बिजनेस स्टैंडर्ड - महामारी से निपटने की कैसी तैयारी?
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महामारी से निपटने की कैसी तैयारी?

वीर अर्जुन सिंह /  02 02, 2020

वायरस का प्रकोप

कोरोनावायरस की महामारी फैलने के बाद उन जानलेवा वायरस की कई किस्मों पर भी चर्चा होने लगी है जो वायुजनित हैं और जिनसे भी महामारी फैलने की आशंका है। बता रहे हैं वीर अर्जुन सिंह 

2019-एनकोव मर्स और सार्स जैसी महामारी से ही जुड़ा हुआ वायरस है जिसका प्रसार इन दोनों के मुकाबले ज्यादा तेजी से हुआ
अब तक इस वायरस के संक्रमण से 305 लोग मरे हैं और चीन समेत 18 देशों में करीब 14,500 से अधिक संक्रमण के मामले की पुष्टि हुई है
डब्ल्यूएचओ ने आपात स्थिति की घोषणा की है

बिजनेस स्टैंडर्ड महामारी से निपटने की कैसी तैयारी?इस वक्त देश में जोर-शोर से  सतर्कता बरती जा रही है। सुरक्षात्मक सूट पहले सुरक्षा अधिकारी चेहरे पर मास्क लगाए और कुछ उपकरण लिए हुए देश के प्रमुख हवाईअड्ड पर सुरक्षा की पहली कतार में नजर आते हैं। उनके पास थर्मल गन होते हैं और वे यात्रियों की जांच के लिए इन्फ्रारेड थर्मोमीटर का इस्तेमाल करते हैं जिसमें शारीरिक संपर्क नहीं होता। अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे चीन से आने वाले उन लोगों की पहचान करें जिनके शरीर का तापमान 100.4 डिग्री फारेनहाइट से ज्यादा है और उन्हें अलग रखें। आमतौर पर कोरोनावायरस के संक्रमण में खांसी, बदन दर्द, सांस लेने में परेशानी जैसे लक्षण हैं। 

देश के 21 बड़े हवाईअड्ड पर 40,000 से ज्यादा लोगों की जांच की गई हैं और इसके अलावा 200 लोगों की व्यापक जांच की गई और केरल की एक छात्रा को कोरोनावायरस से संक्रमित पाया गया। इस वायरस के संक्रमण से 18 देशों में 14,500 से ज्यादा लोग संक्रमित हैं और 305 से अधिक लोगों की मौत हो गई। मरने वाले ज्यादातर लोग चीन के वुहान से थे जहां संक्रमण फैला। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इसे '2019-एनकोव सांस संबंधी गंभीर बीमारी' कहा है और इसे अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य नियमन आपात समिति की दूसरी बैठक में अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया गया। नए तरह का कोरोनावायरस या एनकोव की वजह से श्वसन से जुड़ी ऊपरी हिस्से में संक्रमण फैलता है। हालांकि इसके स्रोत और विषाणु के खतरनाक होने की बात भ्रामक है। 

डब्ल्यूएचओ के मुताबिक मर्स-कोव (मिडिल ईस्ट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम कोरोनावायरस) की वजह से 854 लोगों की मौत हुई और सार्स कोव (सिवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम कोरोनावायरस) की वजह से 774 लोगों की मौत हो गई। हालांकि इनसे एक बात यह समझ आई कि 2019-एनकोव का स्रोत काफी अनिश्चित है और इसका निश्चित इलाज कभी संभव नहीं होगा और न ही इसके निरोधक टीके तैयार हो पाएंगे। ज्यादातर दवाई कंपनियों ने सार्स और मर्स का संक्रमण खत्म होने के बाद टीके तैयार की प्रक्रिया रोक दी। 

बिजनेस स्टैंडर्ड महामारी से निपटने की कैसी तैयारी?हालांकि पूरी प्राथमिकता वायरस के संक्रमण को रोकने की है। चिंता की बात यह है कि वुहान में दिसंबर के मध्य में पहली बार वायरस का संक्रमण फैला और 2012 में मर्स के फैलने के दौरान कुल 2,494 मामलों की पुष्टि के मुकाबले ज्यादा मामले सामने आए हैं। वहीं 17 महीने की अवधि तक सार्स महामारी वर्ष 2002 से 2003 के बीच फैली और डब्ल्यूएचओ के मुताबिक 8,098 मामले की पुष्टि हुई। हालांकि यह ज्यादा संक्रामक है लेकिन इसकी एक ही सकारात्मक बात है कि 2019-एनकोव थोड़ी कम जानलेवा है। कोरोनावायरस के संक्रमण से मरने वालों का अनुपात सार्स के 9.5 फीसदी और मर्स के 37 फीसदी के मुकाबले महज 2 फीसदी है। हालांकि दूसरी महामारियों के मुकाबले 2019-एनकोव अपना रूप परिवर्तित करके ज्यादा घातक हो सकता है।

