बिजनेस स्टैंडर्ड - अधिक रणनीतिक सोच अपनाने की जरूरत
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अधिक रणनीतिक सोच अपनाने की जरूरत

अजय शाह /  February 01, 2020

आम बजट के कथ्य तक लोगों की आसान पहुंच के बीच राजनीतिक संदेश के साथ-साथ आर्थिक नीति निर्माण को लेकर अधिक सुविचारित ढंग से बात रखने की आवश्यकता है। विस्तार से बता रहे हैं अजय शाह 

 
वर्ष 2011 से 2020 के बीच वृद्धि का रुझान कमजोर रहा। इस अवधि में कारोबारी चक्र की परिस्थितियां भी कमजोर रहीं। अच्छी बात यह रही कि बजट भाषण में जीडीपी वृद्धि को ध्यान में रखते हुए व्यापक राजकोषीय विस्तार का आह्वान नहीं किया गया। आर्थिक परिस्थितियों में बदलाव के लिए राज्य और लोगों के बीच के रिश्ते को लेकर कहीं अधिक रणनीतिक विचार प्रक्रिया की आवश्यकता है। इसके अलावा निजी निवेश में सुधार के लिए निजी स्तर पर लोगों की असहजता को दूर करना भी आवश्यक है। बजट भाषण में उल्लिखित उपाय थोड़ी बहुत मदद करेंगे लेकिन वृद्धि में सुधार की आवश्यकता कुछ अलग है।
 
देश में वृद्धि के रुझान में गिरावट 2011 में आई। इस समय हम कारोबारी चक्र की मंदी के शिकार हैं। आर्थिक संकट को देखते हुए सरकार से मांग की जा रही है कि दोनों परिस्थितियों में तेजी से बदलाव लाए। कुछ लोगों ने राजकोषीय और मौद्रिक नीति संबंधी प्रतिक्रिया की वकालत की है। इस बात पर जोर देना आवश्यक है कि हमारा राजकोषीय घाटा जीडीपी के 5.5 फीसदी के आसपास है। प्रोत्साहन देने के लिए इसमें और इजाफा करना होगा। यदि यह जीडीपी के 7.5 फीसदी के बराबर हो जाए तो इससे जीडीपी को 2 फीसदी का प्रोत्साहन मिलेगा।
 
भारतीय हालात में वृहद नीति के इन उपायों में सीमित क्षमता है। ये केवल कारोबारी परिस्थितियों को प्रभावित कर सकते हैं, वृद्धि के रुझान को नहीं बदल सकते। राजकोषीय नीति की बात करें तो घाटे में और अधिक इजाफा चिंता पैदा करने वाला होगा। अच्छी बात यह है कि बजट भाषण में राजकोषीय घाटे में इजाफा करने जैसी कोई बात शामिल नहीं थी। हम उच्च वृद्धि रुझान की दिशा में वापसी कैसे कर सकते हैं? समस्या का मूल निजी कॉर्पोरेट निवेश में निहित है। जीडीपी का अधिकांश हिस्सा और ज्यादातर रोजगार निजी क्षेत्र में तैयार हो रहे हैं। जीडीपी में इजाफा और रोजगार में वृद्धि तब होती है जब निजी स्तर पर लोग कारोबार में पूंजी लगाते हैं। सन 1991 से 2011 के बीच हमें तेज वृद्धि हासिल हुई क्योंकि निजी क्षेत्र को निवेश करना और कारोबार खड़ा करना सुरक्षित महसूस हो रहा था। 2011 करीब आते-आते निजी क्षेत्र का मोहभंग होने लगा था। 
 
इसमें बदलाव लाने के लिए राज्य और लोगों के रिश्ते को रणनीतिक नजरिये से देखना होगा। बाजार की विफलता को हल करने के प्रयास के बजाय ऐसा माहौल तैयार करना होगा जहां निजी निवेशक सुरक्षित महसूस करें। बजट भाषण में तमाम उपाय शामिल थे। परंतु उनमें कोई नई नीति नहीं है। भाषण में कोई रणनीतिक तस्वीर पेश करने का प्रयास भी नहीं किया गया। जबकि जुलाई 1991 में तथा कुछ अन्य बजट में हम ऐसा होते देख चुके हैं। आर्थिक मोर्चे पर एक रणनीति की आवश्यकता है। एक ऐसी निरंतरता भरी नीति जो सरकार के छोटे-छोटे कदमों को आकार दे और सरकार के भविष्य के कदमों के बारे में निजी व्यक्तियों के अनुमान को भी एक स्वरूप प्रदान करे। संचार में कई विकल्प मौजूद हैं लेकिन बजट भाषण इस व्यापक तस्वीर की प्रस्तुति के लिए कहीं बेहतर जगह है। एक छोटे उदाहरण की बात करें तो बजट भाषण में यह उचित ही कहा गया कि देश के दो सबसे बड़े वित्तीय उत्पादों निफ्टी और रुपये की देश से बाहर की गतिविधियों में उल्लेखनीय तेजी देखने को मिली। बजट में यह आकांक्षा उचित ही प्रकट की गई कि इस गतिविधि को देश में वापस लाया जाना चाहिए। परंतु नीति निर्माताओं ने गहराई से आवश्यक विश्लेषण नहीं किया।
 
