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अप्रत्यक्ष करों में मामूली बदलाव, अधिक की थी गुंजाइश

सुकुमार मुखोपाध्याय /  February 01, 2020

इस बजट में कर प्रस्तावों का बड़ा हिस्सा प्रत्यक्ष करों के खाते में गया है। वहीं अप्रत्यक्ष करों के मोर्चे पर बहुत कम कदम उठाए गए हैं। यह एक तरह से सही भी है क्योंकि अप्रत्यक्ष कर में सीमा शुल्क और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) ही आते हैं। जहां तक जीएसटी का सवाल है तो इसके कर दरों पर निर्णय बजट की परिधि के बाहर है। हालांकि इस बारे में नीतिगत चर्चा की जा सकती है और ऐसा किया भी गया है। जहां तक सीमा शुल्क का सवाल है तो उसमें अधिक बदलाव नहीं किए गए हैं। इससे वित्त मंत्री की सीमा शुल्क दरों में स्थिरता दिखाने की मंशा जाहिर होती है। 

 
अगर जीएसटी की बात करें तो वित्त मंत्री ने कुछ ऐसी सामान्य टिप्पणियां की हैं जो नीतिगत लिहाज से अहम हैं। उन्होंने कहा है कि जीएसटी देश में किया गया सबसे ऐतिहासिक कर सुधार है। हालांकि इसमें हालात के हिसाब से लगातार बदलाव करने की जरूरत होती है। एक सरलीकृत जीएसटी रिटर्न व्यवस्था 1 अप्रैल, 2020 से लागू होगी जिसे प्रायोगिक स्तर पर चलाया जा रहा है। इससे एसएमएस-आधारित फाइलिंग, रिटर्न-पूर्व फाइलिंग, इनपुट टैक्स क्रेडिट प्रवाह में सुधार जैसी खासियत के चलते कारोबारियों के लिए रिटर्न फाइल कर पाना अधिक आसान हो सकेगा। रिफंड प्रक्रिया को सरल बनाया गया है और इसे बिना किसी मानव संपर्क के पूरी तरह स्वचालित कर दिया गया है। इलेक्ट्रॉनिक इनवॉयस (रसीद) एक और नवाचार है जहां महत्त्वपूर्ण सूचना एक केंद्रीकृत प्रणाली में इलेक्ट्रॉनिक तरीके से रखी जाएगी और इसका इस्तेमाल जमा किए गए रिटर्न के सत्यापन एवं इनपुट क्रेडिट प्रणाली की पुष्टि के लिए किया जा सकता है। 
 
आधार क्रमांक की मदद से करदाताओं का सत्यापन इस बजट में उठाया जाने वाला एक बेहद अहम कदम है। इससे नकली या वजूद न रखने वाली इकाइयों को आर्थिक प्रणाली से बाहर करने में मदद मिलेगी। मेरा मत है कि यह कर-वंचना को रोकने की दिशा में उठाया गया बेहद अहम कदम है जिसे दो साल तक इंतजार करने के बजाय पहले ही लागू कर देना चाहिए था। वित्त मंत्री ने इस बजट में सघन डेटा विश्लेषण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित उपकरणों के इस्तेमाल की भी घोषणा की है। इसका इस्तेमाल जीएसटी के इनपुट टैक्स क्रेडिट एवं रिफंड से जुड़ी धोखाधड़ी पर नजर रखने के लिए किया जाएगा। यह बेहद शानदार विचार है और सौ फीसदी बिलों के मिलान से कहीं बेहतर है। वित्त मंत्री ने बजट में इसका भी स्पष्ट उल्लेख कर बढिय़ा काम किया है कि जहां भी रसीदों और इनपुट क्रेडिट कर के बीच 10 फीसदी से अधिक असमानता पाई गई है वहां इनका मिलान किया जा रहा है। वैसे इस कदम को पूरी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि 10 फीसदी बेमेल होने की भी इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। एक फीसदी रसीदों के मिलान में भी गड़बड़ी मिलने पर इन कंपनियों के सारे बिलों एवं रसीदों का मिलान सुनिश्चित किया जाना चाहिए। 
 
