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बेतुकी उम्मीद का बोझ और साधारण बजट

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  February 02, 2020

सन 2014 में बहुमत से सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी ने जो शुरुआती काम किए थे उनमें एक था रेलवे बजट की व्यवस्था समाप्त करना। कुछ समय तक कुछ लोगों ने शिकायत की। खासतौर पर बिहार, पश्चिम बंगाल के राजनेताओं और पूर्व रेल मंत्रियों, पुराने समाजवादियों ने। अब कोई रेल बजट को याद नहीं करता। समय बीतने के साथ भारतीयों की एक पीढ़ी ऐसी भी आएगी जिसे रेल बजट जैसी कोई बात याद नहीं होगी। अब नई ट्रेनों की घोषणाओं, कीमतों में चतुराईपूर्ण इजाफे या कटौती, विद्युतीकरण के दावों के लिए कोई एक दिन सुनिश्चित नहीं है। रेलवे का प्रबंधन अब नियमित क्रम में होता है। मीडिया के लिए अब कोई बड़ी खबर नहीं रहती।

 
सालाना आम बजट के लिए भी मोदी का यही सिद्धांत है। शनिवार को बजट पेश होते ही बाजार गिर गए क्योंकि मोदी सरकार के सातवें बजट में भी बड़े सुधारों की कोई घोषणा नहीं थी। यह निराशा उचित थी लेकिन ऐसी अपेक्षा उतनी ही अनुचित थी। मोदी सरकार के छह बजट में से किसी में भी ऐसा कुछ नहीं था जिससे लगे कि सरकार बड़े सुधार अपना सकती है। मोदी बजट को सामान्य बनाए रखना चाहते हैं। ज्यादा से ज्यादा बही खातों पर एक सालाना वक्तव्य की तरह जिसमें कुछ बातें, कुछ श्लोक और कुछ कविताओं का मिश्रण किया जाता है। यदि कोई बड़ी घोषणा हुई भी तो वह ऐसी जो कम से कम बाजार को पसंद नहीं आई होगी। यानी अमीरों को नुकसान पहुंचाना और गरीबों को संतुष्ट करना। 
 
इसके अलावा बजट कतई घटनाप्रधान नहीं रहता और एक दिन की सुर्खियों के बाद कोई उसके बारे में बात नहीं करता। जहां तक बड़े झटकों की बात है तो वे साल भर आते रहते हैं। जब भी प्रधानमंत्री की इच्छा होती है या उन्हें आवश्यकता महसूस होती है वे बड़ी घोषणा कर देते हैं। यह नोटबंदी या इसके साथ आई माफी योजना जैसी वास्तविक बड़ी घोषणा भी हो सकती है और कदम वापसी की घोषणा अथवा घोषणाएं भी। सन 2019 के त्रासद बजट के बाद जो कुछ हुआ, उससे पूरी बात को समझा जा सकता है। बजट के बाद गरीबों को प्रसन्न करने के लिए अमीरों से लेने की भावना इतनी प्रबल हो गई कि बाजार बिखर गए। करोड़पतियों और उद्योगपतियों के विदेशी पासपोर्ट धारण करने की घटनाओं में इजाफा देखने को मिला। संस्थागत विदेशी निवेशक नाराज हो गए और वित्त मंत्री को आए दिन बजट घोषणाओं को वापस लेना पड़ा।
 
गत वर्ष कॉर्पोरेट कर दर में की गई कटौती मोदी सरकार का सबसे अहम सुधार रहा और उसे आमतौर पर अमीरों को दी गई राहत के रूप में ही याद किया जाएगा। इसे बिना किसी चर्चा या बहस के घोषित कर दिया। बिल्कुल अन्य प्रशासनिक निर्णयों के तर्ज पर। जैसे एक और नई टे्रन के संचालन की घोषणा की जा रही हो। इस मामले में यह काफी हद तक अपनी गलती की स्वीकारोक्ति की तरह था। जैसे सन 2019 के गरीबोन्मुखी बजट ने बाजार के रुझान को ध्वस्त कर दिया था। परंतु कल्पना कीजिए यदि ऐसी कर कटौती आम बजट के केंद्र में होती तो विशेषज्ञों से भरे टेलीविजन स्टूडियो और विपक्ष ने किस तरह की प्रक्रिया दी होती।
 
