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बजट में फिर सामने आए ढांचागत राजस्व गतिरोध

रथिन रॉय /  February 05, 2020

केंद्रीय बजट में इस बात को कमोबेश स्वीकार कर लिया गया है कि उसमें विस्तारवादी राजकोषीय नीति के लिए जगह नहीं है। इस संबंध में विस्तार से दृष्टि डाल रहे हैं रथिन रॉय

 
गत वर्ष जुलाई में वित्त वर्ष 2020 के बजट को लेकर अपने आलेख में मैंने चेतावनी दी थी कि सरकार ढांचागत राजकोषीय गतिरोध से गुजर रही है और राजस्व प्राप्ति के क्षेत्र में गलत ढंग से आशावादी आंकड़ों के माध्यम से उसे छिपाने का प्रयास कर रही है। इस वर्ष का बजट पारदर्शी है। परंतु सरकार के समक्ष राजकोषीय बाधाएं बरकरार हैं क्योंकि राजस्व प्राप्तियां पर्याप्त नहीं हैं। बढ़ते हुए राजकोषीय घाटे की बड़ी वजह यह बाधा है। वित्त वर्ष 2020 में सकल कर राजस्व प्राप्तियां 3 लाख करोड़ रुपये रही। यह बजट अनुमान में उल्लिखित राशि से कम है। इसमें आधी कमी के लिए कॉर्पोरेट कर में कमी उत्तरदायी रही, यह आंकड़ा कर दरों में कटौती की घोषणा के वक्त अनुमानित से अधिक रहा। शेष आधा हिस्सा अप्रत्यक्ष करों में 1.32 लाख करोड़ रुपये की कमी के कारण आया। समग्रता में देखा जाए तो वित्त वर्ष 2020 में सकल कर राजस्व में जीडीपी के 1.46 फीसदी के बराबर कमी आई। केंद्र के शुद्ध कर राजस्व में जीडीपी के 0.7 फीसदी के बराबर कमी आई और राज्यों के जीडीपी के 0.75 फीसदी के बराबर कमी आई। इसका राज्यों के कर संग्रह में कमी पर असंगतिपूर्ण प्रभाव पड़ा जिसकी वजह उपकरों की बढ़ी हुई हिस्सेदारी रही। ऐसा इसलिए क्योंकि इन उपकरों पर कर दरों में कटौती का असर नहीं हुआ। यानी राजकोषीय तनाव राज्यों पर असर डाल रहा है। 15वें वित्त आयोग की रिपोर्ट में इस तथ्य की अनदेखी कर दी गई है।
 
इस कमी के कारण और विनिवेश प्राप्तियों में अतिरिक्त कमी के कारण कुल व्यय में जीडीपी के 0.43 फीसदी कमी आई है। ऐसा तब है जबकि राजकोषीय घाटे और जीडीपी का अनुपात 3.3 फीसदी से बढ़कर 3.8 फीसदी हो गया। गैर कर राजस्व में जीडीपी की तुलना में 0.16 फीसदी का इजाफा हुआ। इस तरह देखें तो यह विस्तारवादी नहीं बल्कि संकुचन वाला बजट है। शायद इसी वजह से वित्त मंत्री अपने लंबे भाषण में वृद्धि में आई मंदी को लेकर कुछ नहीं बोलीं। उन्होंने यह भी नहीं बताया कि विस्तारवादी राजकोषीय नीति कैसे इसे हल करेगी।
 
परंतु वित्त वर्ष 2021 के बजट अनुमान हकीकत के करीब हैं। इसमें कहा गया है कि जीडीपी के प्रतिशत के रूप में शुद्ध कर राजस्व में कमी आएगी। परंतु उसने यह भी कहा है कि व्यय-जीडीपी अनुपात में जीडीपी के 0.33 फीसदी के बराबर इजाफा होगा। यह अपने आप में एक पहेली लगती है जब तक कि हम विनिवेश प्राप्तियों के अनुमान पर नजर नहीं डालते। विनिवेश प्राप्तियों को तीन गुना से अधिक बढ़ाकर 65,000 करोड़ रुपये से 2.1 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया है। ऐसे में परिसंपत्तियों की बिक्री में भारी इजाफे की सहायता से व्यय-जीडीपी अनुपात में इजाफे की भरपाई की जाएगी और राजकोषीय घाटा कम किया जाएगा। फिलहाल मुझे यह भरोसेमंद नहीं लगता।
 
