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ई-कॉमर्स पर भारी पड़ सकता है नया कर

पीरजादा अबरार, नेहा अलावधी और समरीन अहमद /  February 02, 2020

सरकार द्वारा बजट में ई-कॉमर्स संबंधी लेन-देन में 1 प्रतिशत टीडीएस (स्रोत पर कर) लगाए जाने के प्रस्ताव से एमेजॉन, फ्लिपकार्ट, उबर, मिंत्रा, जोमैटो, स्विगी व अन्य ई-कॉमर्स कंपनियों के साथ ऐसे प्लेटफॉर्मों पर माल बेचने वालों पर बोझ बढ़ेगा।  विशेषज्ञों का कहना है कि इसके साथ ही इन प्लेटफॉर्मों से खरीदारी करनेवालों को और ज्यादा पैसे देने होंगे, जिसका एक मतलब यह भी है कि इन प्लेटफॉर्मों पर माल बेचने वालों पर भी बुरा असर पड़ेगा। यह प्रस्ताव 1 अप्रैल, 2020 से लागू होगा और इसे आयकर अधिनियम की नई धारा में डाला जाएगा। उम्मीद की जा रही है कि इससे ई-कॉमर्स कंपनियोंं की कार्यशील पूंजी प्रभावित होगी और ई-विक्रेताओं की नकदी का प्रवाह कम होगा। विशेषज्ञों का कहना है कि ई कॉमर्स कंपनियों को पहले ही वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम के तहत 1 प्रतिशत टीडीएस काटना पड़ रहा है। 

 
टेक्नोलॉजी की विशेषज्ञता वाली नई दिल्ली की कानूनी फर्म टेकलेजिस एडवोकेट्स ऐंड सोलिसिटर्स के मैनेजिंग पार्टनर सलमान वारिस ने कहा कि ई कॉमर्स के लेन देन पर आयकर अधियिनम के तहत एक प्रतिशत टीडीएस लगाने का प्रस्तावित नया शुल्क ई-कॉमर्स कंपनियों की कार्यशील पूंजी पर असर डालेगा और ई-विक्रेताओं के लिए नकदी का प्रवाह कम करेगा। वारिस ने कहा, 'जब तक कि मौजूदा प्रक्रिया में राहत नहीं दी जाती है, इस प्रावधान से अनुपालन का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा और आगे ई-कॉमर्स कंपनियों के अनुपालन की लागत और बढ़ेगी।' 
 
बजट दस्तावेजों में ई-कॉमर्स ऑपरेटर को 'डिजिटल प्लेटफॉर्म की मालिकाना, परिचालन या प्रबंधन वाली कंपनी' के रूप में परिभाषित किया गया है। इसमें ई-कॉमर्स साझेदार को 'भारत में रहने वाले व्यक्ति, जो सामान बेचता है, या सेवाएं मुहैया कराता है या दोनों करता है, और डिजिटल उत्पाद, डिजिटल या इलेक्ट्रॉनिक सुविधा या प्लेटफॉर्म मुहैया कराता है।' इस परिभाषा से इसकी सीमा बहुत व्यापक हो गई है। एक बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी के अधिकारी ने कहा कि इस कदम से विक्रेताओं की नकदी पर असर पड़ेगा और उनके लिए समस्या पैदा होगी। 
 
अधिकारी ने नाम न देने की शर्त पर कहा, 'नकदी सरकार की रिफंड व्यवस्था में फंस जाएगी। कारोबार करने वाले ज्यादातर सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्यम हैं।'  उन्होंने कहा, 'जीएसटी कानून के तहत पहले ही कर कटौती की जा रही थी और सरकार के पास सभी आंकड़े हैं, जिससे वह संदिग्ध कर चोरी की जांच कर सकती है। अब आयकर अधिनिचम के तहत टीडीएस लगाए जाने से ई-कॉमर्स कंपनियों के अनुपालन का बोझ बढ़ेगा और एसएमई के लिए नकदी का संकट और बढ़ाएगा। सरकार को कोई अतिरिक्त आंकड़ा भी इससे नहीं मिलने जा रहा है।' 
 
इसका सबसे ज्यादा असर स्वाभाविक रूप से एमेजॉन और वालमार्ट की फ्लिपकार्ट जैसे मार्केटप्लेस पर ज्यादा पड़ेगा। एमेजॉन इंडिया के प्रवक्ता ने कहा कि कंपनी इसका विस्तार से अध्ययन कर रही है और स्पष्टीकरण के लिए सरकार से संपर्क करेगी। प्रवक्ता ने कहा, 'हम उम्मीद करते हैं कि कर सरल और एकसमान होगा, जिससे कि लाखों की संख्या में छोटे और मझोले उद्यमी ऑनलाइन कारोबार कर सकें, अपने परिचालन का डिजिटलीकरण कर सकें और बढ़ती अर्थव्यवस्था में उनका योगदान हो।' 
 
