बिजनेस स्टैंडर्ड - बजट को कोसने के बजाय करें आकलन
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बजट को कोसने के बजाय करें आकलन

देवाशिष बसु /  February 06, 2020

बाजार के लिए बजट निराशा लेकर आया, लेकिन प्रश्न यह है कि पिछले छह वर्षों में पेश लचर बजट के बावजूद कारोबारी समुदाय ने सातवीं बार कुछ अजूबा होने की उम्मीदें क्यों पाल रखी थीं? बता रहे हैं देवाशिष बसु

 
शनिवार तक उद्योगपतियों और वित्तीय क्षेत्र के विशेषज्ञ इस बात को लेकर लगभग एकमत थे कि वित्त वर्ष 2020-21 के  केंद्रीय बजट में देश को आर्थिक रफ्तार देने के लिए कुछ नए एवं बड़े कदम जरूर उठाए जाएंगे। बाजार भी बजट से ऐसी ही उम्मीदें लगाए बैठा था। बंबई स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) का संवेदी सूचकांक सेंसेक्स अक्टूबर के करीब 38,000 स्तर से उछलकर जनवरी के तीसरे सप्ताह में 42,000 के स्तर तक पहुंच गया। बजट को लेकर उत्साह उस पत्र में शायद सबसे बेहतर ढंग से जाहिर किया गया था, जो मुझे बजट से दो दिन पहले एक कारोबारी सलाहकार ने भेजा था। उस सलाहकार ने पत्र के माध्यम से अपनी टिप्पणी में कहा था, '2020 को कई वर्षों तक इस बात के लिए याद रखा जाएगा कि भारत में किसी तरह चीजें एक झटके में बदल गईं। 1 फरवरी को पेश होने वाला आम बजट वह क्षण हो सकता है।' 
 
फंड प्रबंधक आकाश प्रकाश ने इसी समाचार पत्र के अंग्रेजी संस्करण में लिखा था कि बजट से लीक से हटकर और सही मायनों में सुधारवादी कदमों की उम्मीदें हैं। बजट में देश के बिखरे आर्थिक ताने-बाने को एकजुट करने के लिए सरकार द्वारा पेश प्रस्तावों के ढाई घंटे बाद सेंसेक्स लगभग 1,000 अंक नीचे फिसल गया। हालांकि मैं बाजार की तत्काल प्रतिक्रिया को अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं देख रहा, लेकिन इसने उस पहलू को जरूर सही सिद्ध किया, जिस ओर मैं इशारा करना चाह रहा हूं। दूसरे शब्दों में कहें तो मेरा इशारा बजट में आर्थिक वृद्धि दर को मजबूती देने के लिए ठोस उपाय नदारद रहने से उपजी निराशा की तरफ है। 
 
आम राय पर सवाल
 
मेरे मन में यह प्रश्न खड़ा हो रहा है कि आखिर बजट को लेकर इतनी उम्मीदें पालने का आधार क्या था? आखिर इतने कुशल, पेशेवर और सफल लोगों से इतनी बड़ी गलती कैसे हो गई? पिछले छह बजट से निराशा हाथ लगाने के बाद भी उन्हें ऐसा क्यों लगा कि सातवीं बार कुछ अजूबा होने जा रहा है? इसका सरल जवाब है: खोखली उम्मीद या जान बूझ कर सच की अनदेखी करने से ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं। आप सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद मौजूदा स्थिति का सही आकलन कर सकते हैं, लेकिन एक खोखली बुनियाद के भरोसे सच्चाई की अनदेखी भी बड़ी सहजता से की जा सकती है। 
 
इससे पहले पिछले छह वर्षों में एक के बाद एक बजट से निकल कर आईं चीजों की लोगों ने जान बूझकर अनदेखी की। लोगों ने कठोर कानून, आर्थिक तंत्र कमजोर करने वाली आर्थिक नीतियां, सरकार का जरूरत से अधिक हस्तक्षेप, कारोबारियों एवं नागरिकों के लिए अधिक परेशानियां, नए उपायों के लिए सरकारी अधिकारियों पर निर्भरता, अधिक पेचीदा कानून एवं नियम, आर्थिक आंकड़ों में हेरफेर पर ध्यान देना जरूरी नहीं समझा और सरकार के भटकाने वाले नारे एवं बयानों में उलझ कर रह गए। इन सभी चीजों से देश गंभीर आर्थिक संकट की तरफ बढ़ गया। 
 
