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सेना के लिए रकम जुटाने के वास्ते हटकर सोचने की जरूरत

दोधारी तलवार
अजय शुक्ला /  February 04, 2020

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट भाषण में इस बात का खुलासा नहीं किया कि वह रक्षा क्षेत्र को कितना आवंटित कर रही हैं। उसी समय यह साफ हो गया था कि इसमें मामूली बढ़त होने जा रही है। जब आंकड़े सामने आए तो यह आशंका सही साबित हुई। रक्षा खर्च में 5 फीसदी की मामूली बढ़ोतरी की गई है जो महंगाई की भरपाई करने के लिए भी काफी नहीं है। सरकार ने साफ कर दिया है कि उसकी प्राथमिकता शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के विकास पर खर्च बढ़ाना है। कुल बजट आवंटन में सेना का हिस्सा लगातार कम हो रहा है। 2018-19 में यह 17.4 फीसदी और 2019-20 में 16.6 फीसदी था और 2020-21 में 15.5 फीसदी रह गया है।

 
जब देश में बच्चे कुपोषण का शिकार हैं, आम जनता चिकित्सा सुविधाओं से वंचित है और युवाओं के पास रोजगार पाने के लिए पर्याप्त शिक्षा नहीं है, तो रक्षा पर ज्यादा खर्च की दलील देना मुश्किल है। हमारे पास सैन्य महाशक्ति बनने के लिए आर्थिक संसाधनों की कमी है, इसलिए हम बेलगाम राष्टï्रवाद का झंडा उठाए नहीं फिर सकते हैं। हमें चीन से अपनी तुलना करने के बजाय यह सोचना चाहिए कि हम रक्षा पर कितना खर्च करने में सक्षम हैं। उसी के हिसाब से हमें अपनी विदेश और आंतरिक नीति बनानी चाहिए। सरकार के बजट में अब भी रक्षा का हिस्सा सबसे बड़ा है, इसलिए हमें इसके बेहतर उपयोग के लिए व्यापक चर्चा करनी चाहिए। 
 
बजट का सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा यह था कि सेना के लिए वेतन (111,294 करोड़ रुपये) से ज्यादा पेंशन (113,278 करोड़ रुपये) की राशि आवंटित की गई है। यानी सरकार अपने मौजूदा सैनिकों की तुलना में पूर्व सैनिकों पर ज्यादा खर्च करेगी। इस तर्क का मतलब यह नहीं है कि पूर्व सैनिकों को नजरदांज किया जाए जिन्होंने अपने जीवन का बहुमूल्य समय मातृभूमि की सेवा में खपाया है। बल्कि यह खुद को याद दिलाने का समय है कि वे सभी वर्ष अर्थव्यवस्था और सेना के लिए नुकसान के रहे हैं। कई विशेषज्ञ समितियों ने अपनी रिपोर्ट में शॉर्ट सर्विस व्यवस्था से इसका समाधान किया जा सकता है। इसके तहत सैनिक तीन से चार साल के लिए अपनी सेवा देते हैं और फिर पेंशन के बिना सेवानिवृत्त होकर श्रम बल के रूप में अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं। लेकिन निहित स्वार्थों के कारण यह व्यवस्था कभी नहीं अपनाई गई।
 
अमूमन, एक के बाद एक सभी सरकारों को भारी-भरकम पेंशन बिल का सामना करना पड़ा है और उन्होंने इसे रक्षा बजट से अलग दिखाने की कोशिश की है। बजट के बाद रक्षा मंत्रालय ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि रक्षा के लिए 337,553 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं जिसमें रक्षा पेंशन शामिल नहीं है। शाब्दिक रूप से यह सही है, लेकिन यह पृथक्करण इस बात को समझने की अनिच्छा को दिखाता है कि पेंशन बजट जनरलों द्वारा बनाई गई नीतियों का पालन करता है। सैन्य बलों के नए प्रमुख (सीडीएस) को इस पर ध्यान देना चाहिए। सेना प्रमुख के रूप में उन्होंने सेना में सुधार के लिए कुछ कदम उठाए थे। 
 