यह दिलचस्प है कि वित्त वर्ष 2021 में राजस्व घाटे और जीडीपी का अनुपात वित्त वर्ष 2020 के 2.4 फीसदी से बढ़कर 2.7 फीसदी हो गया। यानी पूंजीगत व्यय अनुपात के लिए कुल उधारी वित्त वर्ष 2021 में राजकोषीय घाटे का 0.8 फीसदी गिरी। सन 2020 में यह गिरावट 1.4 फीसदी थी। यानी 2021 में नीति है-बढ़े राजस्व व्यय की फंडिंग विनिवेश के जरिये करना। सरकार की सराहना की जानी चाहिए कि उसने बजट से इतर उधारी का व्यय विवरण में स्पष्ट उल्लेख किया। यह जीडीपी के 0.8 फीसदी पर बरकरार है। इस वर्ष कुल सरकारी उधारी जीडीपी के 4.6 फीसदी के बराबर है। अगले वर्ष इसके 4.3 फीसदी की दर से बढऩे की आशा है। अर्थशास्त्रियों के लिए बेहतर यही होगा कि वे इन वास्तविक आंकड़ों का इस्तेमाल करें। सभी तीन वर्षों में इस अतिरिक्त व्यय का ज्यादातर हिस्सा भारतीय खाद्य निगम की गतिविधियों की फंडिंग के लिए जाता है। मुझे नहीं लगता कि यह व्यय किसी भी तरह वृद्धि में आए धीमेपन को हल करता है। इससे मेरी यह धारणा मजबूत होती है कि सरकार के पास विस्तारवादी राजकोषीय नीति के लिए कोई गुंजाइश शेष नहीं है।
 
मुझे व्यय में बदलाव लाने वाली ऐसी नीतियों की अपेक्षा थी जो वृद्धि में आए धीमेपन को हल करें। खेद की बात है कि प्रतिष्ठानों पर होने वाला व्यय, जीएसटी उपकर, ब्याज भुगतान, सांविधिक और वित्त आयोग के हस्तांतरण आदि वित्त वर्ष 2019 से 2021 के बजट अनुमान तक 6.8 फीसदी से 7 फीसदी के बीच स्थिर हैं। यानी सरकारी व्यय का आधा हिस्सा फंसा हुआ है। अन्य आधे हिस्से की बात करें तो सब्सिडी की हिस्सेदारी में कमी आई है जिसका इस्तेमाल केंद्र सरकार की योजनाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने में किया गया है।
 
बिना प्रतिबद्धता वाले व्यय की बात करें तो वित्त वर्ष 2021 में कृषि व्यय में 2020 की तुलना में 28 प्रतिशत इजाफा हुआ। बुनियादी परियोजनाओं को आश्चर्यजनक रूप से 12,500 करोड़ रुपये का कम आवंटन हुआ, विकास व्यय के आवंटन में कोई खास इजाफा नहीं हुआ। शिक्षा, ऊर्जा और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में काफी कम इजाफा किया गया। वित्त वर्ष 2020 के संशोधित अनुमान की बात करें तो राजकोषीय घाटे में पूरी बढ़ोतरी व्यय-जीडीपी अनुपात को बजट स्तर पर बरकरार रखने में अक्षम थी। इस वर्ष राजस्व घाटा कम होगा लेकिन वित्त वर्ष 2021 में उसमें इजाफा होगा। प्रतिबद्घ व्यय में इजाफा होगा और कर-जीडीपी अनुपात का ढांचागत ठहराव इस वर्ष भी बना रहेगा। यह बजट वही बातें कहता है जो मैं लंबे समय से दोहराता आ रहा हूं। बात यह कि मध्यम अवधि में विस्तारवादी राजकोषीय नीति की गुंजाइश नहीं है।
 
राजकोषीय जवाबदेही एवं बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) समीक्षा समिति के बचाव मार्ग का हल्काफुल्का जिक्र विश्वसनीय नहीं है। इसे स्वतंत्र राजकोषीय परिषद की सलाह पर लागू किया जाना था लेकिन वह परिषद अब तक गठित नहीं की जा सकी है। बजट में इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है कि इसे क्यों लागू किया गया। सरकार ने ऐसा कोई खाका पेश नहीं किया जो एफआरबीएम समिति की अनुशंसाओं के अनुरूप हो। सबसे बुरी बात, मैंने दिखाया कि बढ़ी हुई राजकोषीय गुंजाइश का इस्तेमाल केवल कर राजस्व में हुई कमी की भरपाई के लिए किया गया। वास्तव में ऐसा करके भी इस तथ्य को छिपाया नहीं जा सकता है कि मध्यम अवधि में राजकोषीय स्थिति कमजोर है और इसलिए यह दर्शाना निरर्थक होगा कि एफआरबीएम पथ पर नियंत्रित वापसी एक विश्वसनीय लक्ष्य है।
 
(लेखक नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी के निदेशक हैं। लेख में विचार निजी हैं)
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