्गोरिद्म बनाने वाले के पास या उसके संचालक के पास?'

विशेषज्ञ कहते हैं कि कंपनी संगठनों को कानूनी अधिकार दिए गए हैं और वे अपने हितधारकों के प्रति जवाबदेह भी हैं। एआई के मामले में भी यही सिद्धांत अपनाया जा सकता है। लेकिन इसमें एक पेच यह है कि कंपनी समूह सही मायने में स्वतंत्र नहीं हैं क्योंकि उनका संचालन इंसान ही करते हैं। वहीं एआई वास्तव में स्वतंत्र हो सकते हैं। 

लिहाजा दुनिया भर की सरकारों के सामने एआई के नियमन पर क्या विकल्प रह जाते हैं? ट्राईलीगल के पार्टनर राहुल मत्थन कहते हैं, 'नियमन की प्रकृति अनावश्यक रूप से दंडात्मक नहीं होनी चाहिए क्योंकि इसका नवाचार पर बेहद प्रतिकूल असर होगा। नियम ऐसे हों कि कंपनियों को नवाचार की छूट हो, नासमझी में हुई गलतियों को माफ करे और केवल लापरवाही में या जानबूझकर की गई गलतियों पर ही सजा मिले।'

भारत सरकार एआई तकनीक के संभावित इस्तेमाल का दोहन करने में काफी सजग रही है। पीयूष गोयल ने पिछले साल का अंतरिम बजट पेश करते समय कहा था कि सरकार एआई को समर्पित एक राष्ट्रीय केंद्र बनाने के बारे में सोच रही है। नीति आयोग ने भी 2018 में जारी अपने एक विमर्श पत्र में कहा था कि भारत को कृत्रिम मेधा की लहर का फायदा उठाने के लिए एक ठोस बौद्धिक संपदा प्रारूप की जरूरत है।

कुछ जानकार एआई नियमन के प्रारूप पर एक वैश्विक सहमति चाहते हैं और इसके लिए वे शोध एवं विकास के क्षेत्र में सक्रिय नियामकीय संस्थाओं के बीच संवाद का एक साझा बिंदु बनाने की बात करते हैं। कई लोगों को लगता है कि कानून आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन के निष्पक्ष सूचना परंपरा सिद्धांतों पर आधारित होने चाहिए। ये सिद्धांत एआई प्रणालियों को इस तरह बनाने की मांग करते हैं जिनमें विधि के शासन, मानवाधिकार, लोकतांत्रिक मूल्यों एवं विविधता को अहमियत दी गई हो। इसके अलावा एआई प्रणालियों को निजता का भी ध्यान रखना चाहिए। 

इस पहेली का एक और पहलू भी है: दुनिया भर की सरकारों ने चेहरा पहचानने वाली तकनीकों का भरपूर इस्तेमाल और दुरुपयोग किया है। ऐसे में सवाल उठता है कि इस मामले में खुद एक हितधारक होने के नाते सरकारें नियम-कायदे तय करने में कितनी निष्पक्ष हो पाएंगी? वारिस कहते हैं, 'सरकार के लिए तकनीक के इस्तेमाल को संयमित रखने का इकलौता कारगर रास्ता इसके उपयोग में वह खुद अतिसक्रिय रहे। आज जरूरत इस बात की है कि चेहरा शिनाख्त तकनीक के समुचित उपयोग को नियमित करने के लिए सरकार खुद पहल करे।' विशेषज्ञों का मानना है कि एक विस्तृत नियामकीय ढांचा आने से न केवल आखिरी उपभोक्ता को लाभ होगा बल्कि उद्योग जगत भी एआई तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए प्रोत्साहित होगा।
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