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संरक्षणवादी रुख

संपादकीय /  February 03, 2020

वर्ष 2020-21 का आम बजट ऐसे वक्त पर पेश किया गया जब देश में मांग कमजोर है और निर्यात वृद्घि कई महीनों से नकारात्मक बनी हुई है। ऐसे में खेद की बात है कि बजट में उल्लिखित व्यापार और औद्योगिक नीति असंगत नजर आई। कुछ मायनों में सुर्खियां ही पूरी दास्तान कह रही हैं: इस बजट ने भी शुल्क दरें बढ़ाने के पिछले कुछ वर्षों के सिलसिले को जारी रखा है। इस कदम तथा आयात प्रतिस्थापन और संरक्षणवाद को लेकर स्पष्टीकरण दिए जाने लगे हैं। बजट का स्वर कारोबार समर्थक नहीं है। कहा गया कि रोजगार निर्माण की राह में सस्ते और खराब गुणवत्ता वाले आयात बाधा बन रहे हैं। इससे भी बुरा यह कि इस वर्ष सितंबर तक सीमा शुल्क संबंधी तमाम रियायतों की समीक्षा करने का वादा भी किया गया। वित्त मंत्री ने कहा कि इस समीक्षा में आम जनता का नजरिया शामिल किया जाएगा। निश्चित तौर पर इस तरह के सुझाव मुख्य तौर पर उन कारोबारी समूहों से आते हैं जिनको संरक्षणवाद से लाभ होता है। उपभोक्ताओं की हिमायत करने वालों की बात पर इतनी तवज्जो नहीं दी जाएगी। यदि प्रकिया ही गलत होगी तो नतीजे बेहतर कैसे होंगे। 

 
वित्त मंत्री ने अपने मंत्रालय की आर्थिक समीक्षा से अलग हटकर देश के मुक्त व्यापार समझौतों के प्रदर्शन की आलोचना की। बजट भाषण में कहा गया कि मुक्त व्यापार समझौतों के तहत आयात में इजाफा हो रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि मुक्त व्यापार समझौतों के अधीन लाभ के गैर वाजिब दावे किए गए जो घरेलू उद्योग के लिए खतरा हो सकता है। उन्होंने वादा किया कि कड़ी जांच की व्यवस्था की जाएगी। इससे संकेत मिलता है कि देश में कारोबार को सुगम बनाने के बजाय आयात तो लालफीताशाही की जटिलताओं में उलझा दिया जाएगा। देश की अफसरशाही इसमें काफी सहज है। यह समझना मुश्किल है कि बजट का यह हिस्सा इससे पहले वाले हिस्से से कैसे तालमेल बिठाएगा जिसमें कहा गया है कि भारत को 'नेटवक्र्ड उत्पादों' को जोडऩे का केंद्र बनना होगा। खासतौर पर उन उत्पादों का जो वैश्विक मूल्य शृंखला से उभरते हैं। वर्ष 2020 की आर्थिक समीक्षा की थीम यही थी और बजट भाषण में इसका उल्लेख हुआ। लेकिन बजट के वास्तविक प्रावधानों का प्रभाव इसके विपरीत होता है। सरकार की विसंगतियों का संबंध 'एक जिला, एक उत्पाद' की धारणा से भी है जिसके बारे में बजट में दावा किया गया कि इससे निर्यात बढ़ेगा। 
 
संरक्षणवाद, हस्तक्षेप और आयात प्रतिस्थापन को देश में सामान्य बनने देने की आवश्यकता नहीं है। यह प्रतिगामी आर्थिक विचार है और इसे नकारा जाना चाहिए क्योंकि यह देश के उपभोक्ताओं और उत्पादकों दोनों को नुकसान पहुंचाता है। संरक्षण से लागत बढ़ती है और घरेलू उद्योग गैर प्रतिस्पर्धी हो जाते हैं। यदि चिंता केवल सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्यमों का बचाव करना है तो अगला तार्किक कदम यकीनन छोटे पैमाने पर आरक्षण और लाइसेंस की वापसी का होगा। इस सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में इससे दूरी बनाए रखी थी। खासतौर पर घरेलू मांग में कमी को देखते हुए। भारत मांग में तभी नई जान फूंक सकता है जब वैश्विक व्यापार में उसकी हिस्सेदारी बढ़े। यह एकतरफा रास्ता नहीं है। इसके लिए स्पष्ट और अनुमानयोग्य शुल्क दरों के साथ लॉजिस्टिक्स में निवेश करने और विनियमन की आवश्यकता है। सरकार ने बाद की दो बातों पर ध्यान केंद्रित किया है लेकिन शुल्क दरों और खुलेपन के मामले में उसके कदम प्रतिगामी हैं। सन 1990 के दशक तक का देश का आर्थिक इतिहास बताता है कि शुल्क दरें बढ़ाने से रोजगार सृजन होने और उत्पादकता बढऩे का विचार खतरनाक है। यह पहले भी कारगर नहीं रहा और अब भी नहीं होगा। 
Keyword: budget, nirmala sitaraman, economy, export,,
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