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मंदी के समाधान के लिए उठाए गए पर्याप्त कदम?

बीएस संवाददाता /  February 01, 2020

आम बजट 2020 ऐसे समय मेंं पेश किया गया है जब भारतीय अर्थव्यवस्था भारी आर्थिक मंदी का सामना कर रही है। हर मोर्चे के संकेतक मसलन उपभोग, विनेश और निर्यात एक दशक में सबसे कमजोर नजर आ रहे हैं। व्यापक स्तर पर बजट के अलावा पहले से उठाए गए कदम हर मोर्च पर समाधान की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन सबसे बड़ा कदम आयकर में कटौती से उपभोग में मजबूती आएगी और कंपनी कर में कटौती निवेश का समाधान निकालेगा। हालांकि इन कोशिशों की कुछ सीमाएं भी हैं, जिसके लिए जब तक पूरक कदम नहींं उठाए जाएंगे, वह इच्छित नतीजे नहीं दे पाएगा।

 
उपभोग की बात करें (अर्थव्यवस्था में जिसकी हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है) तो यह जीडीपी का करीब 60 फीसदी है। वित्त मंत्री ने आयकर में कटौती की और नया स्लैब लागू किया, जो वैयक्तिक करदाताओं को 40,000 करोड़ रुपये की राहत देगा। यह वेतनभोगी को खर्च की प्राथमिकता पर दोबारा विचार करने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है और आय में नरमी के दौरान रुके हुए फैसले दोबारा ले सकता है, खास तौर से वाहन व टिकाऊ उपभोक्ता के मामले में। साथ ही कर कटौती से उपभोग में तत्काल मजबूती ला देगा।
 
विशेषज्ञों का मानना है कि यह हर आयु वर्ग में बदलाव लाएगा। डेलॉयट की पार्टनर नीरू आहुजा ने कहा, नई पीढ़ी को हालांकि फायदा होगा और वे उपभोग पर ज्यादा खर्च कर सकते हैं। पुरानी पीढ़ी के लोग सामान्य तौर पर इससे दूर रहेंगे। नई पीढ़ी शायद कम छूट का दावा कर सकता है। ऐसे में कर कटौती से उपभोग मेंं इजाफे में मदद मिल सकती है, खास तौर से युवाओं के उपभोग वाली वस्तुओं व सेवाओं में। अग्रिम अनुमान के मुताबिक, उपभोक्ता खर्च साल 2019-20 में कई साल के निचले स्तर 5 फीसदी पर आ गया। लेकिन चिंता की बात है कि सीमा शुल्क में बढ़ोतरी से उपभोग के क्षेत्र पर असर होगा। बजट के मुताबिक, करीब 400 वस्तुओं पर आयात शुल्क में इजाफा किया गया है और ज्यादातर बढ़ोतरी उपभोक्ता सामान पर हुई है।
 
शुल्क में बढ़ोतरी की अहम वजह मेक इन इंडिया है लेकिन उपभोग में मजबूती के लिहाज से इसका असर विपरीत दिशा में जाएगा। इस साल आयात आठ फीसदी घटा है, जो एक दशक की सबसे तेज गिरावट है। तक्षशिला इंस्टिट्यूट में अर्थशास्त्र के शिक्षक अविनाश त्रिपाठी ने कहा, कर कटौती का असर अनिश्चित नजर आ रहा है। उन्होंने कहा, बजट के दो मकसद हैं। पहला, व्यक्ति की जेब में रकम डालना। दूसरा, कराधान व्यवस्था के सरलीकरण के लिए अनुपालन की लागत घटाना, भ्रम कम करना और अनिश्चितता दूर करना। पहली नजर में कोई मकसद हासिल नहीं हुआ और इसका शुद्ध असर अस्पष्ट है।
 
निवेश के लिहाज से पूंजीगत खर्च 18 फीसदी बढ़ाकर 4.1 लाख करोड़ रुपये किया गया है। सड़क व रेलवे पर खर्च बढ़ा है या स्थिर रखा गया है ताकि पूंजीगत खर्च में इजाफा हो। यह निजी कंपनियोंं को नई परियोजना शुरू करने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है। वाहन क्षेत्र ऐसा क्षेत्र है जो रिकॉर्ड मंदी से गुजर रहा है। इस क्षेत्र में बिक्री, नए संयंत्रों और निवेश में लगातार गिरावट जारी रहेगी। देश में वाहन कंपनियों के शीर्ष संगठन सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (सायम) को बजट से और ज्यादा की उम्मीद थी। सायम के अध्यक्ष राजन वढेरा ने कहा कि लगता नहीं है कि प्रोत्साहन आधारित वाहन निपटान योजना, डीजल बसों की खरीद के लिए आंवटन और लिथेनियम-आयन बैटरियों के लिए शून्य सीमा शुल्क की हमारी मांग पर ध्यान दिया गया है।
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