बिजनेस स्टैंडर्ड - घाटे की भरपाई के लिए विदेशी कर्ज का रास्ता
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Tuesday, February 25, 2020 05:58 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

घाटे की भरपाई के लिए विदेशी कर्ज का रास्ता

मिहिर एस शर्मा /  February 04, 2020

बंधे खर्च और राजस्व की किल्लत को मद्देनजर रखते हुए घाटे की वित्त व्यवस्था के लिए वित्त मंत्री ने बेहतरीन ही किया है। इस संबंध में विस्तार से बता रहे हैं मिहिर एस शर्मा 

 
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने विभिन्न चुनौतियों के बीच 2020-21 का केंद्रीय बजट तैयार किया है। अर्थव्यवस्था में अचानक बड़ी सुस्ती आई है। कर राजस्व अनुमान से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 0.7 फीसदी कम रहने के आसार हैं। हालांकि इसमें आर्थिक मंदी और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का कितना-कितना योगदान है, उसका आसानी से निर्धारण नहीं किया जा सकता है। सरकार के लगातार चुनाव लडऩे की मुद्रा में होने और प्रधानमंत्री कार्यालय की अत्यधिक सक्रियता की वजह से बजट प्रक्रिया पर राजनीतिक दबाव बरकरार है। 
 
हालांकि सीतारमण ने दिखाया है कि उनके पास उन हित समूहों के लिए समय नहीं है, जो विशेष या किसी क्षेत्र को लाभ देने की मांग कर रहे हैं। लेकिन इस पर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है कि इस समय बेहतर रणनीति क्या है- मांग को बढ़ाने के लिए कुछ समय राजकोषीय बाधाओं की अनदेखी की जाए या संकट की इस घड़ी में ढांचागत सुधारों को आगे बढ़ाते हुए राजकोषीय स्थिति को नियंत्रण में रखा जाए। 
 
ऐसा लगता है कि वित्त मंत्री ने अपने सामने मौजूद स्थिति को देखते हुए दोनों विकल्पों के बीच का रास्ता चुना है। कागजों में राजकोषीय नियंत्रण की राह में केवल उतना ही बदलाव किया है, जितना राजकोषीय जिम्मेदारी एïवं बजट प्रबंधन अधिनियम (एफआरबीएम) इसकी मंजूरी देता है। हालांकि  खर्च को नियंत्रित किया गया है, लेकिन उतना नहीं, जितना राजस्व की किल्लत को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए था। ऐसे बजट को बहस के दोनों पक्षों की तरफ से 'निराशाजनक' कहा जाएगा। 
 
निश्चित रूप से ऐसा लगता है कि शेयर बाजारों ने यह निराशा दिखाई है। शेयर बाजार बजट के दिन खुले थे और उनमें कारोबार हो रहा था। हालांकि यह शनिवार का दिन था। कुछ लोगों ने उम्मीद की होगी कि बड़े राजकोषीय प्रोत्साहनों पर काम हो रहा है, जिनसे उपभोक्ता मांग में फिर सुधार आएगा और कंपनियों की आमदनी में इजाफा होगा। हालांकि मैं इस विचारधारा को लेकर अनिश्चित हूं, जो इस उम्मीद की समर्थक हैं। बहुत से लोगों का मानना है कि नई जीएसटी प्रणाली में कर चोरी बड़े पैमाने पर हो रही है। अगर इस कर चोरी की वजह से जीएसटी जीडीपी के एक फीसदी तक कम बना हुआ है तो इसका क्या मतलब है? निश्चित रूप से अगर जीडीपी के अनुपात में कर 2017-18 से घट रहा है और जिसकी एक वजह जनता के हाथ में ही अप्रत्यक्ष करों का रहना है तो क्या इसे एक उतने ही बड़े प्रोत्साहन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए? 
 
ऐसे कुछ वाजिब सवाल हैं, जो पूछे जा सकते हैं। क्या राजकोषीय घाटे को वास्तव में नियंत्रित किया गया है और उसे लक्ष्य से कम रखा जाएगा। वित्त मंत्री ने बीते वर्षों की तुलना में ज्यादा पारदर्शिता बरती है। उन्होंने कुछ अतिरिक्त बजट उधारी का खुलासा किया है और यह दिखाया है कि इससे वास्तविक राजकोषीय घाटे में कितनी बढ़ोतरी होगी। हालांकि एक तथ्य यह भी है कि अद्र्ध-सरकारी एजेंसियों की उधारी को इसमें प्रदर्शित नहीं किया गया।
 
हालांकि अब पहले की तुलना में यह ज्यादा साफ हो गया है कि सरकार की राजकोषीय स्थिति क्या है। यही संभवतया एक वजह है, जिससे बॉन्ड बाजार बजट को लेकर इक्विटी बाजारों से बिल्कुल अलग रुख अपना सकता है। बजट अनुमानों के मुताबिक आगामी वर्ष में सरकार की बाजार उधारी संभावित आंकड़े से कम है। सवाल यह है कि क्या बॉन्ड बाजार प्रतिक्रिया दे पाएंगे। उदाहरण के लिए यह उम्मीद करना कि विदेशी निवेशक भारतीय बॉन्डों को लपक लेंगे, असल में सही नहीं है। क्लियरिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के मुताबिक इस समय विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की सामान्य श्रेणी की भारतीय प्रतिभूतियां खरीदने की सीमा 2.47 लाख करोड़ रुपये है, जिसमें से केवल 1.74 लाख करोड़ रुपये यानी करीब 70 फीसदी का इस्तेमाल हो रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने पिछले महीने इसका समाधान करने की कोशिश की है। केंद्रीय बैंक ने एफपीआई के कुल निवेश में लघु अवधि की प्रतिभूतियों में लगाए जा सकने वाले अनुपात को बढ़ाया है। हालांकि एचएसबीसी के विश्लेषकों ने कहा है कि बजट की वजह से भारतीय बॉन्डों की मांग में निकट भविष्य में सुधार आने के आसार नहीं हैं। हाल के महीनों में विदेशी निवेशकों ने विशेष रूप से भारत सरकार की प्रतिभूतियों की शुद्ध बिक्री की है।
 
