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न्यायपालिका को मिला बजट आवंटन जरूरत से है कम

अदालती आईना
एम जे एंटनी /  February 02, 2020

किसी के लिए भी केंद्रीय बजट में खुशनुमा आश्चर्यों की उत्सुकता से राह देखना स्वाभाविक है। लेकिन यह अचरज की बात नहीं है कि दशकों से नजरअंदाज होती रही न्यायपालिका इस सालाना कवायद से उत्साहित होने वाले तबके में शामिल नहीं थी। देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों ने इस तिरस्कार पर खेद जताया है, एक तो सार्वजनिक तौर पर अपने आंसू पोंछते हुए नजर आए थे। उनकी शिकायत है कि न्यायिक क्षेत्र को बजट में आम तौर पर जीडीपी का 0.2 फीसदी ही मिलता है। लेकिन मौजूदा मुख्य न्यायाधीश एस ए बोबडे और उनके साथी न्यायाधीशों ने पिछले हफ्ते दिल्ली में इस उपेक्षा को लेकर कुछ नहीं बोला। न्यायपालिका के मुखिया की वित्त मंत्री से मुख्य मांग यही थी कि वह ज्यादा कर लगाने से परहेज करें क्योंकि इससे सामाजिक अन्याय पैदा होता है।

 
जहां अन्य क्षेत्रों की मांगें रखने के लिए लॉबी करने वाले हैं, वहीं न्यायपालिका राज्य की वह शाखा है जिसे खुद ही अपना पेट भरने के लिए छोड़ दिया गया है। यहां तक कि बार एसोसिएशन या बार काउंसिल ने भी अदालतों के ढांचे के लिए अधिक धन जारी करने की जरूरत के बारे में सोचने की भी जहमत नहीं उठाई। शायद इस क्षेत्र की मनहूस हालत कारोबार के लिए अच्छी मानी जाती है। अदालतों को उतनी तवज्जो भी नहीं मिलती है जितनी रेलवे को मिलती रही है। कुछ साल पहले तक रेलवे के लिए अलग बजट हुआ करता था। कानून लगातार बनते जा रहे हैं लेकिन इस पर गौर नहीं किया जाता है कि इनसे अदालतों पर बोझ कितना बढ़ जाता है?
 
मौजूदा केंद्रीय बजट में न्यायपालिका के लिए आवंटन बढ़ाकर 308.61 करोड़ रुपये कर दिया गया जबकि पिछले साल यह 296.55 करोड़ रुपये और उससे पहले के साल में 258.53 करोड़ रुपये था। यह वृद्धि प्रशासकीय एवं अन्य खर्चों को ध्यान में रखते हुए की जाती है और इस आवंटित राशि का इस्तेमाल न्यायाधीशों एवं स्टाफ के लिए वेतन एवं यात्रा व्यय और सुरक्षा एवं उपकरण मुहैया कराने में भी किया जाता है। हालांकि इस अवधि में कई न्यायाधीशों की नियुक्ति और नई अदालतों का निर्माण होने से अदालतों पर व्यय कई गुना बढ़ गया। लेकिन यह जरूरत से अब भी काफी कम है। मसलन, भारत में अभी प्रति दस लाख आबादी पर छह न्यायाधीश हैं वहीं ऑस्ट्रेलिया में यह 41, कनाडा में 75, ब्रिटेन में 50 और अमेरिका में 107 है।
 
अदालतों एवं न्यायाधिकरणों को पेश होने वाली बड़ी समस्याओं में ढांचागत आधार की कमी है। पिछले साल से इन सुविधाओं के लिए आवंटन कम हुआ है। वर्ष 2019-20 में यह आवंटन 999 करोड़ रुपये था जबकि नए बजट में यह 762 करोड़ रुपये ही रखा गया है। वर्ष 2018-19 में यह आंकड़ा 656 करोड़ रुपये था। दूरदराज के इलाकों में ग्राम स्तर पर ही लोगों को न्याय प्रदान करने के लिए चिह्नित ग्राम न्यायालयों के साथ भी यही सिंड्रेला ट्रीटमेंट किया गया। इसके लिए अनुदान 2018-19 के आठ करोड़ रुपये के स्तर पर ही रहा। महिलाओं के खिलाफ अपराधों और भ्रष्ट नेताओं की सुनवाई करने वाली फास्ट-ट्रैक विशेष अदालतों का आवंटन भी मामूली बढ़त के साथ 140 करोड़ से 150 करोड़ रुपये ही रहा है। 
 
कानून मंत्रालय के लिए आवंटित राशि का इस्तेमाल चुनाव कराने, मतदाताओं को पहचान-पत्र मुहैया कराने और चुनाव आयोग को ईवीएम मशीनें मुहैया कराने में भी होता है। आयोग के अपने खाते में भी अलग राशि आवंटित की जाती है। कानून मंत्रालय का कुल बजट आवंटन 2,200 करोड़ रुपये है जिसे उन महत्त्वाकांक्षी योजनाओं पर खर्च किया जाना है जिनमें समय के साथ खास प्रगति नहीं हुई है। ई-कोर्ट के लिए महज 250 करोड़ रुपये रखे जाने से इसका वजूद में आ पाना अभी सपना ही है। इसके अलावा राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (11 करोड़), राष्ट्रीय विधि सेवाएं प्राधिकरण (100 करोड़) और नवगठित नई दिल्ली अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्र (तीन करोड़) की भी यही हालत है। समय के साथ विभिन्न क्षेत्रों में गठित न्यायाधिकरणों की संख्या और उनका प्रभाव भी बढ़ा है, जैसे कि एनसीएलटी। लेकिन इनके लिए आनुपातिक आवंटन नहीं किया गया है। मसलन, कर अधिकरणों को आवंटन गत वर्ष के 143.93 करोड़ रुपये से बढ़कर 172.90 करोड़ रुपये हो गया।
 
कई अदालती प्रतिष्ठान केंद्र एवं राज्य सरकारों के बीच तकरार में उलझे हुए हैं और हर कोई इनके राजकोषीय बोझ को दूसरे पर डालता रहता है। इसके लिए बना 60:40 फॉर्मूला भी असहमति का एक बिंदु है। अदालतों के लिए फंड विभिन्न स्रोतों से आता है और यह मुद्दा भी विवाद बढ़ाता है। यहां तक कि अदालती शुल्क, जुर्माने एवं जमाओं के तौर पर न्यायपालिका को मिलने वाली राशि भी सरकारें बजट में ले लेती हैं। राज्यों के बजट में भी यही प्रवृत्ति दिखाई देती है और इसका नतीजा चारों तरफ नजर आ रहा है।
 
यह सुविदित है कि न्यायिक व्यवस्था अदालतों में तीन करोड़ से अधिक और अकेले उच्चतम न्यायालय में ही 60,000 मामले लंबित होने के बोझ तले कराह रही है। अधीनस्थ न्यायालयों में तो अक्सर पानी एवं पंखे जैसी बुनियादी सुविधाएं भी मौजूद नहीं हैं। मसलन, देश के 665 जिला अदालतों में से केवल 266 में ही शौचालय चालू हालत में हैं और इनमें से 100 अदालतों में तो एक भी महिला शौचालय नहीं है। विभिन्न न्यायिक रिपोर्टों एवं अदालती फैसलों में भी इस बात को रेखांकित किया जाता रहा है। भीड़-भरी जेलों में दोषी ठहराए जा चुके अपराधियों की तुलना में विचाराधीन कैदियों की भरमार है। समस्याएं हैं कि खत्म होने का नाम नहीं ले रहीं।
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