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मौद्रिक नीति का असर पड़े, इस पर केंद्रित है रिजर्व बैंक की कवायद

बीएस संवाददाता /  February 06, 2020

नीति समीक्षा बैठक के बाद आरबीआई के गवर्नर शक्तिकांत दास और डिप्टी गवर्नर एन एस विश्वनाथन, माइकल देवव्रत पात्र और बीपी कानूनगो ने मीडिया से एलटीआरओ (दीर्घ अवधि रीपो परिचालन) शुरू करने और आने वाले दिनों में दर में कटौती करने की संभावना सहित विभिन्न मुद्दों पर बातचीत की। मुख्य अंश...

 
आपने 1 लाख करोड़ रुपये की दीर्घ अवधि रीपो परिचालन (एलटीआरओ) पेश किया है और इन्क्रीमेंटल रिटेल क्रेडिट के लिए बैंकों को सीआरआर (नकद आरक्षित अनुपात) में छूट दी है। क्या यह एक प्रकार की छिपी हुई ब्याज दर कटौती है?
 
शक्तिकांत दास: मूल रूप से  मौद्रिक नीति के प्रभावी रूप से काम करने के लिए एक प्रयास है। क्योंकि हम इसे नीति दर पर दे रहे हैं। लिहाजा, हम 1 लाख करोड़ रुपये जो बैंकिंग प्रणाली में डालना चाहते हैं उससे बैंक अपने ऋण दरों को घटाने में सक्षम हो पाएंगे।  
 
क्या एलटीआरओ ओएमओ (खुला बाजार परिचालनों) का स्थान लेगी? साथ ही, सूचकांकों पर भारतीय बॉन्डों को शामिल करने के बारे में कोई ब्योरा देंगे? 
 
दास: दीर्घ अवधि रीपो परिचालानों का उद्देश्य ओएमओ की जगह लेना नहीं है। दरअसल, एलटीआरओ का विचार बैंकों के लिए ऑन-लेंडिंग (तीसरे पक्ष को ऋण देने) के लिए किसी तरह से फंडों की लागत में कमी लाना है। यही वजह है कि इसे रीपो दर पर रखा गया है। साथ ही, इससे उन्हें अपने पास टिकाऊ नकदी होने का भरोसा मिलता है जिससे बैंकों को प्रोत्साहन मिलना चाहिए खासकर तब जब वे यह देख रहे हैं कि जमा दरें नीचे की ओर मजबूत बनी हुई है।
 
बजट घोषणा में कहा गया है कि कुछ निश्चित सरकारी बॉन्ड में गैर-आवासीय भागीदारी के संबंध में कोई सीमा नहीं है जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती का पता चलता है कि अब हम उच्च विदेशी निवेश को स्वीकार कर सकते हैं, उच्च विदेशी पूंजी का इस्तेमाल अपने घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए कर सकते हैं लेकिन उसका प्रवाह रुपयों के संबंध में होगा न कि डॉलर के संबंध में। काफी हद तक विदेशी बचतों का उपयोग घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जा रहा है जिससे सरकार की जरूरतों को पूरा करने के लिए घरेलू बचतों पर दबाव भी कम हुआ है।
 
आप कह रहे हैं कि महंगाई के दबाव के कारण दरें नहीं घटा सकते हैं, वहीं दूसरी तरफ पर्याप्त तरलता बनी हुई है और दिसंबर से फरवरी के बीच आपने ऑपरेशन ट्िवस्ट शुरू किया था। ऐसे में मौद्रिक समीक्षा का व्यापक स्वरूप क्या है जिसपर आप काम कर रहे हैं और ऑपरेशन ट्िवस्ट से आप क्या हासिल करने का प्रयास कर रहे थे?
 
दास: बेहतर मौद्रिक नीति बदलाव को सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त तरलता जरूरी है क्योंकि हमारे 135 आधार अंकों के होने के बावजूद वहां पर्याप्त तरलता होनी जरूरी है। इसलिए केवल जून से व्यवस्था में उचित तरलता की स्थिति बनी। ऑपरेशन ट्िवस्ट एक ऐसा जरिया है जिसका इस्तेमाल बेहतर मौद्रिक नीति बदलाव को सुनिश्चित करने में किया जाता है। 
 
तीन साल के रीपो से बदलाव में सुधार आने की उम्मीद है। क्या होगा यदि कोई बैंक 5.15 फीसदी की दर पर रिजर्व बैंक से उधार लेता है और एक साल बाद आप ब्याज दरों में वृद्घि कर देते हैं तो क्या बैंक उन दरों का बोझ आगे ग्राहकों पर डालने में सक्षम होंगे? एफआरबीएम अधिनियम के तहत एक बार बदलाव किए जाने पर सरकार उनके घाटे का भी मुद्रीकरण कर सकती है, ऐसे में क्या है आपके लिए चिंता की बात है?
 
दास: फिलहाल सरकारी घाटे के मुद्रीकरण की कोई योजना नहीं है। चालू वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा 3.8 फीसदी हो जाने के बावजूद उधारी में वृद्घि उसी स्तर पर बनी हुई है और अगले वर्ष में यह वृद्घि महज 70,000 करोड़ रुपये की है। यदि इसकी गणना जीडीपी के प्रतिशत के तौर करें तो यह चालू वर्ष की उधारी से कम है। 
 
एनएस विश्वनाथन: यह तरलता प्रबंधन की बात है जिस पर हम काम कर रहे हैं। बैंकों को तीन साल के ब्याद दर परिदृश्य को लेकर सचेत रहना होगा। लेकिन फिलहाल हम यह देख रहे हैं कि यदि बैंक केवल रात भर के लिए उधार लेते हैं तो यह रिवर्स रीपो में हमारे पास रातोंरात वापस आ जाता है। लिहाजा, हम चाहते हैं कि वे लंबी अवधि के लिए उधार लें जो ऋण के तौर पर जाएगी। 
 
माइकल पात्र: ये तीन साल का रीपो मौजूदा 5.15 फीसदी की चालू नीति दर पर दी जाएगी। 
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