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मंजिल की ओर

संपादकीय /  February 02, 2020

वर्ष 2020-21 के आम बजट के जिन प्रस्तावों ने सबसे अधिक सुर्खियां बटोरीं उनमें से एक 15 लाख रुपये या उससे कम की सालाना व्यक्तिगत आय पर लगने वाले कर में बदलाव भी है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शनिवार के बजट भाषण में इन बदलावों का उल्लेख किया। 5 लाख रुपये और 15 लाख रुपये की आय के बीच कर दरों में अनिवार्य तौर पर कटौती की घोषणा की गई, बशर्ते किसी तरह की रियायत का लाभ न लिया जाए। सीतारमण ने कहा कि व्यक्तिगत आय कर में दी जाने वाली रियायतों और छूट की तादाद बढ़कर 100 से अधिक हो गई थी। उन्होंने कहा कि इनमें से 70 रियायतों को वापस लिया जाएगा लेकिन जो करदाता सहजता चाहते थे उनके लिए बिना रियायत के कम दरों पर कर चुकाने की व्यवस्था होगी। 

 
5 से 7.5 लाख रुपये तक की आय के लिए कर दर 20 प्रतिशत से घटाकर 10 फीसदी की जा रही है, 7.5 से 10 लाख रुपये तक की आय पर 20 प्रतिशत के बजाय 15 फीसदी कर लगेगा। इससे उन लोगों को एक नया विकल्प मिलेगा जो रियायतों का लाभ नहीं लेना चाहते। कर भुगतान को सरल करने की दृष्टि से देखें तो खासतौर पर युवाओं की दृष्टि से तो नई व्यवस्था काफी आकर्षक है। वित्त मंत्री को इस दिशा में आगे बढऩे का श्रेय दिया जाना चाहिए। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस सरकार द्वारा पेश कम कॉर्पोरेट कर दरों के साथ अवधारणात्मक समानता है।
 
अब यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि इस अग्रगामी सोच के बाद अगला कदम क्या होगा? स्पष्ट है कि सरकार का इरादा रियायत रहित या कम रियायत वाला प्रत्यक्ष कर माहौल बनाने का है। इससे अनुपालन और कर दायरे का विस्तार करने में मदद मिलेगी। यह सकारात्मक संकेत है। बदलाव की प्रक्रिया पारदर्शी और अनुमान लगाने लायक होनी चाहिए। क्योंकि इसका असर लोगों की बचत और बीमा आदि क्षेत्रों में उनके निवेश आदि पर पड़ेगा। उदाहरण के लिए ऐसी कोई वजह नहीं है कि नीति निर्माता बीमा को इसके मूल उद्देश्य कम लागत में जोखिम से बचाव दिलाने के उपाय के बजाय कर बचत का तरीका मानें। लोगों के पास यह निर्णय लेने का समय होना चाहिए कि वे अपने भविष्य की बचत को लेकर निर्णय कर सकें। इस संदर्भ में भविष्य निधि के माध्यम से कर बचत की सीमा आदि को लेकर समय रहते घोषणा कर दी जानी चाहिए।
 
व्यक्तिगत आय कर को भी नए कॉर्पोरेट आय कर दायरे के अनुरूप किए जाने की आवश्यकता है। फिलहाल सरकार शायद साझेदारियों के बढ़ते कॉर्पोरेटीकरण से खुश है। इन्हें कर विवाचन (आर्बिट्राज) के रूप में प्रोत्साहन मिल रहा है। परंतु किफायत लाने के लिए इस अंतर को कम किया जाना चाहिए। वहीं यदि व्यक्तिगत कर दाताओं को दो अलग-अलग कराधान योजनाओं में चयन करना पड़ा तो उसके लिए जटिलता कम करने का उद्देश्य पूरा नहीं होगा। सीतारमण ने अपने बजट भाषण में सही कहा कि करदाताओं के लिए बिना पेशेवरों की मदद लिए कर कानूनों का अनुपालन करना लगभग असंभव है। उन्होंने कहा कि नई व्यवस्था से चीजें आसान होंगी। परंतु सच तो यह है कि करदाताओं को अभी भी पेशेवरों की मदद की जरूरत पड़ सकती है ताकि वे पता लगा सकें कि क्या कम कर दर का चयन उनके लिए लाभदायक होगा? चूंकि प्रत्यक्ष कर को लेकर वित्त मंत्री की दृष्टि एकदम साफ नजर आती है इसलिए अब वक्त आ गया है कि इस दिशा में अपनी मंजिल की ओर तेजी से बढ़ें।
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