फ्लिपकार्ट ने भी कहा कि वह विस्तृत ब्योरे का अध्ययन कर रही है। खासकर देख रही है कि उसके मार्केटप्लेस पर बिक्री करने वाले एमएसएमई और विक्रेताओं पर इसका क्या असर पड़ेगा। फ्लिपकार्ट के प्रवक्ता ने कहा, 'हम अपने विक्रेता साझेदारों के साथ आगे और चर्चा करेंगे और सरकार व अन्य हिस्सेदारों से इसके बारे में बात करेंगे।' हालांकि 1 प्रतिशत टीडीएस प्लेटफॉर्म के उन विक्रेताओं पर लागू नहीं होगा, जिनकी सालाना बिक्री 5 लाख रुपये से ज्यादा न हो, फिर भी बड़ी संख्या में विक्रेता इससे प्रभावित होंगे। रिटेलर्स एसोसिएशन आफ इंडिया (आरएआई) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी कुमार राजगोपालन ने कहा कि इस कदम से मार्केटप्लेस पर विक्रेताओं के लेन देन का पता लगाने की क्षमता बढ़ेगी, जो रातोंरात भाग जाने वाले वाले विक्रेताओं को बाहर करने के लिए बहुत जरूरी है। 
 
राजगोपालन ने कहा, 'बहरहाल इससे उचित विक्रेताओं को भी नकदी का संकट हो सकता है। आदर्श रूप मेंं टीडीएस के बजाय जीएसटी की जरूरत थी।' उन्होंने कहा कि ज्यादातर खुदरा कारोबारियों का शुद्ध कारोबारी मुनाफा 3 प्रतिशत के करीब होता है और इसका मतलब यह है कि उनकी आमदनी की करीब 33 प्रतिशत राशि टीडीएस में फंस जाएगी। कानून फर्म सिरिल अमरचंद मंगलदास में अंतरराष्ट्रीय कराधान के प्रमुख दक्षा बख्शी ने कहा कि प्रावधान का यह भी मकसद है कि किसी के द्वारा की जा रही कमाई से संबंधित सूचना मिल सके और जो भी न्यूनतम कर है, उसका संग्रह किया जा सके। बख्शी ने कहा, 'निश्चित रूप से इससे ई-कॉमर्स ऑपरेटर के अनुपालन का बोझ बढ़ेगा और और सेवा प्रदाता या विक्रेता की 1 प्रतिशत नकदी फंसेगी।'  उन्होंने कहा, 'बहरहाल यह जहां कस्टप्रद प्रक्रिया है और नकदी फंसेगी, लेकिन इससे कम कर संग्रह की समस्या खत्म होगी और सरकार को पूरी सूचना न देने की स्थिति खत्म होगी।' 
 
ईवाई इंडिया में ई-कॉमर्स और कंज्यूमर इंटरनेट के नैशनल लीडर अंकुर पाहवा का कहना है, 'इस प्रावधान से विक्रेताओं की नकदी फंसेगी। खासकर उनकी समस्या बढ़ेगदी, जो बहुत मामूली मुनाफे पर काम करते हैं।' पाहवा ने कहा, 'ऐसे कारोबारियों से कर अधिकारियों द्वारा कम विदहोल्डिंग टैक्स (डब्ल्यूएचटी) के लिए कहा जा सकता है, लेकिन यह पूरी प्रक्रिया श्रमसाध्य और समय खाने वाली होगी।' उन्होंने कहा कि मार्केट प्लेटफॉर्म कारोबारियो की डब्ल्यूएचटी अनुपालन और संबंधित लागत बढ़ेगी। डेलॉयट इंडिया में पार्टनर अनिल तलरेजा ने कहा, 'ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के विक्रेता या सेवा प्रदाताओंं को नकदी के संकट का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि विदहोल्डिंग खाते में उनका पैसा फंस सकता है।' 
 
ताजा कदम से विश्व व्यापार संगठन के कुछ नियमों से भी टकराव संभव है। इस समय बहुराष्ट्रीय भुगतान सेवा प्रदाता जैसे वीसा और मास्टरकार्ट का ज्यादातर भुगतान गेटवे में हस्तक्षेप होता है। अगले कुछ साल में भारत में डिजिटल भुगतान में तेज बढ़ोतरी की संभावना है ऐसे में सरकार का मानना है कि लेन देन पर कर न लगाने से अवसर चूक सकता है। अब सीमा शुल्क लगाने के बजाय सरकार आयकर कानून में बदलाव करने जा रही है। इसके पहले सरकार ने संकेत दिए थे कि वह इलेक्ट्रॉनिक लेन देन पर आयकर अधिनियम की धारा 9 (1) (आई) के तहत कर लगाने को इच्छुक है। 
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