मुंबई में मुलुंड कल्याण में मौजूद फोर्टिस हॉस्पिटल में संक्रामक बीमारियों के विशेषज्ञ और एचआईवी के डॉक्टर कीर्ति सबनवीस का कहना है, 'इस बीमारी में बुखार होता है और इसमें मौत स्वाइन फ्लू की तरह होती है जो एन्फ्लूएंजा का एक प्रकार होता है।' वर्ष 2015 में स्वाइन फ्लू के प्रकोप से भारत में करीब 200 से अधिक लोगों की मौत हुई थी। इस वक्त देश भर के अस्पतालों को सरकार ने निर्देश दिया है कि जिन मरीजों में एन्फ्लूएंजा जैसे लक्षण दिखें उन्हें अलग रखा जाए। 

सबनवीस कहते हैं, 'इस बीमारी के संदिग्ध मरीजों को नकारात्मक दबाव वाले कमरे में रखा जाता है जिसमें हवा अंदर आने की इंतजाम तो होता है लेकिन यह हवा बाहर नहीं निकलती।' अस्पताल ऐसे मरीजों को उन कमरे में भी रख सकते हैं जिनकी अलग वातानुकूलित नली होती है। गुरुग्राम के मैक्स अस्पताल में मेडिकल निदेशक और आंतरिक दवा विभाग के प्रमुख और वरिष्ठ निदेशक राजीव डांग कहते हैं, 'अस्पताल में दो बिस्तरों के बीच में कम से कम एक मीटर की न्यूनतम दूरी होनी चाहिए।' इसमें कोई संदेह नहीं है कि जिस तेजी से कोरोनावायरस की महामारी चीन में फैली है उससे देश के स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे पर भी गंभीर रूप से दबाव बढ़ सकता है। चीन की तरह ही भारत में भी इस महामारी के फैलने का बड़ा खतरा मंडरा रहा है क्योंकि यहां आबादी का घनत्व ज्यादा है।

हालांकि अब तक दुनिया में कोरोनावायरस से तेजी से फैल रही महामारी पर नियंत्रण करना मुश्किल लग रहा है। डांग कहते हैं, 'संक्रमित व्यक्ति में इस महामारी के कोई लक्षण नहीं भी दिखे तब भी वे संक्रमण फैला सकते हैं।' बुधवार को वुहान में 10 साल के एक लड़के को संक्रमण जांच में पॉजिटिव पाया गया हालांकि वह काफी सेहतमंद दिख रहा था। ऐसा लगता है कि कोरोनावायरस का संक्रमण आदमी से आदमी के संपर्क और किसी संक्रमित व्यक्ति के छींक या खांसी की वजह से भी से फैल रहा है।

शोधकर्ताओं का अनुमान है कि संक्रमण किसी व्यक्ति में करीब 14 दिनों तक रह सकता है। लेकिन देश के स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्वास्थ्य अधिकारियों को यह निर्देश दिया है कि जो लोग पिछले दो हफ्ते से वुहान में रहे हैं वैसे संदिग्ध मामले वाले व्यक्ति को करीब 28 दिनों तक के लिए अलग रखा जाए। लेकिन अगर 2019-एनकोव का प्रसार तेजी से जारी रहा तब इलाज के क्लीनिकल डेटा के अभाव में डॉक्टरों के पास लक्षण के आधार पर इलाज करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा। सबनीस कहते हैं, 'मरीजों को सांस लेने में तकलीफ हो सकती है या फिर उन्हें ज्यादा बुखार हो सकता है। ऐसे में उनका इलाज उसी के अनुसार होगा। लेकिन फिलहाल इस वायरस को नियंत्रित करने के लिए कुछ भी नहीं है।'बिजनेस स्टैंडर्ड महामारी से निपटने की कैसी तैयारी?