इन सुधारों में इस बात को भी शामिल किया जाना चाहिए कि रसद और रखरखाव के कामों को असैन्य क्षेत्र के हवाले किया जाएगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि असैन्य क्षेत्र में इसकी लागत कम है। इससे सैन्य ठिकानों के आसपास स्थानीय अर्थव्यवस्था में तेजी आएगी और पूर्व सैनिकों को रोजगार मिलेगा। उदाहरण के लिए ब्रिटेन में शाही वायुसेना के अधिकांश विमानों का रखरखाव और मरम्मत अनुबंध पर रखे गए आरएएफ के पूर्व सैनिक करते हैं। 
 
बजट संबंधी अन्य तत्काल जरूरत तीनों सेनाओं के बीच राशि का सुसंगत वितरण है। एक विश्लेषण के मुताबिक साल दर साल थलसेना, नौसेना और वायुसेना को मोटे तौर पर रक्षा बजट में समान हिस्सा मिलता रहा है और अपनी भूमिका, प्रौद्योगिकी या माहौल में बदलाव के बावजूद वे उसी मुताबिक खर्च करते रहे हैं। हर साल थलसेना को रक्षा बजट की लगभग दो-तिहाई राशि मिलती है और वह इसमें से करीब तीन-चौथाई हिस्सा वेतन और पेंशन पर खर्च करती है। इससे उसके पास आधुनिक हथियारों की खरीद के लिए करीब 10 फीसदी राशि ही बच जाती है। दूसरी नौसेना और वायुसेना अपने कुल आवंटन का करीब आधा हिस्सा नए हथियार खरीदने में पर खर्च करती हैं क्योंकि उनके कर्मचारियों की संख्या कम है।
 
समस्या यह है कि यह वितरण लक्षित प्राथमिकताओं के आधार पर नहीं होता है जहां जनरल, एडमिरल और एयर मार्शल मिलकर अपनी जरूरत की परिचालन क्षमताओं के बारे में फैसला करते हैं। यह प्रक्रिया आसान नहीं है। सभी इस बात पर सहमत होंगे कि हमें सीमा पार स्थित आतंकी ठिकानों पर हमलों के लिए तैयार रहने की जरूरत है लेकिन इस बात पर गंभीर मतभेद हैं कि ऐसा कैसे किया जाए। वायुसेना के विमानों से या सतह से सतह पर मार करने वाले प्रक्षेपास्त्रों से? या फिर इस काम के लिए सेना के विशेष बलों का गठन किया जाना चाहिए? अगर हवाई हमलों पर सहमति बनती है तो लड़ाकू विमानों और प्रक्षेपास्त्रों को खरीदने के लिए अतिरिक्त रकम मुहैया कराई जानी चाहिए। अगर विशेष बलों को यह जिम्मेदारी दी जाती है तो थलसेना को विशेष बल कमान बनाने के लिए मदद दी जानी चाहिए। तीनों सेनाएं पिछले वर्ष आवंटित राशि के आधार पर अपने वित्तीय अनुमान तैयार करती हैं। रक्षा मंत्रालय उनमें औसतन 30 से 35 फीसदी की कटौती करता है। आवंटन से पहले वित्त मंत्रालय इनमें और कटौती करता है। इसका नतीजा यह होता है कि हर साल सेना के तीनों अंगों को पिछले साल की तुलना में थोड़ा अधिक आवंटन किया जाता है लेकिन उसका अनुपात कमोबेश समान होता है। सेना के आधुनिकीकरण के लिए रकम मुहैया कराने के वास्ते हटकर सोचने की जरूरत है। सेना की दीर्घकालिक योजना के मुताबिक आधुनिक हथियार खरीदने के लिए रक्षा बजट में आवंटित राशि के इतर 13 लाख करोड़ रुपये की जरूरत होगी। 
Keyword: budget, nirmala sitaraman, economy, Defence,
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