वित्त मंत्री ने भारी कर वंचना के आरोप पर स्थिति साफ कर अच्छा ही किया है। बजट में उनका यह बयान साफ करता है कि सौ फीसदी रसीदों के मिलान की कोई जरूरत नहीं है। इसे उन आलोचकों को दिया हुआ जवाब माना जा सकता है जो जीएसटी प्रणाली में एक संरचनात्मक समस्या मानकर चलते हैं। वित्त मंत्री का बयान साफ तौर पर यह बताता है कि जीएसटी व्यवस्था में कोई संरचनात्मक खामी नहीं है और बदलते हालात के हिसाब से इसमें बदलाव करने की जरूरत है। मैं इस राय से पूरी तरह सहमत हूं। 
 
जहां तक सीमा शुल्क का सवाल है तो कर दरों में किए गए बदलाव उचित ही हैं। ऐसा देखा गया है कि मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के चलते आयात बढ़ रहा है जिससे घरेलू उद्योगों को खतरा पैदा होने लगा है। इस स्थिति को सुधारने के लिए कदम उठाए गए हैं। आयात बढऩे से घरेलू उद्योगों को गंभीर नुकसान होने पर लागू किए गए शुल्क के संदर्भ में किए गए प्रावधान को सशक्त करने की बात भी है। कुछ उत्पादों के संदर्भ में डंपिंग-रोधी प्रावधान भी किए जा रहे हैं। प्यूरिफाइड टैरेफ्थलिक एसिड (पीटीए) पर लगा डंपिंग-रोधी शुल्क खत्म कर दिया गया है। कई रियायतें वापस ले ली गई हैं और बाकी रियायतों के बारे में सितंबर 2020 तक समग्र रूप से समीक्षा करने की बात कही गई है। मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि पहले की तरह यह कदम बजट के साथ ही क्यों नहीं उठाया जा सकता था? इन रियायतों को वापस लेने के बारे में सार्वजनिक स्तर पर सलाह मांगने की भी बात कही गई है। यह बात समझ में नहीं आती है। कोई भी रियायत अमूमन कुछ विनिर्माताओं या निर्यातकों या आयातकों को प्रभावित करती है और बजट निर्माण के पहले उनसे हमेशा चर्चा की जाती है। यानी जो काम बजट के समय किया जा सकता था उसे आगे के लिए टाल दिया गया है।
 
वित्त मंत्री ने चिकित्सा उपकरणों के विनिर्माण पर भी खास ध्यान दिया है। हम अब न केवल चिकित्सा उपकरणों का उत्पादन कर रहे हैं बल्कि बड़ी संख्या में उनका निर्यात भी कर रहे हैं। इस क्षेत्र को अधिक मजबूती देने के लिए बजट में मेडिकल उपकरणों के आयात पर सीमा शुल्क के तौर पर नाममात्र का एक स्वास्थ्य उपकर लगाने का प्रस्ताव रखा गया है। इस उपकर से मिली राशि का इस्तेमाल देश के आकांक्षी जिलों में स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा तैयार करने में होगा। यह शुल्क जुटाने का सबसे बोझिल तरीका है। इसकी जगह खुद शुल्क को ही बढ़ाया जा सकता था। एक बार उपकर का जिक्र आते ही यह आखिरकार उपकर पूल का हिस्सा हो जाएगा।
 
जहां शुल्क रियायतें साल भर में कभी भी हटाई जा सकती हैं, वहीं शुल्क की दरें बजट के सिवाय कभी भी बदली नहीं जा सकती हैं। सीमा शुल्क की दरों पर एक नजर डालते हैं। ये दरें 5, 7.5, 10, 15, 20, 25, 30, 35, 40, 45, 50, 60, 70, 75, 100, 105 और 150 फीसदी हैं। वित्त मंत्री को इन शुल्क दरों को समायोजित करते हुए कुछ चुनिंदा दरें बनानी चाहिए थीं। इसके अलावा शुल्क रियायतों से संबंधित कई तरह की सूची एवं परिस्थितियां हैं और उन्हीं अध्यायों में शुल्क की भी कई दरों का जिक्र है। अगर वित्त मंत्री ने सीमा शुल्क पर गौर किया है तो वह इस बात से इत्तफाक रखेंगी कि इन दरों को सरल बनाने के लिए बड़े सुधार की जरूरत है। राष्ट्रीय सार्वजनिक वित्त एवं नीति संस्थान (एनआईपीएफपी) को वित्त मंत्रालय के बजट प्रभाग के साथ मिलकर इस सुधार का खाका तैयार करने को कहा जा सकता है। एनआईपीएफपी अतीत में भी कई अच्छे सुझाव दे चुका है।
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