वायरस उत्परिवर्तन बेहद लाजिमी है। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि ऐसी नई महामारी में किंतु-परंतु की कोई गुंजाइश नहीं है। यह संस्था दुनिया भर में मौसमी फ्लू के संक्रमण की निगरानी करने के साथ ही क्लिनिकल डेटा का विश्लेषण करती है और हर साल इन संक्रमणों से निजात पाने के लिए सिफारिशें प्रकाशित कराती है। वैश्विक स्तर पर एक साल में 250,000 और 650,000 लोग एन्फ्लूएंजा से मरते हैं। 

डब्ल्यूएचओ ने अनुमान लगाया है कि साल में दो बार फ्लू के संक्रमण की आशंका होती है जो शीतकाल के दौरान उत्तरी और दक्षिणी गोलाद्र्ध में सक्रिय होता है। संस्था ने दवा कंपनियों से सिफारिश की है कि वे नई फ्लू वैक्सिन बनाएं। इसमें कहा गया है कि टीकाकरण के प्रभावी होने में दो हफ्ते लगते हैं। भारत में हर सितंबर में छह महीने से बड़े बच्चे और सभी वयस्कों में एक बार टीके लगाने की सिफारिश की जाती है। हालांकि कई मामले में इस सालाना टीके के खिलाफ ही बातें उभर कर आती हैं भले ही विकसित देशों के स्वास्थ्य विभाग इसकी सिफारिश करते हों।

रोम में रहने वाले ब्रिटेन के मशहूर महामारी विशेषज्ञ टॉम जेफरसन गैर-लाभकारी संस्था कोच्रेन कोलैबोरेशन के साथ काम करते हैं और उन्होंने क्लिनिकल ट्रायल के आधार पर फ्लू के टीके के असरदार होने की व्यापक समीक्षा की है। उन्होंने हाल ही में एंटी-वायरल टामिफ्लू तैयार करने वाली कंपनी रोशे पर मुकदमा दर्ज किया है जिसने यह दावा किया कि इससे फ्लू की महामारी कम हो सकती है। भारत में स्वाइन फ्लू के प्रसार के दौरान व्यापक तौर पर टामिफ्लू का इस्तेमाल किया गया था। दिल्ली के आंख-नाक कान विशेषज्ञ ने नाम न बताने की शर्त पर बताया, 'हम फ्लू के टीके की सिफारिश केवल 65 साल के अधिक उम्र के लोगों के लिए करते हैं जो ज्यादा असुरक्षित होते हैं और गंभीर बीमारियों की वजह से उनकी प्रतिरोधक क्षमता ज्यादा होती है।'

उनका कहना है, 'वैसे यह पूरी तरह से पैसे की बर्बादी है। यह किसी और पर असरदार नहीं होता।' कई डॉक्टर तो विशेषतौर पर बच्चों को फ्लू का टीका नहीं लेने की सलाह देते हैं। गुरुग्राम में मेदांता मेडिसिटी में इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिटिकल केयर ऐंड एनेस्थेसियोलॉजी के अध्यक्ष यतिन मेहता कहते हैं कि फ्टू का टीका भले ही सबसे बेहतर न हो लेकिन इससे हर साल कई लोगों की जिंदगी बचती है। वह कहते हैं, 'मैंने खुद भी यह टीका लिया है। मेरी नर्सिंग स्टाफ और मेरे बच्चों ने भी यह टीका लिया है। इससे किसी खास वायरस के प्रभाव को लडऩे की प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है और इसका कोई बड़ा साइड इफेक्ट भी नहीं होता।' वह कहते हैं कि इसे न लेने की कोई वजह नहीं है। मैक्स और फोर्टिस के विशेषज्ञ भी मेहता की बातों से इत्तेफाक रखते हैं। डब्ल्यूएचओ का अनुमान है कि फ्लू टीके से एन्फ्लूएंजा ए और बी (एच1एन1 वायरस सहित) का प्रतिरोध करने में मदद मिलती है और यह 2018-19 में 40-60 फीसदी तक प्रभावी था। 

शोधकर्ताओं का कहना है कि 2019-एनकोव के लिए टीका तैयार करने के लिए एक अलग पैमाने का अनुसरण करना होगा जो सार्स और मर्स महामारी को नियंत्रित करने के तरीके से अलग होगा। यह जेनेरिक फ्लू टीके से ज्यादा प्रभावी होगा और यह मानव परीक्षण पूरा करने से पहले कम से कम एक साल का वक्त लेगा। 1918 की एन्फ्लूएंजा महामारी में करीब 5-10 करोड़ लोग मारे गए थे और उस वक्त दुनिया की एक-तिहाई आबादी संक्रमित हो गई थी। हालांकि इस घटना के 100 साल के बाद बीद ऐसा लगता है कि महामारी को रोकने के लिए वायरस के संक्रमण को रोकना ही एकमात्र प्रभावी तरीका है। 
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