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ज्यादा उत्पादक क्षेत्रों पर व्यय को दी गई है प्राथमिकता

अरूप रॉयचौधरी /  February 04, 2020

दिसंबर के मध्य व्यय सचिव टीवी सोमनाथन ने वित्त मंत्रालय में नया पद संभाला था, जब बजट की तैयारियां जोरों पर थीं। अरूप रॉयचौधरी से बातचीत में उन्होंने कहा कि सरकार मनरेगा और पीएम-किसान जैसी प्रमुख ग्रामीण योजनाओं को जरूरत पडऩे पर ज्यादा धन मुहैया कराएगी और उन क्षेत्रों में व्यय पर जोर होगा, जिससे वृद्धि और खपत में जल्द से जल्द तेजी लाने में मदद मिले। प्रमुख अंश...

 
आपके मुताबिक बजट के आंकड़े हकीकत के कितने करीब हैं? 
 
मुझे लगता है कि वास्तव में यह हकीकत के बहुत करीब हैं, क्योंकि न तो इसमें बहुत ज्यादा उम्मीद जताई गई है, न निराशा दिखाई गई है। अगर आप नॉमिनल जीडीपी में 10 प्रतिशत वृद्धि का उदाहरण लें तो हम वास्तविक जीडीपी वृद्धि 6 से 6.5 प्रतिशत के बीच रहने और महंगाई दर 3.5 से 4 प्रतिशत के बीच की उम्मीद करते हैं। लेकिन अगर आप हाल के खुदरा महंगाई के आंकड़े देखें तो यह 5 प्रतिशत तक रहा है, हालांकि थोक महंगाई दर कुछ कम है। इस तरह से देखें तो हमारे आंकड़े हकीकत के बहुत करीब हैं। अगर आप राजस्व का अनुमान देखेंं तो इसके 1.2 तक बढऩे का अनुमान लगाया गया है। यह पहले के आंकड़ोंं के हिसाब से हासिल किए जाने योग्य है। 
 
क्या बजट में पर्याप्त कदम उठाए गए हैं? विशेषज्ञों और यहां तक कि सरकार से जुड़े कुछ लोग सालाना आधार पर राजकोषीय विस्तार की बात कर रहे थे, आपने ऐसा नहीं किया। 
 
यह विस्तार है या नहीं, यह भी विभाजक पर निर्भर होता है। बढ़ती अर्थव्यवस्था में समग्र हिसाब से 3.5 प्रतिशत, 3.8 प्रतिशत से ज्यादा है। इस तरह से कुल मिलाकर समग्र सार्वजकि व्यय अगले साल 11 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ेगा। पूंजीगत व्यय में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी। 
 
केंद्रीय योजनाओं को तार्किक न बनाए जाने को लेकर 15वें वित्त आयोग ने सरकार की खिंचाई की है और कहा है कि सरकार को केंद्र की योजनाओं का गहराई से आकलन करना चाहिए। क्या सरकार ऐसा करेगी?
 
हां। हम केंद्र सरकार की ओर से प्रायोजित परियोजनाओं को तार्किक बनाने की गंभीर कवायद कर रहे हैं और यह वित्त आयोग की सिफारिशों से थोड़ा अलग है। हमारा वैसा भी करने का इरादा है। हम ऐसा विचार कर रहे हैं कि ज्यादा मूल्य के व्यय के लिए जगह बन सके और कम मूल्य के अतिरिक्त व्यय को खत्म किया जा सके। मैं पहले से आकलन नहीं करूंगा कि इस कवायद से क्या निकलकर सामने आएगा, लेकिन हम इस दिशा में गंभीर प्रयास कर रहे हैं। 
 
क्या अगले बजट में योजनाओं की संख्या बहुत कम होने जा रही है? 
 
मैं किसी कमी या किसी संख्या पर प्रतिक्रिया नहीं देना चाहता हूं, क्योंकि कुछ मामलों में आप जो चाहते हैं, वह जरूरी नहीं है कि कमी ही हो। आपको कुछ मामलों में बढ़ाने की भी जरूरत होती है। तार्किक बनाए जाने में दोनों काम शामिल है। आपके पास बेहतर योजनाएं हो सकती हैं, जो धन की कमी से जूझ रही हों और बुरी योजनाओं में कटौती करने की जरूरत पड़ सकती है। 
 
आपने इस साल पीएम-किसान से 20,600 करोड़ रुपये बचत का अनुमान लगाया था, अगर बजट अनुमान की तुलना संशोधित अनुमान से की जाए। ऐसे में फिर से वित्त वर्ष 21 के लिए 75,000 करोड़ रुपये क्यों आवंटित किए गए? 
 
यह बढ़ोतरी इसलिए की गई है कि पहले साल में डुप्लीकेशन को छोड़ दें तो पहुंच का मसला होता है, क्योंकि योजना तेजी से शुरू की गई और बहुत तेजी से बढ़ी। ऐसे में यह संभव हो कि तमाम लोग छूट गए हों। क्योंकि विभिन्न राज्य सरकारों ने इसे पहले दौर में विभिन्न तरीकों व अलग अलग प्रशासनिक क्षमता के हिसाब से लागू किया। हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि कम धन न दिया जाए क्योंकि अगर यह जरूरी है तो होना चाहिए। क्योंकि यह समाज के हाशिये पर खड़े लोगों को दिया जा रहा है। 
 
मनरेगा के बारे में क्या कहेंगे? आपने वित्त वर्ष 21 में वित्त वर्ष 20 के संशोधित अनुमान से कम आवंटन किया? 
 
मनरेगा मांग आधारित योजना है, ऐसे में अगर मांग बढ़ती है तो इस योजना के लिए धन मुहैया कराने की जरूरत होगी। इस साल कुछ इलाकों से मांग बढ़ी थी। आंशिक रूप से यह परिस्थितियों पर भी निर्भर होता है और इस साल कुछ राज्यों में मौसम प्रतिकूल था। अगर आने वाले साल में कुछ अप्रत्याशित घटना होती है और मांग बढ़ती है तो हम धन मुहैया कराएंगे, चाहे वह मनरेगा हो या पीएम-किसान। 
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