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छोटी बचत पर निर्भरता से मुश्किल

अनूप रॉय /  February 02, 2020

छोटी बचत पर सरकार की निर्भरता बढऩे से दरों में कटौती का फायदा मिलना कठिन हो जाएगा और इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) बैंकों को कितना लताड़ लगाए। केंद्रीय बैंक अपनी रीपो दर में फरवरी के बाद अब तक 135 आधार अंकों की कटौती कर चुका है, लेकिन वाणिज्यिक बैंकों ने उधारी दरों में महज 50 आधार अंकों से भी कम की कटौती की है। जबकि पूंजी बाजार ने घटी हुई दरों का पूरा लाभ आगे बढ़ा दिया था। हालांकि लंबे समय से बैंकों की शिकायत रही है कि यदि जमा दरों में भी कटौती नहीं की जा सकती है तो वे अपनी उधारी दरों में कटौती नहीं कर सकते। जमा दरों में अधिक कटौती नहीं की जा सकती है क्योंकि उसे छोटी जमा पर खुद सरकार पेशकश की गई दरों से नीचे नहीं लाया जा सकता है।

 
छोटी बचत पर निर्भरता का मतलब केंद्र के लिए लागत अधिक है क्योंकि छोटी बचत योजनाओं पर ब्याज दरें सरकारी बॉन्ड प्रतिफल के मुकाबले अधिक होती हैं। नैशनल सेविंग्स सर्टिफिकेट और किसान विकास पत्र पर दी जाने वाली ब्याज दरें 60 महीनों की परिपक्वता अवधि के लिए 5 फीसदी से लेकर 113 महीनों की परिपक्वता अवधि के लिए 7.9 फीसदी है। जबकि सुकन्या समृद्धि योजना के तहत जमा पर ब्याज दर 8.4 फीसदी है। इसके मुकाबले 10 वर्षों की परिपक्वता अवधि वाली सरकारी बॉन्ड प्रतिफल 31 जनवरी को 6.60 फीसदी पर बंद हुआ।
 
सरकार ने वित्त वर्ष 2019-20 और 2020-21 में करीब 2.4 लाख करोड़ रुपये की छोटी बचत योजनाओं से अपने घाटे की आंशिक भरपाई करने की योजना बनाई है। इन दोनों वर्षों के लिए करीब 30 फीसदी घाटे की भरपाई इससे की जा सकती है। छोटी बचत से प्राप्त रकम का इस्तेमाल भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) की उधारी चुकाने में भी किया जा सकता है। एफसीआई की उधारी वित्त वर्ष 2019-20 के लिए 1.1 लाख करोड़ रुपये और वित्त वर्ष 2020-21 के लिए 1.4 लाख करोड़ रुपये है। इसका मतलब साफ है कि छोटी बचत योजनाओं के लिए ब्याज दरों में कटौती की गुंजाइश मामूली है क्योंकि इससे निवेशक ऐसे समय में दूर हो सकते हैं जब सरकार उन्हें रियायतों के बिना कम आयकर दर का विकल्प भी उपलब्ध करा रही है।
 
सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र के यूनिट बॉन्ड की सरासर आपूर्ति से बॉन्ड बाजार पर दबाव बरकरार रहेगा। राज्य सरकार के बॉन्ड पर गौर किए बिना भी यह दबाव दिखेगा। वित्त वर्ष 2020-21 में सरकार बाजार से 8.1 लाख करोड़ रुपये की उधारी लेगी जिसमें भुनाना भी शामिल है। सरकार द्वारा पूरी तरह पोषित बॉन्ड के जरिये जुटाए जाने वाला अतिरिक्त बजटीय संसाधन वित्त वर्ष 2021 में जीडीपी का 0.8 फीसदी होगा। इंडसइंड बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री गौरव कपूर ने कहा कि वित्त वर्ष 2021 में केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों द्वारा ली जाने वाली उधारी जीडीपी का 1.9 फीसदी होगी जो उनके खर्च के लिए बजटीय अनुमानों पर आधारित है। उन्होंने कहा कि वित्त वर्ष 2021 में सार्वजनिक क्षेत्र की कुल उधारी जरूरत (राज्य सरकारों को छोड़कर) जीडीपी का करीब 6.2 फीसदी होगी।
 
ऐसे में वाणिज्यिक बैंकों पर उधारी दरों में कटौती की कोई बाध्यता नहीं होगी क्योंकि रिजर्व बैंक के उपायों के बावजूद बॉन्ड प्रतिफल में नरमी नहीं लाई जा सकती है। बैंकिंग प्रणाली में अतिरिक्त नकदी प्रवाह अब 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक है। आरबीआई यदि अपने खुले बाजार परिचालन (सीएमओ) कार्यक्रम के जरिये द्वितीयक बाजार से बॉन्ड की खरीदारी करता है तो उससे प्रणाली में नकदी प्रवाह बढ़ेगा जिससे महंगाई दर बढ़ेगी।
Keyword: budget, nirmala sitaraman, economy, income tax, bond, RBI,,
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