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दूध की गुत्थी: पर्याप्त आपूर्ति के बावजूद कीमतों में तेजी

संजीव मुखर्जी और अर्णव दत्ता / नई दिल्ली February 02, 2020

हर सुबह 45 साल की सविता देवी दूध का एक पैकेट लेने के लिए पास की किराने की दुकान में जाती हैं। वह कई वर्षों से ऐसा कर रही हैं। अब वह निश्चित नहीं हैं कि आगे दूध खरीद पाएंगी या नहीं। पिछले कुछ दिनों से उस दूध के पैकेट की कीमत बढ़ गई है जो वह खरीदती हैं। देश के अधिकांश लोकप्रिय दुग्ध ब्रांडों ने दूध की कीमत प्रति लीटर 3 रुपये बढ़ा दी है। दूध की कीमत में यह बढ़ोतरी असामान्य है क्योंकि यह ऐसे सीजन के बीच में हुई है जब दूध की पर्याप्त आपूर्ति है। पिछले कुछ महीनों में दुग्ध खरीद की कीमत 20 फीसदी से बढ़कर 35 फीसदी पर पहुंच गई। उद्योग के विशेषज्ञों का कहना है कि दूध के साथ-साथ चीनी और गेहूं की कीमतों में बढ़ोतरी से एफएमसीजी बाजार में कीमतें प्रभावित हो सकती हैं। 
 
बेशक, दूध की कीमत में बढ़ोतरी देशभर के  लाखों दुग्ध आपूर्तिकर्ताओं के लिए वरदान साबित हुई है। इससे पहले तीन साल तक कीमतें कम रही थीं लेकिन यह रुझान अब बदल रहा है और इससे देश के ग्रामीण क्षेत्र की तस्वीर बदल सकती है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि उपभोक्ता से जो कीमत वसूली जा रही है उसमें से किसान को कितना मिलता है। जहां तक दूध का सवाल है तो पर्याप्त आपूर्ति के सीजन में देरी के साथ-साथ दुग्ध उत्पादन में कमी की आशंका से कीमतों में तेजी आई है।
 
तिरुमला मिल्क प्रॉडक्ट्स, अनिक इंडस्ट्रीज और बीएसई में सूचीबद्ध महाराष्ट्र की प्रभात डेरी ऑफ इंडिया का मालिकाना हक रखने वाली फ्रांस की दिग्गज कंपनी लेक्टेलिस इंडिया के प्रबंध निदेशक राहुल कुमार ने कहा,  'हमारे अनुमानों और मौजूदा आवक के मुताबिक देश का दुग्ध उत्पादन 2019-20 में पिछले साल के मुकाबले 8 से 9 फीसदी कम रह सकता है। वित्त वर्ष 2018-19 में यह 18.6 करोड़ टन रहा था।' अप्रैल-मई से अगस्त तक के कम आपूर्ति के सीजन में दूध की मांग को पूरा करने के लिए देश को 150,000 टन स्किम्ड दुग्ध पाउडर (एसएमपी) के भंडार की जरूरत होती है। लेकिन अभी देश का एसएमपी भंडार केवल 30,000-40,000 टन ही रह गया है। खुले बाजार में एसएमपी की कीमत में पिछले एक साल के दौरान दोगुनी से भी ज्यादा की बढ़ोतरी गई है और यह 150-160 रुपये प्रति किलो से करीब 300 रुपये हो गई है। बाजार के विश्लेषकों का कहना है कि इस साल गर्मियों में कीमत और बढ़ सकती है।
 
कुमार का मानना है कि दुग्ध बाजार को इस स्थिति में नहीं पहुंचना चाहिए था क्योंकि कई दुग्ध कंपनियों का कहना है कि दूध की पर्याप्त आपूर्ति उन कारणों में एक है जिनकी वजह से भारत क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसेप) में शामिल नहीं हुआ। 2019 में देश से करीब 64,000 टन एसएमपी का निर्यात हुआ। महाराष्ट्र और गुजरात की सरकारों तथा केंद्र की 10 फीसदी प्रोत्साहन राशि से एसएमपी के निर्यात पर प्रति किलो 50 रुपये सब्सिडी दी गई। कुमार ने कहा, 'निर्यात से परहेज किया जाना चाहिए था और देश में दूध की उपलब्धता और आपूर्ति-मांग की स्थिति का अनुमान लगाने के लिए सरकार को उचित योजना बनानी चाहिए थी।' उन्होंने कहा कि सरकार अगले 6-8 हफ्तों में एकबारगी 80,000 से 90,000 टन एसएमपी का आयात करके आपूर्ति की कमी को पूरा कर सकती है। 
 