मुक्त बाजार और इस लेखक समेत निजीकरण के तमाम समर्थक कहते रहे हैं कि दूसरी बार इतना बड़ा जनादेश पाने के बावजूद मोदी सरकार के बजट में कोई बड़ा विनिवेश देखने को नहीं मिला। परंतु क्या वास्तव में उन्हें ऐसे कदम उठाने की आवश्यकता है जिनसे आलोचना और बहस का सामना करना पड़े? क्योंकि वह तो किसी भी शाम जल्दबाजी में बुलाए एक संवाददाता सम्मेलन में भी ऐसी घोषणा कर सकते हैं। बीपीसीएल तथा अन्य मामलों में सरकार ने ऐसा ही किया। वह इस तथ्य को रेखांकित कर रहे हैं कि सरकार को ऐसे कदम उठाने के लिए बजट की आवश्यकता नहीं। बस शुक्रवार (वित्त मंत्री का पसंदीदा दिन) और बुधवार (कैबिनेट बैठक) पर नजर रखिए। मोदी को दिखावा पसंद है या नहीं इसमें किसी को क्या शक? शायद ही कोई उनसे अधिक इसे पसंद करता होगा। परंतु वह हमेशा यह भी चाहते हैं कि मामला उनके नियंत्रण में रहे। बड़ा बजट समस्या पैदा कर सकता है। इसलिए क्योंकि यदि यह गरीबों को खुश करता है तो प्राय: अमीर नाराज होते हैं। वहीं अगर यह बाजार के अनुकूल हुआ तो गरीब इसे पसंद नहीं करते। राहुल गांधी इसे सूट-बूट की सरकार करार देते हैं। जाहिर है मोदी को यह पसंद नहीं। 
 
राष्ट्रीय बजट को लेकर मोदी की सोच एकदम स्पष्ट है। लगातार छह बजट हमें आश्वस्त नहीं कर पाए और अब तो सातवां भी पेश किया जा चुका है। नरेंद्र मोदी ने बजट के खबर बनने के सिलसिले को पूरी तरह ठप कर दिया है। इसके प्रमाण आपको चारों तरफ बिखरे हुए दिख जाएंगे। यह बजट दिखाता है कि रक्षा आवंटन लगभग रुका हुआ है, हालांकि पेंशन का बोझ बढ़ता जा रहा है। फिलहाल इसकी आलोचना भी हो रही है। परंतु इसके साथ ही रक्षा मंत्रालय ने वित्त आयोग को पत्र लिखकर संसाधनों की कमी की शिकायत की है। वित्त आयोग अधिग्रहण फंड को आगे बढ़ाकर प्रयोग में लाने पर विचार कर रहा है। शायद किसी शाम संवाददाता सम्मेलन में हमें इसकी भी घोषणा सुनने को मिले। तब यह रक्षा बजट में इजाफे की तुलना में बहुत छोटी खबर होगी। चूंकि मामला रक्षा से जुड़ा है इसलिए कोई शिकायत करने का साहस भी नहीं करेगा। राजनीतिक अर्थव्यवस्था को लेकर मोदी का यही रवैया है। 
 
इस बजट में यदि कोई साहसिक बात है तो वह है निजीकरण में इजाफा करने, भारतीय जीवन बीमा निगम का आईपीओ लाने की बात। भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड, एयर इंडिया, कॉनकॉर, जहाजरानी निगम आदि के साथ सरकार निजीकरण की सोच पर पहले ही काफी काम कर चुकी है। यही कारण है कि एलआईसी के निजीकरण का जिक्र आया। परंतु यदि इसका अधिक विरोध हुआ, खासतौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और स्वदेशी अभियान चलाने वालों की ओर से तो इसे टाला भी जा सकता है। यदि ऐसा होता है तो ज्यादा चकित होने की जरूरत नहीं है। गत वर्ष सॉवरिन ऋण बॉन्ड के मामले में हमें ऐसा ही देखने को मिला था। 
 
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली मौजूदा भारतीय सरकार सबसे अधिक राजनीतिक, वैचारिक और सांख्यिकीय सरकार है। इंदिरा गांधी की सरकार से भी अधिक। इस सरकार का हर निर्णय या कदम मतदाताओं पर पडऩे वाले असर को देखकर लिया जाता है। सुधार के मोर्चे पर वह आर्थिक जोखिम नहीं उठाएंगे। बाजार प्रतिभागी, फंड प्रबंधक, मुद्रा से जुड़े लोग, सभी को इसकी आदत हो गई है। यदि आप अपने बाजार संबंधी निर्णयों को मतदाताओं पर पडऩे वाले प्रभाव के अनुसार आंकेंगे तो अतार्किक अनुमान उत्पन्न होंगे। इसे ताजा बजट से समझा जा सकता है। ऐसे में बड़ी तस्वीर के लिए पूरे वर्ष पर नजर रखने की आवश्यकता है, केवल 1 फरवरी को पेश किए जाने वाले आम बजट पर नहीं।
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