तेज एवं सफल लोग, जो अरबों रुपये निवेश कर वास्तविक जीवन के निर्णय लेते हैं, ऐसा लगता है कि उन्होंने इन सभी बातों को नजरअंदाज किया और मन में यह मुगालता पाल लिया कि यह बजट कुछ अलग साबित होगा। ऐसी नौबत क्यों आई? जैसा कि माग्र्रेट हेफरनैन अपनी किताब 'विलफुल ब्लाइंडनेस' में लिखती हैं, 'हम हरेक चीजों पर नजर नहीं रख सकते और न ही हरेक बातें जान सकते हैं। हमें चीजें तलाशनी होती है और इनमें आवश्यक बदलाव करने होते हैं। इस तरह, हम किस पहलू का चयन करते हैं किस बात की अनदेखी करते हैं यह बात काफी अहम हो जाती है। ज्यादातर मामलों में हम उन बातों को पसंद करते हैं, जिनसे हम अच्छा अनुभव करते हैं और हमारा अहं संतुष्टï होता है। हम उन चीजों को दरकिनार कर देते हैं, जिन्हें स्वीकारना हमारे लिए मुश्किल होता है। वैचारिक नजरिया और रूढि़वादिता उन बातों सामने आने नहीं देती हैं, जो एक स्वतंत्र मस्तिष्क आसानी से भांप कर सतर्क हो सकता है। हमारे इर्द-गिर्द भी ऐसा माहौल पनपने लगता है, जो हमें सच्चाई की अनदेखी करने के लिए पूरी तरह तैयार कर देता है।'  
 
कारोबारी सलाहकार की टिप्पणी के अनुसार, 'हम एक ऐसी स्थिति में पहुंच चुके हैं, जहां दूसरा कोई विकल्प नहीं (नो अदर ऑप्शन या एनओसी) नहीं है। एनओसी का समय आ गया है। एक गौरवमयी  विरासत छोडऩे के लिए नरेंद्र मोदी के लिए सफलता का स्वाद चखना जरूरी हो गया है। उनके दूसरे कार्यकाल में 2020 एक अति महत्त्वपूर्ण समय है। मोदी प्रधानमंत्री कार्यालय में अपनी केंद्रीय टीम की मदद से व्यक्तिगत तौर पर सुधार कार्यक्रम को आगे बढ़ा सकते हैं। इससे पहले नरसिंह राव ने पर्दे के पीछे रहकर मनमोहन सिंह के माध्यम से सुधार को आगे बढ़ाया। यह अलग बात रही कि उस समय आर्थिक सुधारों का सारा श्रेय मनमोहन सिंह को मिल गया।'
 
यह एक खोखले विश्वास का आधार था, जिसे मान लिया गया, लेकिन जिसका आकलन कभी नहीं किया गया। एक दृढ़ निश्चयी, कठिन परिश्रमी और एक शानदार विरासत छोडऩे की तमन्ना रखने वाले प्रधानमंत्री में वाकई अर्थव्यवस्था को मुश्किलों से निकालने की क्षमता है! आखिर कई बुद्धिमान लोगों ने इस अवधारणा पर भरोसा ही क्यों किया? हार्वर्ड के मनोवैज्ञानिक डैनियल गिल्बर्ट ने लिखा है, 'लोगों में अक्सर किसी बात पर तुरंत विश्वास करने की प्रवृत्ति पाई जाती है। साथ ही उनके लिए किसी चीज को शक के नजरिये से देखना भी मुश्किल होता है। वास्तव में विश्वास करना इतना आसान और अवश्यंभावी है कि लोग तर्कों पर कसने के बजाय स्वत: ही चीजें स्वीकार कर लेते हैं।' 
 
गिल्बर्ट और उनके सहयोगियों ने प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध किया है कि लोग अक्सर उन चीजों को पहली नजर में सही मान लेते हैं, जो वह पढ़ते हैं सुनते हैं। अगर हम लोगों की विश्वास करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति को सुश्री हेफरनैन द्वारा प्रतिपादित तथ्यों को सुविधानुसार छांटने के सिद्धांत से जोड़कर देखें तो यह पूरी तरह स्पष्टï हो जाता है कि किस तरह बजट से खोखली उम्मीदें लगाई गई थीं। फंड प्रबंधक, कारोबारी, सलाहकार सभी की ख्वाहिश थी कि बजट में वृद्धि दर को मजबूती देने के उपाय किए जाएं। ऐसी चाह रखने में उनके अपने हित जुड़े थे और इसमें उनका यह विश्वास भी था कि उनके दूरदर्शी नेता आखिर में आमूल-चूल परिवर्तन करेंगे। कुल मिलाकर सरकार के काम-काज के तरीकों से इतर उन्होंने अपने दिमाग में अपने हिसाब से उम्मीदें पाल लीं। 
 
आखिर में एक और अहम बात पर मेरी नजर जाती है। 1980 और 1990 के दशक में अमेरिका में जॉर्ज सोरोस और माइकल स्टीनहाड्र्ट दो शीर्ष निवेशक हुआ करते थे। सोरोस कारोबारी थे, जबकि स्टीनहाड्र्ट निवेशक थे। दोनों का मानना था कि आप उस समय तगड़ा मुनाफा कमाते हैं जब आप देखते हैं कि पूरा बाजार एक ऐसी चीज में विश्वास कर रहा है, जो पूरी तरह आधारहीन है। बस इसके लिए आपको इस मानसिकता के उलट दांव खेलना होता है। वारेन बफेट ने इसी चीज को दूसरे तरीके से परिभाषित किया। उनके अनुसार आप अगर एक खुशनुमा माहौल में शामिल होने की एक बड़ी कीमत चुकाते हैं। शनिवार को पेश बजट उन तेज तर्रार दिमाग वालों के लिए एक बड़ी सीख दे गया, जो बिना किसी पुख्ता आधार वाली उम्मीदों की सवारी कर रहे थे। 
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