अलबत्ता, अमूल जैसी बड़ी कंपनियां एसएमपी के आयात के खिलाफ हैं। उनका मानना है कि आयात से खरीद कीमतें प्रभावित होंगी और आम दुग्ध किसान को नुकसान होगा। अमूल के प्रबंध निदेशक आरएस सोढ़ी ने कहा, 'देश में दूध की कोई कमी नहीं है और जो भी आयात की बात कर रहा है वह किसान विरोधी है।' उन्होंने कहा कि औने-पौने दाम में बिकवाली के कारण पिछले साल एसएमपी की कीमत कम थी और इसे स्वस्थ संकेत के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। सोढ़ी ने कहा, 'दूध का कमजोर सीजन अप्रैल से शुरू होता है और पर्याप्त आपूर्ति वाला सीजन अभी शुरू ही हुआ है। अगर अभी दूध का आयात किया जाता है तो इससे बिना बात के कीमतें प्रभावित होंगी। अगर फिर भी आयात की जरूरत है तो हमें अप्रैल तक इंतजार करना चाहिए।'  दुग्ध क्षेत्र इस धर्मसंकट में है कि कीमतों में कमी के लिए आयात किया जाए या नहीं लेकिन चीनी और गेहूं के मामले में ऐसा भ्रम नहीं है।
 
चीनी उद्योग के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक पिछले कुछ महीनों से चीनी की कीमत (एक्स-मिल) 31 रुपये से 34.5 रुपये प्रति किग्रा के बीच बनी हुई है जो पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले थोड़ा ज्यादा है। पिछले साल यह 29 रुपये से 30 रुपये के बीच थी। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में चीनी की कीमत में बहुत ज्यादा तेजी की संभावना नहीं है। इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) के महानिदेशक अविनाश वर्मा ने कहा, 'मुझे लगता है कि बाजार ने इस बात को अंगीकार कर लिया है कि 2019-20 में चीनी का उत्पादन करीब 2.6 करोड़ से 2.7 करोड़ टन रहेगा जो पिछले साल के चीनी सत्र से करीब 22 फीसदी कम है। आने वाले दिनों में पूरे देश में चीनी की एक्स-मिल कीमत 31 रुपये से 34.5 रुपये के बीच रहने की उम्मीद है।' भारत में चीनी का सत्र अक्टूबर से सितंबर तक चलता है। वर्मा ने इस बात से इनकार किया कि निर्यात में सब्सिडी देने से कीमत को पिछले साल के स्तर पर बनाए रखने में मदद मिली है। 
 
उन्होंने कहा, 'हमने 1.45 करोड़ टन के रिकॉर्ड भंडार के साथ 2019-20 के चीनी सत्र की शुरुआत की थी। अगर हम 60 लाख टन की आवंटित मात्रा का निर्यात करने में सफल रहे तब भी हमारे पास करीब 85 लाख टन का शेष भंडार रह जाएगा जो जरूरत का दोगुना है। इसलिए, कीमतों में किसी भी तेजी में निर्यात के योगदान का सवाल कहां है।' बाजार के विश्लेषकों का कहना है कि जैसे ही सरकार ज्यादा भंडार को बाजार में जारी करेगी या नई फसल बाजार में आएगी, इसकी कीमतों में कमी आएगी। गेहूं की कीमत का एफएमसीजी वस्तुओं की कीमतों पर असर पड़ता है। इस साल गेहूं की बंपर फसल होने की उम्मीद है। 
 
अनाज का कारोबार करने वाली एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'अभी दिल्ली की मंडियों में गेहूं की कीमत करीब 2,300 रुपये प्रति क्विंटल है जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 12-15 फीसदी अधिक है। हालांकि, इसकी मुख्य वजह यह है कि राज्यों का भंडार धीमी गति से उठ रहा है। मुझे नहीं लगता है कि कीमत इस स्तर पर बनी रहेगी क्योंकि आगे गेहूं की बंपर फसल होने का अनुमान है। इसके अलावा सरकार के भंडार भी भरे हुए हैं।' उन्होंने कहा कि गेहूं का इस्तेमाल करने वाले उद्योग को भी यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि हर समय कीमत समान स्तर पर बनी रहेगी। उन्होंने कहा, गेहूं का उत्पादन चार महीने होता है और सालभर खाया जाता है। इसलिए कीमतें हमेशा बराबर कैसे हो सकती है। दूध, चीनी और गेहूं के अलावा खाद्य तेलों की कीमत में भी तेजी आई है। उपभोक्ता सामान के निर्माण में इसका भी कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल होता है। 
Keyword: milk, farm, dairy, oil,,
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