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वृहद नीति से हासिल हो सकते हैं कुछ हल

अजय शाह /  February 07, 2020

देश को दीर्घावधि के ढांचागत सुधारों की आवश्यकता है। इसमें एकीकृत जीएसटी और प्रत्यक्ष कर दरें शामिल हैं। इस बारे में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अजय शाह

 
देश कारोबारी मंदी के चक्र से गुजर रहा है और वृद्घि दर में भी गिरावट का रुख है। वृहद आर्थिक नीति के उपाय कारोबारी चक्र की समस्या को हल कर सकते हैं लेकिन समग्र समस्या को हल करने की उनकी क्षमता सीमित है। हमें राजकोषीय विस्तार को लेकर सचेत रहना होगा क्योंकि वित्तीय कमजोरी की स्थिति बनी हुई है। उपयोगी राह यही होगी कि कर नीति और कर प्रशासन में जरूरी ढांचागत सुधारों को अंजाम दिया जाए। ये लंबे समय से लंबित हैं। सन 1991 से 2011 तक देश में तेज वृद्घि का दौर रहा। उसके बाद इसमें गिरावट आई। लंबी अवधि के रुझान के शीर्ष पर कारोबारी चक्र की अवधारणा, मुनाफे में कमी, इन्वेंटरी और दीर्घावधि के रुझान के इर्दगिर्द का निवेश आते हैं। फिलहाल हम कारोबारी चक्र में मंदी का भी सामना कर रहे हैं। 
 
पहली दृष्टि में ऐसा प्रतीत होता है कि वृहद नीति, राजकोषीय नीति और मौद्रिक नीति के उपायों का इस्तेमाल बचाव के लिए किया जाना चाहिए। मौद्रिक नीति पहले ही मुद्रास्फीति को लक्षित करके ऐसा कर रही है। 91 दिन के ट्रेजरी बिल की दर जो मौद्रिक नीति के रुख के आकलन का सर्वश्रेष्ठ तरीका है वह 2013 में 11 फीसदी के वास्तविक स्तर पर थी। उस वक्त भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) विनिमय दर को लक्ष्य बनाकर चल रहा था। अब जबकि आरबीआई मुद्रास्फीति को लक्ष्य बनाकर चल रहा है तो यह 5 फीसदी के स्तर पर है। यानी यह वास्तविक नीतिगत दर में 6 फीसदी की कमी है। यदि मौद्रिक नीति समिति सावधानीपूर्वक काम करती है और ऐसी ब्याज दर तलाशती है जो खुदरा महंगाई का 4 फीसदी का लक्ष्य हासिल कर सके, मौद्रिक नीति सही है।
 
राजकोषीय नीति की बात करें तो क्या हम कर दरों में भारी कटौती करके क्रय शक्ति में सुधार कर सकते हैं? या व्यय में इजाफा करके यही प्रभाव उत्पन्न किया जा सकता है? इस राह पर चलने से जुड़ी कुछ चिंताएं भी हैं। हमें यह ध्यान में रखना होगा कि 2007-08 के उच्चतम स्तर से उठान पर रहे निजी कॉर्पोरेट निवेश में अब भारी गिरावट आ चुकी है। देश में राजकोषीय नीति अपना रुख सकल घरेलू उत्पाद के एक या दो फीसदी तक बदल सकती है लेकिन दिक्कत इससे कम से कम पांच गुना बड़ी है।
 
सरकार का ऋण लेने का तरीका गलत है। अधिकांश उधारी अनुषंगी ऋणदाताओं से वित्तीय दबाव के माध्यम से ली जाती है। जब अनिवार्यता समाप्त हो जाती है तो वित्तीय नियामकों से कहा जा सकता है कि वे जबरिया निवेश को सरकारी बॉन्ड में डालें। इसके लिए सांविधिक तरलता अनुपात बढ़ाया जा सकता है। यह आर्थिक सुधारों के क्रम को उलटने के समान होगा और औपचारिक वित्तीय मध्यस्थता पर प्रभावी कराधान बढ़ेगा। जब अर्थव्यवस्था में कर दरों के ऊपर नीचे होने की आशंका बढ़ती है तो अनिश्चितता पैदा होती है। व्यक्तिगत स्तर पर लोग कर नीति में लंबी स्थिरता चाहते हैं ताकि वे निवेश को लेकर आश्वस्त रहें।
 
