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आधा-अधूरा प्रयास

संपादकीय /  02 01, 2020

आम बजट के निर्माताओं के समक्ष दो चुनौतियां थीं। सरकार की वित्तीय स्थिति दबाव में थी और अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में थी। गलत राजस्व अनुमानों और वृद्धि दर कम होने से वर्ष 2019-20 में सरकार के राजस्व में भारी गिरावट आई। इसी तरह पहले अग्रिम अनुमान के मुताबिक 2019-20 में जीडीपी वृद्धि दर गिरकर 5 फीसदी रह गई थी। वर्ष 2018-19 के ताजा आंकड़ों को संशोधित कर घटाया गया। यानी 2019-20 में देश की आर्थिक वृद्धि 5.7 फीसदी के साथ पहले से बेहतर स्तर पर नजर आई। 

 
परंतु मंदी के दायरे में कोई अहम बदलाव नहीं नजर आया। सरकार के पास दो विकल्प थे: राजकोषीय शुद्धता की राह पर बने रहना और विभिन्न क्षेत्रों में सुधार लाना ताकि समय के साथ अर्थव्यवस्था में सुधार आए या फिर सुधारों को अपनाने के साथ विभिन्न योजनाओं और परियोजनाओं पर व्यय के साथ राजकोषीय प्रोत्साहन देना। परंतु बजट में दोनों विकल्पों को खंगालने का प्रयास किया गया, वह भी आधे-अधूरे मन से। अत्यधिक महत्त्वाकांक्षी राजस्व लक्ष्यों पर भरोसा किया गया और कई क्षेत्रों के लिए नाममात्र का व्यय आवंटन किया गया।
 
राजकोषीय घाटे में 0.5 फीसदी की फिसलन आई और यह 3.8 फीसदी रहा लेकिन अगले वर्ष के लिए 3.5 फीसदी का लक्ष्य तय किया गया। यानी सरकार राजकोषीय जवाबदेही एवं बजट प्रबंधन अधिनियम पर टिकी रही जो वर्ष में आधा फीसदी से अधिक गिरावट की इजाजत नहीं देता। इस कानून के तहत 2020-21 तक 3 फीसदी के घाटे का लक्ष्य हासिल करना था लेकिन मौजूदा लक्ष्य भी सवालों के घेरे में हैं। 3.5 फीसदी घाटे का लक्ष्य 2.1 लाख करोड़ रुपये की विनिवेश प्राप्तियों पर निर्भर है। यह चालू वर्ष में हासिल 65,000 करोड़ रुपये से 223 प्रतिशत अधिक है। सरकारी बीमा कंपनी एलआईसी की सूचीबद्धता बड़ा कदम है लेकिन इसके लिए प्रभावी योजना और क्रियान्वयन करना होगा। इसी तरह 2020-21 के लिए 12 फीसदी के सकल कर राजस्व वृद्धि का लक्ष्य हासिल करने के लिए कर उत्प्लावन में 0.5 के मौजूदा स्तर से काफी सुधार कर इसे 1.2 पर लाना होगा।
 
बजट में एक सराहनीय बात यह है कि वित्त मंत्री ने सरकार की बजट से इतर उधारी के बारे में पारदर्शिता बरतने का प्रयास किया है। कुल 8 फीसदी बढ़ोतरी के साथ इसके 1.86 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है। दूसरे शब्दों में इसे मिला दें तो सरकार का वास्तविक बजट घाटा जीडीपी के 4.36 फीसदी का स्तर पार कर जाएगा। बजट में इस उधारी को जिस पारदर्शिता से पेश किया गया है वह अच्छी बात है। इसका असर घाटे के वास्तविक आंकड़े पर भी नजर आना चाहिए। विनिवेश प्राप्तियों की बदौलत सकल कर राजस्व में 12 फीसदी की वृद्धि के अनुमान के बावजूद सरकार व्यय आवंटन को लेकर खामोश नजर आई। कुल व्यय में केवल 13 फीसदी इजाफा किया गया है। प्रमुख सब्सिडी में मामूली बढ़ोतरी और रक्षा आवंटन में केवल 2 फीसदी इजाफा किया गया है। 
 
सब्सिडी पर पूरी रोक लगाना कठिन है। यह तभी हो सकता है जब सरकार इस क्षेत्र में बड़े सुधार करे। रक्षा व्यय में मामूली बढ़ोतरी चिंतित करती है क्योंकि देश की रक्षा खरीद बढ़ाने की जरूरत है। इसी तरह पूंजीगत व्यय के लिए बजट सहायता में 18 फीसदी का इजाफा बुनियादी क्षेत्र के लिए अहम मदद है। अगले वर्ष के लिए सरकार का कुल पूंजीगत व्यय 10.84 लाख करोड़ रुपये है। यदि अगले चार वर्ष में 100 लाख करोड़ रुपये के बुनियादी निवेश लक्ष्य को हासिल करना है तो यह चिंताजनक है क्योंकि इसमें केवल 2.3 प्रतिशत बढ़ोतरी की गई है। ग्रामीण क्षेत्र के आवंटन में भी खास इजाफा नहीं किया गया है। यद्यपि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि या महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी जैसी योजनाओं का पैसा लोगों तक पहुंच रहा है लेकिन वितरण में और सुधार करने की आवश्यकता है।
 
सरकार द्वारा व्यय पर नियंत्रण रखने की एक वजह यह भी है कि 15वें वित्त आयोग की अनुशंसाओं के कारण उसके कर राजस्व में केवल 8 फीसदी का मामूली इजाफा हो रहा है। अगले वर्ष राज्यों के कर राजस्व हस्तांतरण में 18 फीसदी की बढ़ोतरी होगी। यह राज्यों के लिए राहत की बात होगी। सन 2019-20 में राज्यों को होने वाले केंद्रीय करों के हस्तांतरण में काफी कमी आई थी। परंतु यह सवाल उठेगा कि यदि सरकार के पास ग्रामीण अर्थव्यवस्था तथा अन्य परियोजनाओं पर व्यय करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं थे तो मध्य वर्ग को कुछ विकल्पों के माध्यम से आय कर दरों में कमी करके 40,000 करोड़ रुपये की अहम कर राहत देने की क्या जरूरत थी? 
 
इसके अलावा लाभांश वितरण करने वाली संस्था के बजाय लाभांश पाने वाले के हाथों में लाभांश पर कर के कारण 25,000 करोड़ रुपये की अन्य रियायत भी दी गई। आय कर से रियायतें समाप्त करने का विचार अच्छा है। कॉर्पोरेशन कर देने वालों के लिए ऐसी व्यवस्था लागू है। परंतु ग्रामीण अर्थव्यवस्था में व्यय बढ़ाना वक्त का तकाजा है ताकि मांग का विस्तार हो। बजट की कराधान नीति में 22 नई वस्तुओं के लिए सीमा शुल्क बढ़ाकर और जटिल एवं गलत रुख अपनाया गया है। इसमें खिलौने, जूते-चप्पल और अखरोट शामिल हैं। बीते कुछ बजट की तरह इस बजट में यह सोचकर सीमा शुल्क बढ़ाने की चूक की गई है कि इससे घरेलू विनिर्माण में सुधार होगा।
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