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सार्वजनिक वक्तव्य के मानक में आती जा रही गिरावट

कनिका दत्ता /  February 09, 2020

हाल में तीन दिन के अंतराल में दो महत्त्वपूर्ण भाषण दिए गए। पहला दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में और दूसरा दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क में। दोनों भाषण ऐसे वक्त पर दिए गए जब उन देशों में सत्ता प्रतिष्ठान के समक्ष राजनीतिक चुनौतियां उठान पर हैं। इन दोनों भाषणों को ऐसी वजहों से याद किया जाएगा जो भाषण की विषयवस्तु से इतर हैं। दरअसल दोनों भाषण सार्वजनिक वक्तव्यों के गिरते मानक से ताल्लुक रखते हैं। 

पहला भाषण वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का है जो उन्होंने मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का दूसरा बजट प्रस्तुत करते हुए दिया। खराब होती आर्थिक परिस्थितियों के बीच दिया गया यह भाषण दो घंटे 43 मिनट लंबा था। यदि उनकी तबियत खराब न होती तो यह और लंबा हो सकता था। ध्यान देने वाली बात यह थी कि यह भाषण तमाम आकांक्षाओं पर विफल रहा। 

उधर अमेरिका में राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल के अंतिम स्टेट ऑफ द यूनियन (एसओटीयू) भाषण में 78 मिनट का समय लिया। इस भाषण के दौरान कम से कम 100 बार लोगों की तालियों (केवल रिपब्लिकन) के कारण भाषण रोकना पड़ा और रियलिटी टेलीविजन जैसे दृश्य रचे गए (अफगानिस्तान से एक सैनिक का अचानक अपनी पत्नी और बच्चों के पास लौटना)। परंतु ट्रंप की ये नाटकीय हरकतें और जानबूझकर महाभियोग के मामले का जिक्र न करना कुछ भी काम नहीं आया। बाजी मारी नैंसी पेलोसी ने। उन्होंने मंच पर राष्ट्रपति के पीछे उनके भाषण की अपनी प्रति फाड़कर महफिल लूट ली। दरअसल ट्रंप ने हाउस स्पीकार नैंसी पेलोसी की हाथ मिलाने की कोशिश की अनदेखी कर दी थी। 

सीतारमण को किसी ने अपमानित नहीं किया। भाषण समाप्त होने से पहले जब उनकी तबियत बिगड़ी तो विपक्ष के कई सांसद उनके पास पहुंचे। उन्होंने अपना संदेश देने का हरसंभव प्रयास किया। सुनहरी साड़ी में सजी सीतारमण ने एक कश्मीरी कविता का अंश पढ़ा (जैसा कि मेरी सहयोगी आदिति फडणीस ने बताया, उन्होंने कवि का कूट नाम जो उर्दू में था, की अनदेखी की), उन्होंने प्राचीन तमिल महिला संत कवि की एक कहावत साझा की और एक कुरल यानी तमिल पवित्र कथन का उच्चारण किया। उन्होंने भाषण के आखिर में कालिदास का भी जिक्र किया। यह वह हिस्सा था जिसमें कर प्रस्ताव शामिल होते हैं। हर साहित्यिक संदर्भ की व्याख्या की गई, हर प्रस्ताव और उपलब्धि को कम से कम दो बार दोहराया गया। परंतु इस कड़ी मेहनत का नतीजा, इसे अहम बताने की पूरी कोशिश उनके उत्तेजित अंकेक्षकों ने गंवा दी। 

वित्त मंत्री के भाषण में स्कूल स्तर की किसी प्रतियोगिता जैसा उतार-चढ़ाव था जो काफी हद तक उबाऊ था। परंतु टेलीविजन ने भी हमें निराश किया। कांग्रेस नदारद थी इसलिए दूरदर्शन के छायाकारों के पास लोगों को दिखाने के लिए सीमित विकल्प थे। वे कैमरे से लॉन्ग शॉट नहीं ले सकते थे, नहीं तो विपक्ष की खाली बेंच नजर आ जातीं। अतीत में बजट के दौरान यह संभव था कि मंत्री के किसानों, गरीबों, महिलाओं, अनुसूचित जातियों आदि की मदद की बातों के बीच कुछ राहत पाई जा सके। साड़ी पहने सोनिया गांधी, बुद्घिमान दिखने की कोशिश करते राहुल गांधी, सुषमा स्वराज के करीने से बनाए हुए बाल आदि। साधू और साध्वी, पगड़ी और हैट। पीछे बैठे उबासियां लेते लोग, लोकसभा अध्यक्ष के मंच के ठीक नीचे अनुवादकों की आपाधापी आदि तमाम बातें थी जो आपका ध्यान बंटा सकती थीं। इस बार सीतारमण की बातों के दोहराव के अलावा ज्यादा से ज्यादा प्रधानमंत्री के भावहीन चेहरे के क्लोजअप शॉट देखने को मिले। 

एक घंटा बीतते-बीतते बजट भाषण सुनने वाले हम जैसे लोगों को मुश्किल होने लगी। आर्थिक पत्रकार पूजा मेहरा ने ट्वीट किया कि बजट के कारण कॉफी की खपत अवश्य बढ़ रही है। एक घंटे बाद तो कॉफी भी नाकाम होने लगी। जब बजट के दूसरे खंड यानी पार्ट बी की बारी आई तो आयकर में बदलाव को लेकर मामूली शुरुआती उत्साह के बाद भ्रम की स्थिति बन गई जो अब तक जारी है। वित्त मंत्री ने कहा कि वह सनदी लेखाकार मुक्त कर प्रस्ताव रख रही हैं। जबकि सच तो यह है कि अब उनकी और जरूरत पडऩे वाली है। एक के बाद एक वित्त मंत्रियों ने सरकार की वित्तीय स्थिति को लेकर सालाना रिपोर्ट बनाई है जिसे एसओटीयू के समकक्ष रखा जा सकता है क्योंकि एसओयूटी की तरह इसके श्रोता भी सीमित होते हैं। परंतु एसओटीयू को राजनीतिक प्रगति संबंधी रिपोर्ट माना जाता है जो देश का मुखिया कांग्रेस के समक्ष प्रस्तुत करता है। दिलचस्प बात है कि ऐसे हर भाषण में बजट संदेश आवश्यक है। 

इस वर्ष अमेरिका के फैक्ट चेकर टूथकॉम्ब ने पाया कि ट्रंप के एसओटीयू वक्तव्य में भ्रामक बातें पहले की तुलना में कहीं अधिक थीं। सीतारमण की दिक्कत यह है कि हर बजट में साथ आने वाले कई दस्तावेज लंबे समय तक शंकालुओं की नजर में रहते हैं। मनमोहन सिंह ने कहा कि बजट इतना लंबा था कि वह कुछ भी समझ नहीं पाए (अभी यह स्पष्ट नहीं है कि पूर्व वित्त मंत्री और पूर्व प्रधानमंत्री मजाक तो नहीं कर रहे थे)। परंतु निश्चिंत रहिए करीब तीन घंटों की कवायद के बावजूद आखिरकार आंकड़े अपनी बात खुद कहेंगे।
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