बिजनेस स्टैंडर्ड - सरकार ने गंवाया सुधार का अवसर
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सरकार ने गंवाया सुधार का अवसर

आकाश प्रकाश /  February 03, 2020

सरकार के पास अवसर था कि वह आर्थिक सुधारों को अपनाती। परंतु सरकार ने वह अवसर गंवा दिया है। इस विषय पर विस्तार से प्रकाश डाल रहे हैं आकाश प्रकाश 

 
यदि यह कोई सामान्य वर्ष होता तो वित्त मंत्री द्वारा प्रस्तुत बजट को बाजार बिना किसी खास हलचल के स्वीकार कर लेते। थोड़ी खुशी, थोड़ी नाखुशी के साथ कुल मिलाकर व्यापक तौर पर इसे स्वीकार कर लिया जाता। बहरहाल कुछ बड़े सुधार की आशा में बाजार बजट से निराश हुआ। बजट में कोई बड़ा नया विचार नजर नहीं आया। इस सरकार ने अब तक आर्थिक दृष्टिकोण को लेकर कोई समझ या योजना नहीं दिखाई है। क्या उन्हें अर्थव्यवस्था में आई मंदी के कारणों की समझ है और क्या उन्हें पता है कि उसे पटरी पर लाने के लिए क्या किया जाना चाहिए? जमीन पर कारोबारी सुगमता में सुधार कैसे हो? बजट में ऐसा क्या है जो अर्थव्यवस्था को दोबारा मजबूत बनाने में मदद करेगा? बजट में उन क्षेत्रों के बारे में कुछ नहीं कहा गया है जो गहरे संकट में हैं। कबाड़ वाहनों के लिए कोई योजना नहीं, निर्यात के लिए कुछ नहीं, गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) और अचल संपत्ति क्षेत्र की मदद के लिए मौजूदा योजनाओं का थोड़ा बहुत विस्तार किया गया है। ये योजनाएं अब तक कारगर नहीं रहीं तो अब क्यों होंगी? 
 
बैंकों को ऋण देने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया या फिर आवास क्षेत्र में अनबिके पड़े मकानों की बिक्री को प्रोत्साहित करने के लिए कुछ नहीं किया गया। दूरसंचार क्षेत्र में मची अफरातफरी का कोई जिक्र नहीं, बिजली वितरण क्षेत्र की दिक्कतों को दूर करने के लिए न कोई निस्तारण योजना और न ही कोई कदम। जीएसटी को सरल बनाने, सुसंगत बनाने और दरों को कम करने के बारे में भी कुछ नहीं कहा गया। मुझे पता है कि यह जीएसटी परिषद का मसला है लेकिन वित्त मंत्री कम से कम यह स्वीकार कर सकती थीं कि असंगठित क्षेत्र को इससे क्या परेशानियां हो रही हैं और क्रियान्वयन के स्तर पर किस तरह की कठिनाइयां सामने आ रही हैं। क्या बजट के बाद कारोबारी जगत के भरोसे में सुधार होगा? क्या इस बजट के पेश होने के बाद नया पूंजी निवेश देखने को मिलेगा?
 
बजट में कुछ अच्छे कदम भी उठाए गए हैं। वित्त मंत्री व्यक्तिगत आय कर के मामले में कर दरों को कम करने और सहज करने का कदम ही उठा सकती थीं। इससे खपत को 40,000 करोड़ रुपये का प्रोत्साहन मिलेगा। उन्होंने स्टार्टअप के कराधान और शुरुआती नुकसान के मसले का आंशिक रूप से निराकरण किया। एलआईसी की सूचीबद्धता का निर्णय अहम है क्योंकि सूचीबद्ध निजी समकक्ष कंपनियों की तुलना में यह सबसे अधिक मूल्यवान कंपनी है। बॉन्ड बाजार में और खुलापन लाया गया और कॉर्पोरेट बॉन्ड की सीमा को 15 प्रतिशत बढ़ाया गया। कुछ सरकारी प्रपत्रों को अनिवासी पूंजी के लिए पूरी तरह खोल दिया गया। ऋण के लिए किए जाने वाले ब्याज भुगतान पर 5 फीसदी के विदहोल्डिंग टैक्स पर 5 फीसदी की रियायत के विस्तार से सन 2023 तक के लिए कुछ निश्चितता आई है। कंपनी अधिनियम तथा अन्य कानूनों में दीवानी अपराधों का अपराधीकरण समाप्त करना एक बड़ा सकारात्मक कदम है। प्रत्यक्ष कर के लिए विवाद निस्तारण व्यवस्था पर भी यही बात लागू होती है। नए कर चार्टर के बारे में भी यही कहा जा सकता है। एस्टेट ड्यूटी या संपत्ति कर के मामले में कोई हलचल नहीं हुई, यदि ऐसा होता तो कारोबारी जगत का उत्साह पूरी तरह समाप्त हो जाता।
 