निजी स्तर पर लोग अपनी कारोबारी गतिविधियों का ऐसा प्रबंधन क्यों करते हैं ताकि निफ्टी और रुपये का कारोबार देश के बाहर होता है? इसलिए क्योंकि भारत में वित्तीय नियमन को लेकर तमाम अवधारणाएं और गतिविधियां हैं, ऐसे कराधान और पूंजीगत नियंत्रण हैं जो निजी व्यक्तियों पर लागत का बोझ और नियामकीय तथा नीतिगत जोखिम थोपते हैं। इसे बदलने के लिए हमें देश में वित्तीय नियमन, कराधान और पूंजीगत नियंत्रण में बुनियादी बदलाव लाने होंगे। जैसा कि बजट में कहा गया, इन उत्पादों के गिफ्ट में कारोबार की इजाजत देना हल नहीं है।
 
इसी प्रकार कारोबारी गतिरोधों की समस्या पर विचार कीजिए। बजट भाषण में कुछ उत्पादों में ऐसे गतिरोध बढ़ाने और कुछ में घटाने की घोषणा की गई। यहां भी रणनीतिक सोच की कमी नजर आई। व्यापारिक गतिरोध उत्पादकता और निर्यात के क्षेत्र में प्रदर्शन के लिए खराब हैं। व्यापार नीति को लेकर न तो रणनीतिक स्तर पर कोई बड़ी सोच सामने आई, न ही विभिन्न क्षेत्रों में व्यापार गतिरोध समाप्त करने की दिशा में निरंतर कदम उठाए गए। मुझे सन 2000 के दशक के आरंभ की एक विरोधाभासी बात याद आती है जब विजय केलकर और राकेश मोहन ने कहा था कि हर बार जब टैरिफ में कटौती की जाती है तो हमारे निर्यात में इजाफा होता है। टैरिफ में कमी के उस दौर ने ही सन 2003 और उसके बाद निर्यात वृद्धि के दौर की पृष्ठभूमि तैयार की।
 
इस इलेक्ट्रॉनिक युग में बजट भाषण सुनने वालों की कमी नहीं है। ऐसे में भाषण लिखने वालों को राजनीतिक और आर्थिक नीति के वक्तव्य में संतुलन कायम करना पड़ता है। यह सही है कि राजनीतिक संदेश को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता लेकिन ऐसा लगता है कि मजबूत आर्थिक नीति की प्रस्तुति और क्रियान्वयन के साथ भी ऐसा किया जा सकता है। देश में और विदेशों में भी निजी व्यक्ति इलेक्ट्रॉनिक क्रांति से पूरी तरह प्रभावित हैं। वे बजट भाषण में लिखी और कही गई बातों को पहले की तुलना में कहीं अधिक आसानी से ग्रहण करते हैं। जहां तक बात दृश्यता की है तो मानक अब पहले से कहीं अधिक ऊंचे हैं। अब हमें ओबामा के भाषण की गुणवत्ता से मुकाबला करना है। इस दृश्य का चित्रण करके देखें तो हमारे लिए उपयोगी साबित हो सकता है कि कैसे एक निजी व्यक्ति (भारतीय या विदेशी) जिसने सन 2011 के बाद भारत में निवेश करना बंद कर दिया, वह इस बजट भाषण पर कैसी प्रतिक्रिया देगा? क्या उसे लगेगा कि उसकी चिंताओं के बारे में सोचा जा रहा है, अब विफलताओं की वजह समझी जा चुकी है और उसका हल तलाशा गया है? शायद बजट भाषण अधिक बेहतर होता यदि उसमें 4,000 शब्दों का राजनीतिक संदेश होता और इतने ही शब्द देश और विदेश के लोगों के लिए आर्थिक रणनीति के उल्लेख में खर्च किए जाते।
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