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समय के साथ शक्तिशाली होता अपरिभाषित संवैधानिक प्रावधान

अदालती आईना
एम जे एंटनी /  February 05, 2020

संविधान के कुछ प्रावधान ऐसे हैं जो एक समय निहायत तुच्छ थे लेकिन अब उनका महत्त्व बहुत बढ़ गया है। अनुच्छेद 142 इसकी बानगी है। यह सर्वोच्च न्यायालय को अधिकार देता है कि वह पूर्ण न्याय करने के लिए कोई आदेश पारित कर सके। संविधान निर्माताओं को अंदाजा नहीं था कि इसमें इतना बड़ा बदलाव आएगा और इसलिए उन्होंने मई 1949 में बिना किसी बहस के इसे पारित कर दिया था। परंतु बाद में न्यायालय ने इसका बार-बार प्रयोग किया और यह न्यायिक प्राधिकार का अहम जरिया बन गया। 

 
हाल ही में इसका प्रयोग अयोध्या मामले, राष्ट्रीय नागरिक पंजी से जुड़े आदेशों, कोयला खदान मामलों, संवैधानिक नियुक्तियों और राजमार्गों पर शराब बिक्री बंद करने संबंधी आदेशों में किया गया। पूर्ण न्याय शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है। न्यायाधीश इनका मनमुताबिक प्रयोग करते हैं। कई फैसलों में इसे स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है लेकिन अभी भी इसे लेकर अस्पष्टता बरकरार है। कुछ निर्णय कहते हैं कि इसका इस्तेमाल उस खालीपन को भरने के लिए किया जाता है जो कानून की खामोशी से उपजता है। कुछ अन्य लोगों का कहना है कि यह अधिकार पूरक और स्वीकारोक्ति कारक है। एक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इस अधिकार को अपरिभाषित और असूचीबद्ध छोडऩा श्रेयस्कर है। यह अधिकार केवल सर्वोच्च न्यायालय के पास है और माना गया था कि यह इस बात की गारंटी होगी कि इसका इस्तेमाल सीमित और सुचिंतित ढंग से होगा। हालांकि न्यायाधीशों ने चेतावनी दी थी कि यह प्रावधान अन्य लोकतांत्रिक संविधानों में नहीं पाया जाता है और हमारे यहां भी इसका इस्तेमाल संयम से किया जाना चाहिए। परंतु इन दिनों हाई प्रोफाइल मामलों में इसका इस्तेमाल किया जा रहा है और इसके कई तरह के राजनीतिक और आर्थिक परिणाम हो सकते हैं। अनिर्वाचित न्यायाधीशों के हाथ में मौजूद पूर्ण न्याय की तलवार कई संवेदनशील मामलों पर लटकती रहती है और वह कभी भी हमला कर सकती है।
 
अयोध्या मामले में दो अहम आदेश इस अनुच्छेद पर आधारित थे- मस्जिद बनाने के लिए पांच एकड़ जमीन देना और प्रस्तावित योजना में निर्मोही अखाड़े को प्रतिनिधित्व प्रदान करना। इससे पहले ढांचे को गिराने से संबंधित आपराधिक मामले रायबरेली से लखनऊ अदालत स्थानांतरित कर दिए गए थे जबकि 25 वर्ष बाद मुकदमा समाप्त होने को था। असम में एनआरसी के विवादित मसले पर आदेश उसी तरह पारित किए गए जैसे दो समांतर जनहित याचिकाओं में। यह मामला अब अदालत के समक्ष लंबित अवस्था में है क्योंकि सड़कों पर विरोध हो रहा है।
 
कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाले में इस अप्रत्याशित शक्ति का इस्तेमाल करने के त्रासद परिणाम हुए। सन 1993 से दिए गए आवंटन सन 2004 में आवंटितों को बिना सुनवाई का अवसर दिए निरस्त कर दिए गए। इस नियम के अतिशय प्रयोग ने तमाम तरह की चिंताओं को जन्म दिया है। सर्वोच्च न्यायालय की आधिकारिक रिपोर्ट (एससीआर) के अनुसार अनुच्छेद 142 का पहला प्रयोग सन 1961 के नानावटी मामले में हुआ था। उसमें हत्या के आरोपी एक नौसेना अधिकारी की सजा को निलंबित किया गया था। एससीआर में इसके बाद लंबे समय तक इस अधिकार के इस्तेमाल का ब्योरा नहीं मिलता। यह माना जाता था कि पूर्ण न्याय करने की शक्ति का प्रयोग केवल प्रक्रियात्मक मामलों में किया जाना है। परंतु सन 1975 के आपातकाल के बाद कानून का विस्तार करके हर तरह के अन्याय और यहां तक कि जनहित याचिकाओं तक को इसमें शामिल कर लिया गया। भ्रष्ट राजनेताओं (विनीत नारायण मामला, 1997), न्यायाधीशों (के वीरास्वामी, 1991) के खिलाफ भी इस कानून का जमकर प्रयोग किया गया। 
 
इसके अलावा सन 1989 में यूनियन कार्बाइड मामले के दावे निपटाने, सन 1979 में आव्रजन अधिनियम की जांच और कार्यस्थल पर यौन शोषण से निपटने (विशाखा, 1997) तक के लिए इसे प्रयोग में लाया गया। अक्सर आदेश पारित होने के बाद जल्द ही उन्हें भुला दिया जाता है। दहेज निरोधक अधिनियम के क्रियान्वयन के दिशानिर्देश इसका उदाहरण हैं। उदाहरण के लिए कितने लोगों को वह आदेश याद होगा जिसमें कहा गया था कि चिकित्सकीय उपकरणों के आयात में सीमा शुल्क में राहत पाने वाले अस्पतालों को उन गरीब लोगों के नाम प्रकाशित करने होंगे जिनका उन्होंने हर माह इलाज किया।
 
अनुच्छेद 142 पर होने वाली चर्चाएं प्राय: अस्पष्ट भाषा में होती हैं। वे इस बात की अनदेखी करती हैं कि कानून की भाषा स्पष्ट और सहज होनी चाहिए। उदाहरण के लिए एक सामान्य व्यक्ति अयोध्या मामले में दिए गए निर्णय के एक पैराग्राफ को पढ़कर भौंचक रह जाएगा, 'जहां ऐसा प्रतीत होता है कि किसी परिस्थिति को संभालने में दृढ़ता कमजोर पड़ रही है, वहां इस अदालत की पूर्ण न्याय करने की पूर्ण शक्ति वह आखिरी अपील है जो उस समता का बचाव करती है जिसका संरक्षण कानून को करना होता है। ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अदालत के पास यह अधिकार है कि वह तार्किक और न्यायपूर्ण ढंग से राहत प्रदान कर सके।' बहुधार्मिक राजनीति और कानून व्यवस्था को लेकर मौजूदा अस्थिर माहौल में अनुच्छेद 142 के इस्तेमाल को लेकर पारदर्शी और सख्त रुख अपनाना आवश्यक है। अधिवक्ता अच्छी तरह जानते हैं कि शब्दों की आड़ में कमजोर कदम को छिपाया जा सकता है। 
 
इस प्रवृत्ति पर टिप्पणी करते हुए मौजूदा एटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने कुछ वक्त पहले अमेरिकी न्यायाधीश बेंजामिन कार्डोजो को उद्धृत किया था। उन्होंने कहा था कि न्यायाधीश कोई मध्ययुगीन नाइट नहीं होते जो अपने आदर्शों की तलाश में अपनी मर्जी से भटकते रहें। 
Keyword: supreme court, high court, justice, coal,,
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