बिजनेस स्टैंडर्ड - भारत के कर और खर्च में भारी अंतर
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भारत के कर और खर्च में भारी अंतर

कृष्णकांत और सचिन मामबटा / मुंबई February 09, 2020

भारत को मिलने वाले कुल राजस्व और उसके व्यय के बीच अंतर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का करीब 7.5 प्रतिशत हो गया है। यह अंतर विश्व के बड़े उभरते देशों में सबसे ज्यादा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अनुमान के मुताबिक पिछले कैलेंडर वर्ष में सरकार का कुल व्यय जीडीपी के करीब 27.1 प्रतिशत है, जबकि सरकार का कुल राजस्व जीडीपी का करीब 19.6 प्रतिशत है। भारत मेंं राजस्व और व्यय का अंतर ब्राजील के बराबर ही है, लेकिन यह चीन, रूस और इंडोनेशिया की तुलना में बहुत ज्यादा है। 

चीन में पिछले साल सरकार का खर्च कुल राजस्व प्राप्तियों की तुलना में जीडीपी के 6.1 प्रतिशत से ऊपर था, जबकि रूस में यह जीडीपी के एक प्रतिशत के बराबर कम और इंडोनेशिया में 1.9 प्रतिशत ऊपर था। सामान्य सरकारी परिचालन के आंकड़ों में राज्य सरकारोंं को शामिल किया जाता है, लेकिन स्थानीय प्रशासन (जैसे नगर निकाय), राज्य और केंद्र की सरकारी कंपनियों के साथ सामाजिक सुरक्षा कोष इससे बाहर होता है। 

अगर एशिया की स्थिति देखें तो सिर्फ पाकिस्तान ऐसा देश है जहां सरकार के राजस्व और व्यय में भारी अंतर है। कैलेंडर वर्ष 2019 में पाकिस्तान की सरकार का कमाई की तुलना में खर्च उसके जीडीपी के 8.8 प्रतिशत से ज्यादा था। इसकी तुलना में बांग्लादेश में यह अंतर महज 4.8 प्रतिशत, श्रीलंका में 5.7 प्रतिशत और वियतनाम में 4.4 प्रतिशत था। 

भारत में तुलनात्मक रूप से ज्यादा राजकोषीय अंतर देश के सरकारी कर्ज और जीडीपी के अनुपात के बढऩे के रूप में सामने आता है। आईएमएफ ने भारत पर अपने हाल के परामर्श पत्र में कहा है, 'वित्त वर्ष 20 में भारत का सार्वजनिक कर्ज जीडीपी का करीब 69 प्रतिशत है, जो अन्य बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बहुत ज्यादा है।' 

सार्वजनिक कर्ज ज्यादा बढऩे की प्रमुख वजह आईएमएफ ने कॉर्पोरेट इनकम टैक्स को बताया है। आईएमएफ ने कहा, 'ऑफसेटिंग के कदम न होने के कारण कर कटौती के बाद सरकार का कर्ज वित्त वर्ष 2020 में 10 साल के उच्च स्तर, जीडीपी के 69 प्रतिशत पर पहुंच गया है।' ज्यादा सार्वजनिक कर्ज होने से सरकार पर ब्याज का बोझ बढ़ता है, जो वित्त वर्ष 2019 में भारत की जीडीपी का 4.9 प्रतिशत था, जो उभरते बड़े बाजारों की तुलना में बहुत ज्यादा है। 

आईएमएफ के मुताबिक अन्य 4 ब्रिक्स देशों ब्राजील, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका में यह अनुपात करीब 3 प्रतिशत है, जबकि आसियान देशों में यह करीब 1.5 प्रतिशत है। आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज में मुख्य निवेश अधिकारी पीयूष गर्ग ने कहा कि अगर कर्ज व जीडीपी का अनुपात बढ़ता रहेगा तो सरकार की उधारी लेने की क्षमता प्रभावित होगी। उन्होंने कहा, 'भारत का कुल मिलाकर कर्ज जीडीपी का अनुपात उभरते बाजारों की तुलना में अलग है।' 

उन्होंने कहा कि नॉमिनल जीडीपी वृद्धि भी सुस्त रही है, जिसकी वजह से यह राशि सीमित होती है और इसके कारण घाटा बढ़ सकता है। ज्यादा कर्ज का जोखिम भारत को कई तरीके से प्रभावित कर सकता है, जिसमें मुद्रा नीचे जाने का दबाव शामिल है। गर्ग का मानना है कि अगले वित्त वर्ष में इसमें सुधार की कुछ उम्मीद है। इससे सकार के वित्त को भी मदद मिल सकती है। केयर रेटिंग के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस का कहना है, 'पिछले कुछ साल से आर्थिक मंदी की स्थिति है, जिसकी वजह से सरकार को वृद्धि को बल देने के लिए ज्यादा धन खर्च करना पड़ा है। इसका यह भी मतलब है कि वह राजकोषीय घाटे के पहले के लक्ष्य को हासिल करने में सफल नहीं रही है। कम वृद्धि दर की वजह से कर संग्रह भी कम रहा है, जिसकी वजह से स्थिति और गंभीर हुई है।'  उन्हें लगता है कि ऐसी स्थिति कुछ समय तक और बनी रह सकती है। 

ज्यादा घाटे के आंकड़े सिर्फ भारत तक सीमित नहीं हैं। ऐसी उम्मीद की जा रही है कि उभरते अगड़े देशों में भी यह बढ़ेगा। ऐसा सलाहकार फर्म ने जनवरी 2020 की इकनॉमी वाच रिपोर्ट में कहा है। अमेरिका का राजकोषीय घाटा और जीडीपी का अनुपात 2019 में बढ़कर 7 प्रतिशत रह सकता है और यह बढ़ा हुआ बना रहेगा। ब्रिटेन में भी यह अंतर बढ़ रहा है। चीन और दक्षिण अफ्रीका में भी ऐसी ही स्थिति रह सकती है। ईवाई इंडिया के प्रमुख नीति सलाहकार डीके श्रीवास्तव ने लिखा है कि भारत में राजस्व को लेकर उसकी खुद की चुनौतियां हैं। 

इसमें कहा गया है, 'वैश्विक कारोबारी चुनौतियों व आयात में वृद्धि कम होने की वजह से केंद्र सरकार का कर आधार भी सिकुड़ा है।'  बहरहाल आईएमएफ ने कहा है कि ज्यादा ब्याज भुगतान और जीडीपी का अनुपात सामाजिक और बुनियादी ढांचा परियोजना पर सरकार के सार्वजनिक व्यय को सीमित कर रहा है।
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