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अर्थव्यवस्था को राजकोषीय उपायों से मिलेगा सहारा

बीएस संवाददाता /  February 01, 2020

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए वित्तीय सुदृढीकरण पर एक पैनल बनाने की घोषणा की है। इससे उन्होंने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) को अपनी आगामी नीति के संकेत भी दे दिए हैं। सीतारमण ने पूर्व अफसरशाह एनके सिंह की अध्यक्षता वाली राजकोषीय दायित्व एवं बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) समिति द्वारा दिए गए एस्केप क्लॉज का इस्तेमाल किया है ताकि चक्रीय-रोधी उपायों का अधिकतम फायदा उठाया जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार द्वारा वित्त वर्ष 2019-20 और 2020-21 में से प्रत्येक वित्त वर्ष के लिए राजकोषीय घाटा अनुमान में 0.5 फीसदी की बढ़ोतरी किए जाने के बाद मौद्रिक नीति समिति लगातार दूसरी बार नीतिगत दरों में यथास्थिति बरकरार रख सकती है।

 
इक्रा की प्रधान अर्थशास्त्री अदिति नायर ने कहा कि नीतिगत दरों के मोर्चे पर आरबीआई फिलहाल यथास्थिति बरकरार रख सकता है और इसके लिए उसे बजट 2020-21 से राहत मिली है। आमतौर पर राजकोषीय घाटे में वृद्धि का संबंध महंगाई दर में तेजी से होता है। आरबीआई 4 फरवरी को मौद्रिक नीति समिति की बैठक में इस पर जरूर गौर करेगी।  अदिति ने कहा कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित महंगाई दर सितंबर तक करीब 4 फीसदी रहने का अनुमान है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर दिसंबर में 7.35 फीसदी पर पांच वर्षों की ऊंचाई पर पहुंच गई थी। जबकि केंद्रीय बैंक ने इसे 2 से 6 फीसदी के दायरे में रहने का अनुमान जाहिर किया था। महंगाई दर को खाद्य वस्तुओं की कीमतों से रफ्तार मिली। खाद्य महंगाई दर दिसंबर में 14.12 फीसदी पर लगातार दूसरे महीने दो अंकों में दर्ज की गई थी।
 
मौद्रिक नीति समिति ने अपनी पिछली बैठक में कहा था कि बजट से वृद्धि को रफ्तार देने के लिए सरकार उपायों का बेहतर संकेत मिलेगा और इसलिए ऐसा लगता है कि केंद्रीय बैंक फिलहाल  नीतिगत दरों में कोई बदलाव नहीं करने जा रहा है। सरकार ने वित्त वर्ष 2020 के लिए 3.8 फीसदी राजकोषीय घाटे का अनुमान जाहिर किया था जबकि बजटीय अनुमान 3.3 फीसदी और वित्त वर्ष 2021 के लिए 3.5 फीसदी था। एफआरबीएम ऐक्ट के तहत पत्रों में इसे 3 फीसदी दर्ज किया गया था। सरकार को वर्ष 2019-20 के लिए बजटीय अनुमान के मुकाबले अपने व्यय में 87,757 करोड़ रुपये की कटौती करनी पड़ी क्योंकि कर राजस्व घटकर करीब 3 लाख करोड़ रुपये रह गयाऔर विनिवेश प्राप्तियां करीब 35,000 करोड़ रुपये दर्ज की गईं। राजस्व में कमी के कुछ हिस्से की भरपाई 32,000 करोड़ रुपये के गैर-कर राजस्व के जरिये किया गया। केंद्रीय बैंक द्वारा सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपये हस्तांतरित किए जाने से भी इसमें मदद मिली।
 
खेतान ऐंड कंपनी के पार्टनर अभिषेक रस्तोगी ने कहा, 'अप्रत्याशित राजकोषीय जटिलताओं के कारण 0.5 फीसदी का अंतर उचित ही लगता है। कर तेजी में सुधार होने से सुदृढीकरण की राह आसान होगी।' यह मोदी सरकार के अब तक के सात बजट में दिखने वाला राजकोषीय घाटे में सबसे अधिक वृद्धि है। सरकार राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3 फीसदी पर बरकरार रखने में विफल रही। मूल रूप से वर्ष 2007-08 के लिए 3 फीसदी का लक्ष्य रखा गया था लेकिन अगले साल उसे हटा दिया गया। हालांकि  2008-09 में वैश्विक आर्थिक मंदी का प्रभाव दिखा जिससे सरकार को 1.8 लाख करोड़ रुपये का प्रोत्साहन पैकेज देना पड़ा था। उससे राजकोषीय घाटा बढ़कर 6 फीसदी तक पहुंच गया जबकि बजटीय अनुमान में इसे 2.5 फीसदी रखा गया था। उसके बाद कई बार 3 फीसदी का लक्ष्य रखा गया लेकिन उसे कभी हासिल नहीं किया जा सका।
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