बिजनेस स्टैंडर्ड - कोरोनावायरस का असर
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कोरोनावायरस का असर

संपादकीय /  February 09, 2020

सन 2003 में सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (सार्स) बीमारी के फैलने से पूर्वी एशिया में सैकड़ों लोगों की मौत हो गई थी और इसने विश्व अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित किया था। हालांकि उस प्रभाव से निपटने में कामयाबी मिली थी। सार्स बीमारी चीन में उभरी और उसकी वृद्धि को इसकी कीमत चुकानी पड़ी। परंतु उस वक्त अर्थव्यवस्था की गति इतनी तेज थी कि वह जल्दी ही इसके प्रभाव से उबरने में कामयाब रही और रिकॉर्ड गति से बढ़ती रही। आज जब चीन के ही वुहान शहर में कोरोनावायरस जैसी आपदा उभरी है तो हालात अलग हैं।

चीन 2003 की तुलना में आज विश्व आपूर्ति शृंखला से कहीं अधिक गहराई से जुड़ा हुआ है। उस वक्त वैश्विक उत्पादन का केवल 5 प्रतिशत चीन से आता था। इतना ही नहीं आज चीन की अर्थव्यवस्था भी पहले जितनी मजबूत नहीं है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि कोरोनावायरस सार्स से अधिक खतरनाक है। चीन की प्रतिक्रिया ढीली रही लेकिन आखिरकार वह संकट से निपटने के सघन प्रयास कर रहा है। वैश्विक नेटवर्क वाली कई फैक्टरियां वहां अपना काम अस्थायी रूप से बंद कर रही हैं। कुछ उद्योगों पर इसका असर देखने को मिलेगा, मसलन वाहन और मोबाइल फोन उद्योग। ये दोनों उद्योग चीन की फैक्टरियों से होने वाले उत्पादन पर काफी हद तक निर्भर हैं।

ध्यान देने वाली बात यह है कि कोरोनावायरस से जुड़ा सबसे बुरा परिदृश्य अभी भी सामने आना बाकी है। निश्चित तौर पर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अब तक इसे महामारी का दर्जा नहीं देकर सावधानी बरती है लेकिन इसका असर जल्दी देखने को मिलेगा। उदाहरण के लिए भारतीय वाहन उद्योग के पास चीन से आने वाले कलपुर्जों की बमुश्किल कुछ सप्ताह की आपूर्ति बची है। औषधि उद्योग जो देश की आय का बड़ा स्रोत है वह देश के लिए अच्छी खासी निर्यात आय अर्जित करता है। वह औषधियों के कई जरूरी तत्त्व चीन से आयात करता है। कई बार तो यह आयात 80 प्रतिशत तक होता है। जाहिर है भारत पर कोरोनावायरस का आर्थिक प्रभाव अवश्य पड़ेगा।

माना जा रहा है कि भारतीय परिस्थितियों में कोरोनावायरस बहुत प्रभावी नहीं होगा। भारत में पहला मामला कुछ समय पहले केरल में सामने आया। बहरहाल, अभी यह निश्चित नहीं है कि केवल केरल के मामले ही चिंता का विषय हैं। आखिरकार भारतीय जन स्वास्थ्य व्यवस्था दुनिया की सबसे प्रभावी व्यवस्थाओं में से नहीं है। चिंता की बात है लेकिन यह संभव है कि कुछ मामले इन कमियों के बीच देश में आ गए हों। अभी घबराने की कोई बात नहीं है क्योंकि कोरोनावायरस के वैश्विक मामले नियंत्रण में नजर आ रहे हैं। परंतु सरकार को इस बारे में स्पष्ट और पारदर्शी होना चाहिए कि अगर देश में इस बीमारी के मामले बढ़ते हैं तो क्या कदम उठाए जाएंगे। एक महामारी से निपटने के लिए कम समय में क्षमता निर्माण कैसे किया जाए?

सरकार को कोरोनावायरस के प्रभावों से निपटने के अन्य तरीकों की भी तैयारी रखनी होगी। ऐसा असर कच्चे तेल के वैश्विक बाजार में नजर आने लगा है। इस बाजार में अब मंदी आ गई है। ब्रेंट क्रूड की अप्रैल आपूर्ति अब 55 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है क्योंकि वैश्विक स्तर पर तेल की मांग में प्रति दिन 200,000 बैरल की कमी आ सकती है। यदि बड़े तेल उत्पादक देश उत्पादन कम नहीं करते तो तेल कीमतों में काफी गिरावट आ जाएगी। लेकिन इसका मतलब यह हुआ कि भारतीय राजकोष और बाह्य खाते के मोर्चे पर काफी सहजता आएगी। सन 2014 और 2015 में जब तेल कीमतों में निरंतर गिरावट आने लगी थी तो ऐसा ही हुआ था। सरकार को इसका फायदा उठाते हुए अपनी वित्तीय स्थिति दुरुस्त करनी चाहिए।
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