हालांकि अगर भारतीय बॉन्डों को वैश्विक बॉन्ड सूचकांकों में शामिल किया जाता है तो बड़ा फायदा मिलेगा। इससे बड़े पैसिव निवेशक भारत सरकार की घाटों की पूर्ति करेंगे। इसके पीछे यह विचार है कि इससे भारतीय घरेलू संसाधनों पर दबाव कम होगा और सरकार के घाटे को पूरा करने के लिए लघु अवधि की नकदी आवक पर निर्भरता के खतरे को टाला जा सकेगा। निश्चित रूप से यह मौजूदा तरीके राष्ट्रीय लघु बचत कोष (एनएसएसएफ) पर निर्भरता के बजाय घाटे की भरपाई का बेहतर तरीका होगा। एनएसएसएफ का खर्च के लिए पिग्गी बैंक के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, जो निश्चित रूप से सतत नहीं है। बजट में कुछ ऐसी घोषणाएं शामिल हैं, जो इस प्रयास से संबंधित लगती हैं। सीतारमण के भाषण में यह वादा भी शामिल है कि 'सरकारी प्रतिभूतियों की कुछ खास श्रेणियों को पूरी तरह प्रवासी निवेशकों के लिए खोला जाएगा।' हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि असल में इसका क्या मतलब है। 
 
एक संबंधित सवाल यह है कि क्या कॉरपोरेट बॉन्डों को फायदा मिलेगा। मुख्य आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल ने बताया कि कैसे बाइलेटरल नेटिंग के लिए जिस कानून का वादा किया गया है, वह क्रेडिट-डिफॉल्ट स्वैप विकसित करने और इस तरह कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार को मजूबत करने में मददगार साबित हो सकता है। कुछ स्तर पर बॉन्ड और इक्विटी बाजारों पर असर एक साथ दिखेंगे। इस समय भारत सरकार अपने संसाधनों से अधिक खर्च कर रही है। वह तेल विपणन कंपनियों, उर्वरक कंपनियों आदि को बिलों का भुगतान नहीं कर रही है। वह राज्यों को भुगतान में देरी कर रही है। सरकार बजटीय विवेकाधीन और पूंजीगत खर्च को नहीं अपना रही है। केंद्र सरकार का दो-तिहाई खर्च बंधा हुआ है, जिसमें कमी करना मुश्किल है। इस तरह राजस्व घटने का बोझ व्यय के शेष तीसरे हिस्से पड़ता है, जो कम हो रहा है। इसका आम तौर पर वित्तीय बाजारों पर भी असर पड़ता है। पिछले साल यह साफ हो गया था कि डॉलर में कर्ज जारी करने को लेकर अहम प्रतिरोध हो रहा है, इसलिए हम घरेलू वित्तीय बाजारों पर निर्भर हैं। घरेलू वित्तीय बाजारों की घाटे की भरपाई करने की क्षमता उनके आकार पर निर्भर करती है। वहीं घरेलू वित्तीय बाजारों का आकार परिवारों की वित्तीय बचत और विदेश से धन की आवक पर निर्भर करती है। अधिक विनिवेश प्राप्तियों का मतलब है कि इक्विटी बाजार के भागीदारों के पास जुटाने के लिए घरेलू वित्तीय बचतें कम होंगी। घरेलू वित्तीय बचतें जीडीपी की 10 फीसदी हैं। 
 
परंपरागत रूप से बॉन्ड बाजार में सरकारी प्रतिभूतियों के कारण निजी क्षेत्र पैसा नहीं जुटा पाता है। बहुत से लोगों के विचार से इक्विटी बाजारों में विदेशी भागीदारी ज्यादा से ज्यादा प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। इसलिए वित्त के कोष को बढ़ाने का एकमात्र तरीका यह बचता है कि डेट बाजार में विदेशी भागीदारी बढ़ाई जाए। असल में सरकार के पास अन्य विकल्प बहुत कम हैं। इस तरह संकट का तात्कालिक असर इस तरह भी दिख रहा है कि सरकार अपने घाटे की भरपाई के लिए विदेशी कर्ज की आवक के रास्ते खोल रही है। इसके बाद दो अहम सवाल बचते हैं। पहला, अगर ऐसे धन की आवक होती है तो रुपये के मूल्य और सुधार के एकमात्र टिकाऊ रास्ते निर्यात में वृद्धि पर क्या असर पड़ेगा? दूसरा क्या इस धन की भारत में आवक को बढ़ाने के प्रयासों में सरकारी खर्च के चैनल पर प्रभावी ध्यान दिया गया है? 
Keyword: budget, nirmala sitaraman, economy, revenue, fiscal deficit, subsidy, GDP,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या कोरोनावायरस के खतरे से जल्द निपट पाएगी दुनिया?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.