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सूचीबद्ध सरकारी कंपनियों में निजीकरण पर जोर

सोमेश झा / नई दिल्ली January 31, 2020

मुख्य आर्थिक सलाहकार केवी सुब्रमण्यन ने केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों (सीपीएसई) के आक्रामक निजीकरण के लिए रास्ता साफ करते हुए सुझाव दिया है कि सरकार को सूचीबद्ध कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी एक अलग कंपनी को हस्तांतरित करना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया है कि कंपनियों का प्रबंधन एक स्वतंत्र बोर्ड द्वारा होना चाहिए और एक समयावधि के दौरान सूचीबद्ध सीपीएसई में सरकार की हिस्सेदारी का विनिवेश कर देना चाहिए। सुब्रमण्यन और उनकी टीम द्वारा तैयार आर्थिक समीक्षा में कहा गया है, 'इससे विनिवेश प्रक्रिया के लिए पेशेवर दृष्टि और स्वायत्ता आएगी जिससे सीपीएसई के आर्थिक प्रदर्शन में सुधार होगा।' उन्होंने कहा कि सरकार को टेमासेक होल्डिंग्स कंपनी के अनुभव से सीख सकती है जो सिंगापुर सरकार की स्वामित्व वाली कंपनियों के निवेश का प्रबंधन करने वाली एक निजी कंपनी है।
 
समीक्षा में कहा गया है, 'केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जिन चुनिंदा सीपीएसई में विनिवेश के लिए अपनी सैद्धांतिक मंजूरी दी है उनमें विनिवेश की प्रक्रिया आक्रामक होनी चाहिए क्योंकि इससे लाभप्रदता में सुधार होगा, कुशलता बढ़ेगी, प्रतिस्पर्धात्मकता बेहतर होगी और प्रबंधन के पेशेवर नजरिये में सुधार होगा।' समीक्षा में कहा गया है कि रणनीतिक विनिवेश के तहत मुख्य तौर पर गैर-रणनीतिक कारोबार से बाहर होने और इन सीपीएसई की आर्थिक क्षमता को युक्तिसंगत बनाने पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है ताकि सरकार इस रकम का इस्तेमाल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे में कर सके। सुब्रमण्यन ने कहा कि सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र की उन 33 इकाइयों को प्राथमिकता देनी चाहिए जो 2016 से ही रणनीतिक बिक्री के इंतजार में हैं। मुख्य आर्थिक सलाहकार ने उन 11 केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों का एक विश्लेषण भी प्रस्तुत किया जिनका रणनीतिक विनिवेश 1999-2000 और 2003-04 के दौरान किया गया था। इसमें दर्शाया गया है कि निजीकरण के बाद इन कंपनियों के आर्थिक प्रदर्शन के सभी संकेतकों में सुधार हुआ है। यह विश्लेषण निजीकरण से पहले और बाद के 10 वर्षों की अवधि पर आधारित है। साथ ही समान उद्योग की अन्य प्रतिस्पर्धी कंपनियों के प्रदर्शन के साथ भी उनकी तुलना की गई है।
 
समीक्षा में कहा गया है, 'इस रुझान से साबित होता है कि जिन सीपीएसई का निजीकरण किया गया उनका प्रदर्शन  प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले निजीकरण वाले वर्ष तक लगभग समान रहा। जबकि निजीकरण के बाद उनके प्रदर्शन में प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले उल्लेखनीय सुधार हुआ।' उदाहरण के लिए, जिन 11 कंपनियों का निजीकरण किया गया उनकी शुद्ध हैसियत निजीकरण से पहले 700 करोड़ रुपये थी जो बढ़कर निजीकरण के बाद 2,992 करोड़ रुपये हो गई। वर्ष 2016-17 और वर्ष 2018-19 के बीच विनिवेश से सरकार को प्राप्त कुल रकम में रणनीतिक बिक्री की हिस्सेदारी करीब 28 फीसदी रही। वर्ष 2019-20 के लिए सरकार ने विनिवेश के लिए 1.05 लाख करोड़ रुपये का लक्ष्य रखा है। लेकिन सरकार अब तक महज करीब 18,000 करोड़ रुपये ही जुटा पाई है।
Keyword: economic survey, budget, nirmala sitaraman, Krishnamurthy Subramanian,
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