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केंद्रीय बजट में संशोधित अनुमानों के जोखिम

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  February 03, 2020

वित्त वर्ष 2020-21 के आम बजट में दिए गए खर्च के आंकड़ों पर करीबी नजर डालने पर पता चलता है कि कैसे केंद्र सरकार ने चालू वर्ष में अपनी वित्तीय स्थिति को साधने की कोशिश की है। साथ ही उसने चालू वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटे की फिसलन को केवल 0.5 फीसदी अंक तक सीमित रखने के वास्ते अपने खर्च को कम करने के लिए एक नया आयाम जोड़ा है। सरकार के पास 2019-20 में अपने खर्च में कटौती के अलावा कोई चारा नहीं था क्योंकि जुलाई 2019 में सरकार ने राजस्व का जो अनुमान लगाया था, वह वास्तविकता से कोसों दूर रह गया। शुद्ध कर राजस्व में 1.45 लाख करोड़ रुपये की कमी रही और विनिवेश राजस्व अनुमानों से 40,000 करोड़ रुपये पीछे रह गया। इस तरह यह कमी कुल 1.85 लाख करोड़ रुपये की रही जो सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 0.9 फीसदी है।

 
इसके अलावा विभिन्न मदों जैसे केंद्र शासित प्रदेशों के लिए अनुदान, रक्षा, ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम, पेंशन, प्राकृतिक आपदाओं के लिए राहत, पुलिस, रेलवे, शिक्षा, पेट्रोलियम सब्सिडी और अंतरिक्ष शोध के लिए पूंजी सब्सिडी में ज्यादा खर्च की समस्या थी। इन मदों में 70,900 करोड़ रुपये अधिक खर्च होने का अनुमान था। अगर इस राशि को 1.85 लाख करोड़ रुपये की राजस्व कमी के साथ जोड़ा जाए तो सरकार पर कुल 2.56 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ता। यह जीडीपी के 1.25 फीसदी के बराबर है। 
 
अगर सरकार ने अपने खर्चों पर लगाम नहीं लगाई होती तो उसका राजकोषीय घाटा 2019-20 में जीडीपी का 4.65 फीसदी पहुंच गया होता। बजट अनुमान में 2019-20 के लिए 3.3 फीसदी राजकोषीय घाटे का लक्ष्य रखा गया था। चूंकि अर्थव्यवस्था में भारी सुस्ती का दौर था, इसलिए राजकोषीय घाटा पहले ही 3.4 फीसदी पर पहुंच गया था। सरकार ने राजकोषीय जवाबदेही कानून के दायरे में बने रहने के लिए राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को 0.5 फीसदी अंक से अधिक नहीं फिसलने देने का फैसला किया। तो फिर उसने क्या किया?
 
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के आर्थिक पूंजी ढांचे पर गठित विमल जालान समिति की सिफारिशों को स्वीकार किए जाने के बाद बैंक को सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि मिलनी थी। इससे सरकार को काफी मदद मिलती। लेकिन सरकार को चालू वित्त वर्ष में आरबीआई से केवल 58,000 करोड़ रुपये ही मिले। ऐसा इसलिए है क्योंकि 2019-20 के बजट अनुमान में इस वित्त वर्ष के दौरान आरबीआई से 90,000 करोड़ रुपये मिलने का प्रावधान किया गया था। 2018-19 में अपने राजकोषीय घाटे को पाटने के लिए केंद्र ने आरबीआई से 28,000 करोड़ रुपये की अग्रिम राशि ली थी। यह राशि पिछले साल अंतरिम लाभांश के रूप में ली गई थी। इस तरह 58,000 करोड़ रुपये की शेष राशि मिलने से इस साल केंद्र की प्राप्तियों में बढ़ोतरी होती। 
 
लेकिन दूसरे सरकारी बैंकों और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों से मिलने वाले लाभांश में 22,000 करोड़ रुपये की कमी आई। इस तरह केंद्र को आरबीआई और अन्य सार्वजनिक इकाइयों से लाभांश और मुनाफे के रूप में केवल 36,000 करोड़ रुपये का शुद्ध अतिरिक्त लाभ मिला। अतिरिक्त लाभांश प्राप्ति से सरकार को अपना घाटा 2.56 लाख करोड़ रुपये से घटाकर 2.2 लाख करोड़ रुपये करने में मदद मिली। ब्याज भुगतान में कटौती से भी सरकार 35,300 करोड़ रुपये बचाने में सफल रही। साथ ही सरकार ने विभिन्न मदों में अपने खर्च में कटौती करके 48,000 करोड़ रुपये की बचत की। इसमें 20,630 करोड़ रुपये की बचत प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के लिए आवंटित राशि से हुई। सरकार इसे खर्च नहीं कर पाई। इस तरह सरकार का घाटा 1.37 लाख करोड़ रुपये रह गया। 
 
इसके बाद सरकार ने बजट के इतर उधारी का रास्ता अपनाया। खाद्य सब्सिडी का बिल 1.84 लाख करोड़ रुपये से घटाकर 1.08 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया। इस तरह सरकार को करीब 75,500 करोड़ रुपये की बचत हुई। इससे घाटा केवल 62,000 करोड़ रुपये रह गया जो राजकोषीय घाटे के बजट लक्ष्य से 0.5 फीसदी अंक अधिक के सुरक्षित दायरे में है। लेकिन खाद्य सब्सिडी में कमी असल में कटौती नहीं थी। 75,500 करोड़ रुपये के बोझ की भरपाई राष्ट्रीय लघु बचत कोष (एनएसएसएफ) से ऋण के जरिये की गई। सरकार ने एनएसएसएफ से 1.1 लाख करोड़ रुपये की राशि उधार ली। इसमें से 75,500 करोड़ रुपये चालू वर्ष की खाद्य सब्सिडी के लिए थे और बाकी 34,500 करोड़ रुपये का इस्तेमाल पिछले साल के खाद्य सब्सिडी बिलों के निपटान में किया गया। इससे भारतीय खाद्य निगम का बकाया कम किया जाना चाहिए था। 
 
हालांकि इससे ज्यादा चिंता की बात यह है कि सरकार ने 2020-21 में भी एनएसएसएफ से 1.36 लाख करोड़ रुपये उधार लेने की योजना बनाई है। इस राशि का इस्तेमाल भी खाद्य सब्सिडी बिल के भुगतान में होगा। आश्चर्यजनक बात है कि अगले वित्त वर्ष के लिए सरकार का खाद्य सब्सिडी बिल केवल 1.15 लाख करोड़ रुपये है और इससे कहीं अधिक राशि वह एनएसएसएफ से उधार ले रही है। सरकार के 2019-20 के आंकड़ों के मुताबिक वह राजकोषीय घाटे को जीडीपी का 3.8 फीसदी पर रखने में सफल रही है लेकिन यह बात याद रखी जानी चाहिए कि ये सभी संशोधित अनुमान हैं। याद करिए कि 2018-19 में राजस्व और खर्च के संशोधित अनुमानों का क्या हुआ? इन्हें फरवरी 2019 में पेश किया गया और जून में यह साफ हो पाया कि अस्थायी वास्तविक आंकड़े संशोधित अनुमानों से बहुत अलग थे। इससे सरकार के लिए नई बजट चुनौतियां पैदा हो गई थीं। उम्मीद है कि जून 2020 में इसकी पुनरावृत्ति नहीं होगी। 
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