आदर्श स्थिति में हमें तेजी के वर्षों यानी 2007-08 में 4 फीसदी का प्राथमिक अधिशेष मिलता जो 2020-21 में 4 फीसदी के घाटे को सहन करने की गुंजाइश तैयार करता। परंतु खेद की बात है कि देश की राजकोषीय नीति अच्छे दिनों में भी भारी भरकम अधिशेष नहीं तैयार कर पाती। यही कारण है कि मंदी के पहले हमारी स्थिति बहुत मजबूत नहीं होती। नॉमिनल जीडीपी वृद्धि और सरकारी उधारी की औसत लागत एक दूसरे के अधिक करीब हैं। ऐसे में संभव है कि ऋण/जीडीपी अनुपात में इजाफा देखने को मिले।
 
वृहद नीति में भी किसी का नुकसान न करने की भावना प्रबल होती है। देश के नीति निर्माता सन 2001 में राजकोषीय तनाव और 2010 में मुद्रास्फीति के कारण अत्यंत खतरनाक स्थिति में थे। इन अनुभवों को भुलाया नहीं जाना चाहिए। हमें सन 2022 तक कोई राजकोषीय संकट या मुद्रास्फीतिक संकट नहीं चाहिए। राजकोषीय नीति इस स्थिति से कैसे निकलेगी? इसकी पूर्व शर्त यह है कि सार्वजनिक ऋण प्रबंधन एजेंसी और बॉन्ड बाजार में सुधार को अपनाया जाए ताकि सरकार और ऋणदाताओं के बीच बेहतर रिश्ते कायम हो सकें। इसके अतिरिक्त  व्यापक तौर पर स्वैच्छिक ऋणदाताओं से कर्ज लेने की क्षमता पैदा होगी। इसके लिए सन 2015 में शुरू किए गए कार्यक्रम को दोबारा अपनाना होगा।
 
हमें इस अवसर का लाभ कर नीति में लंबे समय से लंबित ढांचागत बदलावों को बढ़ावा देने में लेना चाहिए। हमें एक स्पष्ट और सहज प्रत्यक्ष कर संहिता की आवश्यकता है जिसमें सभी निगमों और व्यक्तियों के लिए 20 फीसदी की सपाट कर दर हो। हमें एकीकृत आधार की आवश्यकता है। यानी वस्तु एवं सेवा कर में भी 8 से 10 फीसदी की एकल दर। इसके अलावा हमें नए कर प्रशासन कानून की आवश्यकता है जो कर प्रशासन में नियम कायदे लागू करे। जो सुधार काफी लंबे समय से लंबित हैं, उन्हें स्थायी ढांचागत सुधार के रूप में पेश किया जाना चाहिए, न कि मौजूदा संकट से निपटने के फौरी उपाय के तौर पर। इससे वांछित आशावाद उत्पन्न होगा और निजी क्षेत्र के लिए आदर भाव उपजेगा। यदि ऐसे बदलाव आर्थिक तनाव से निपटने की अल्पकालिक प्रतिक्रिया के रूप में पेश किए गए तो निजी क्षेत्र इन्हें अस्थिर मानेगा और अर्थव्यवस्था को इससे पूरा लाभ नहीं मिलेगा।
 
वृहद नीति आर्थिक मंदी से कैसे निपट सकती है इस बारे में सहज बातचीत की अपनी भूमिका है। बहरहाल हमें वृहद नीति की भूमिका को बहुत बढ़ाचढ़ाकर भी पेश नहीं करना चाहिए। भारत में मौद्रिक नीति की भूमिका सीमित है क्योंकि उन वित्तीय सुधारों को अंजाम नहीं दिया गया जो मौद्रिक नीति पारेषण को प्रभावी बना सकते थे। हमारे देश में राजकोषीय नीति इसलिए सीमित है क्योंकि घाटे की समस्या बनी रहती है और उधारी की प्रक्रियाएं खामियों से भरी हुई हैं। भारतीय व्यवस्था में मौद्रिक नीति का मानक प्रभाव है कम क्षमता। चाहे जो भी हो वह केवल कारोबारी चक्र के उतार-चढ़ाव का ही समाधान कर सकती है। वह वृद्धि को प्रभावित नहीं कर सकती।
 
सन 2011 के बार से वृद्धि के रुझान में लगातार गिरावट के वास्तविक कारणों का विश्लेषण करें तो हमें पता चलेगा कि इसकी वजह निजी निवेश में आई गिरावट है। इस समस्या का हल करने के लिए निजी क्षेत्र की असहजता को समझते हुए उसे हल करना होगा। इसमें कई समस्याएं शामिल हैं, कानून की समस्या, आपराधिक न्याय प्रक्रिया की समस्या, कर प्रशासन और आर्थिक नियमन की समस्या आदि। ऐसा करते हुए हम आर्थिक स्वायत्तता की कहीं अधिक बड़ी समस्या तक भी पहुंचेंगे और राज्य सत्ता की सक्रियता को कम करने की आवश्यकता तक भी।
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