राजकोषीय घाटा अधिकांश निवेशकों की आशा के मुताबिक 3.8 फीसदी रहा बजाय कि 3.5 फीसदी के। बजट का गणित तार्किक है। सकल कर राजस्व में 12 फीसदी का इजाफा होने का अनुमान है। यह पूरी तरह अतार्किक नहीं है क्योंकि यदि 10 फीसदी की नॉमिनल जीडीपी वृद्धि होती है तो यह हासिल हो सकता है। हालांकि 40,000 करोड़ रुपये की कर कटौती के बाद आयकर में 14 फीसदी की वृद्धि पर सवाल है। असल सवाल यह है कि रुपये में 210,000 करोड़ रुपये के विनिवेश की अपेक्षा की गई है। जाहिर सी बात है कि 2021 में बीपीसीएल, कॉनकॉर और एयर इंडिया के विनिवेश के अलावा एलआईसी की सूचीबद्धता को शामिल किया गया है। यद्यपि जरूरी नहीं कि एक वर्ष के भीतर एलआईसी सूचीबद्धता के लिए तैयार हो। खुलासे का स्तर और तैयारी अवश्य विचारणीय है। यहां किसी भी तरह की देरी बजट के गणित पर असर डालेगी। सरकार ने वित्त वर्ष 2021 में दूरसंचार प्राप्तियों के लिए 1,33,000 करोड़ रुपये का लक्ष्य तय किया है। सरकार ने स्पेक्ट्रम के लंबित भुगतान के लिए दो वर्ष का अवधि विस्तार दिया है। आंकड़ों के अनुसार बजट में 5जी स्पेक्ट्रम भुगतान और एजीआर बकाये से 110,000 करोड़ रुपये हासिल हो सकते हैं जिसकी संभावना कम नजर आती है।
 
व्यय की बात करें तो सब्सिडी खासकर खाद्य और उर्वरक सब्सिडी के लिए फंड कम नजर आ रहा है। रक्षा आवंटन में भी कोई खास इजाफा नहीं किया गया है। विशुद्ध बाजार उधारी 15 फीसदी बढ़कर करीब 550,000 करोड़ रुपये होने की बात कही गई है और यह बॉन्ड बाजार पर दबाव डालेगी। विदेशी भागीदारी में इजाफा करने का कदम इसी वजह से है। निवेशक लंबी अवधि के पूंजीगत लाभ कर को नहीं हटाए जाने से नाखुश थे। इस कदम से निवेशकों के रुझान में सुधार होता और लंबी अवधि की पूंजी कम लागत पर मिलती। इसके बजाय सरकार ने लाभांश वितरण कर को हटाया। इससे नकदी संपन्न लोगों को मदद मिलेगी और उच्च मुनाफे वाली कंपनियों को भी जिन्हें वैसे भी मदद की आवश्यकता नहीं होती। बाजार में बड़े निवेशकों पर कर का बोझ बढ़ेगा क्योंकि लाभांश का अधिकांश हिस्सा उनके पास जाएगा। उन निवेशकों के लिए शेयर अब पहले की तरह सबसे आकर्षक निवेश क्षेत्र नहीं रह गए। क्योंकि अब सभी लाभ और लाभांश पर कर के कारण ऐसा नहीं रह गया। 
 
सरकार के लिए यह अवसर था कि वह अपने दूसरे कार्यकाल में सुधारों की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ती। अर्थव्यवस्था की स्थिति कमजोर है। सरकार के पास बहुमत है, वह उद्योग जगत की बात सुनती हुई भी प्रतीत हो रही है। हालांकि यह भी सही है कि सरकार ने अब तक बहुत साहसी कदम नहीं उठाए हैं। अर्थव्यवस्था में सुधार आएगा क्योंकि मौजूदा मंदी की प्रकृति चक्रीय है। दुर्भाग्य की बात है कि हमारे नीति निर्माता इस कमजोरी का लाभ अगली पीढ़ी के सुधारों को बढ़ावा देने में नहीं कर रहे हैं। हम आर्थिक कमजोरी के रूप में मिले इस अवसर को गंवा रहे हैं। हम उन क्षेत्रों और कंपनियों की मदद करते हुए दिख रहे हैं जिन्हें दरअसल इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। इस दौरान हम अर्थव्यवस्था के कमजोर क्षेत्रों की लगातार अनदेखी कर रहे हैं। कुल मिलाकर निवेशक इससे निराश होंगे। 
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